सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति के 14 सवालों पर चर्चा
CJI BR Gavai Statement: ‘न्यायिक सक्रियता, न्यायिक आतंकवाद नहीं बनना चाहिए.’ ये टिप्पणी सीजेआई बीआर गवई ने सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के उस तर्क की है जो उन्होंने राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए 14 सवालों को लेकर हुई सुनवाई के दौरान दिया है. सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयक को मंजूरी देने की समय सीमा तय करने के मामले में सुनवाई हुई. कोर्ट में राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए 14 सवालों को लेकर चर्चा हुई.
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए. मामले की सुनवाई सीजेआई बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ सुनवाई ने की. इसमें जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर शामिल रहे. अब कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 26 अगस्त के लिए टाल दी है. आइये जानें आज सुनवाई के दौरान पीठ के जजों और सरकार की ओर से पेश तुषार मेहता के बीच क्या-क्या बात हुई?
तुषार मेहता ने कहा कि निर्वाचित लोगों को काफी अनुभव होता है और उसे कमतर नहीं आंका जाना चाहिए. एसजी तुषार मेहता ने कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए समयसीमा तय करने का विरोध किया. उन्होंने कहा कि निर्वाचित लोग सीधे तौर पर जनता का सामना करते है. अब लोग जनप्रतिनिधियों से सवाल करते है. 20-25 साल पहले हालात अलग था, लेकिन अब मतदाता जागरूक है, उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता है.
इस पर टिप्पणी करते हुए सीजेआई बीआर गवई ने कहा कि हमने कभी भी निर्वाचित लोगों के बारे में कुछ नहीं कहा है. मैंने हमेशा कहा है कि न्यायिक सक्रियता, न्यायिक आतंकवाद नहीं बनना चाहिए.
मेहता ने कहा कि राजनीतिक मामलों का समाधान राजनीतिक तरीके से होना चाहिए, न्यायिक समय सीमा से नहीं. इसपर सीजेआई सीजेआई गवई ने पूछा कि अगर राज्यपाल बिलों को अनिश्चिकाल के लिए रोक दें, तो क्या कोर्ट शक्तिहीन रहें? सीजेआई ने यह भी पूछा कि अगर कोई गलत है, तो उसका समाधान भी होना चाहिए. जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने कहा कि समयसीमा तय न हो सके, तो भी प्रक्रिया तो होनी चाहिए.
एसजी मेहता ने कहा कि राज्यपाल का विवेकाधिकार अनुच्छेद 200 के तहत विस्तृत है. तुषार मेहता ने कहा कि राज्यपाल के पास तीन विकल्प हैं. स्वीकृति प्रदान करना इसके क्या पहलू हैं? शुरुआत में यदि वह स्वीकृति प्रदान करते हैं, तो विधेयक कानून बन जाता है. यदि वह स्थगित करते हैं, तो निर्णय ले सकते हैं. चौथा विकल्प- विधेयक संशोधन के साथ या बिना संशोधन के वापस किया जा सकता है. दूसरा क्या है? रोक-स्वतंत्र विकल्प, पूर्ण कार्रवाई. तीसरा नया तत्व, जब शुरुआत में आरक्षित रखा जाता है, तो पहला विरोध के लिए हो सकता है.
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एसजी मेहता ने कहा कि संविधान के कुछ प्रावधान राज्य विधानमंडल को कानून पारित करने के लिए बाध्य करते हैं. सभी चार विकल्प स्वतंत्र है. एसजी ने कहा कि दूसरा प्रश्न जिस पर मैं विचार कर रहा हूं. क्या राज्यपाल मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई सहायता और सलाह से बाध्य हैं?
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