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ऑटो-कैब चालकों के लिए मराठी भाषा की शर्त पर घमासान, हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर

महाराष्ट्र में ऑटो और टैक्सी ड्राइवरों के लिए मराठी भाषा अनिवार्य किए जाने को लेकर जारी अधिसूचना को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है. यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील घनश्याम उपाध्याय की ओर से दायर की गई है. दायर जनहित याचिका में महाराष्ट्र सरकार के नए नियमों को असंवैधानिक और आजीविका के अधिकार पर असर डालने वाला बताया है.

दायर याचिका में कहा गया है कि महाराष्ट्र सरकार ने 12 अगस्त न2026 को अधिसूचना जारी कर महाराष्ट्र मोटर वाहन नियमों में संशोधन किया. नए नियमों के तहत ऑटो-टैक्सी चालकों और मोटर कैब परमिट धारकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य किया गया है. नियमों का पालन नही करने पर पहले निलंबन और लगातार गैर-अनुपालन की स्थिति में परमिट या अनुमति रद्द करने तक कि कार्रवाई का प्रावधान किया गया है.

दायर जनहित याचिका में.सवाल उठाया गया है कि कार्यसाधक ज्ञान की कोई स्पष्ट परिभाषा नही दी गई है. याचिकाकर्ता का कहना है कि भाषा की दक्षता जांचने के लिए न तो कोई तय मानक, सिलेबस या एक समान परीक्षा व्यवस्था बनाई गई है और न ही स्वतंत्र अपीलीय व्यवस्था बनाई गई है और न ही स्वतंत्र अपीलीय व्यवस्था का प्रावधान है. ऐसे में किसी व्यक्ति की आजीविका को भाषा के आधार पर प्रभावित करना मनमाना हो सकता है. दायर जनहित याचिका में यह भी साफ किया गया है कि मराठी भाषा या उसके संरक्षण और प्रचार के खिलाफ नहीं है.

महाराष्ट्र मोटर वाहन संशोधन नियमों की वैधता को चुनौती

याचिका में कहा गया है कि मराठी महाराष्ट्र की आधिकारिक और महत्वपूर्ण भारतीय भाषा है, लेकिन भाषा के प्रचार को किसी खास वर्ग के लोगों के रोजगार के लिए अनिवार्य शर्त बनाना उचित नहीं है. जनहित याचिका में संविधान केनअनुच्छेद 14,19(1)(g) और 21 का हवाला देते हुए कहा गया है कि यह प्रावधान समानता, व्यवसाय करने की स्वतंत्रता और आजीविका से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन करता है. दायर याचिका में महाराष्ट्र मोटर वाहन (तृतीय संशोधन) नियम 2026 की वैधता, आनुपतिकता और नियम बनाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं.

मराठी भाषा की अनिवार्य शर्त को चुनौती

याचिकाकर्ता ने 2017 में बॉम्बे हाईकोर्ट के एक फैसले का भी उल्लेख किया है, जिसमें ऑटो रिक्शा परमिट के लिए मराठी भाषा की शर्त को उस समय लागू कानून और नियमों में पर्याप्त अधिकार न होने के आधार पर खारिज कर दिया गया था. हालांकि दायर नई याचिका में यह.स्वीकार किया गया है कि 2026 का संशोधन उस कानूनी कमी को दूर करने का प्रयास है. इसलिए नई जनहित याचिका मुख्य रूप से नए नियमों की संवैधानिक वैधता और उनके कठोर प्रावधानों को चुनौती देती है.

दायर जनहित याचिका में यह भी मांग की गई है कि मराठी भाषा के ज्ञान को आजीविका और परमिट की अनिवार्य शर्तबनाने वाले प्रावधानों को रद्द किया जाए.

यह भी पढ़ें: दिल्ली हाईकोर्ट ने झुग्गीवासियों के पुनर्वास पर बनाई मॉनिटरिंग कमेटी, सुविधाओं की होगी निगरानी

-भारत एक्सप्रेस

गोपाल कृष्ण

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