राष्ट्रपति रेफरेंस मामले में केंद्र सरकार, गोवा और पुड्डुचेरी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल कर दिया है. सीजेआई बीआर गवई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ प्रेसीडेंशियल रेफरेंस पर सुनवाई कर रही है. केंद्र सरकार ने अपने लिखित जवाब में कहा है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति का बिलों पर निर्णय लेना उच्च संवैधानिक दायित्व है और इसमें अदालतें सीधे दखल नही दे सकती है.
अनुच्छेद 200 और 201 में राज्यपाल और राष्ट्रपति को बिल पर हस्ताक्षर करने, उसे रोकने या राष्ट्रपति के पास भेजने की चार विकल्प दिए गए हैं. जवाब में यह भी कहा गया है कि संविधान ने जानबूझकर इसमें कोई समय-सीमा नहीं रखी है, ताकि वे पूरी संवैधानिक समीक्षा करके निर्णय ले सकें. वहीं गोवा और पुड्डुचेरी सरकार द्वारा दायर लिखित जवाब में कहा गया है कि अनुच्छेद 142 (सुप्रीम कोर्ट को मिले विशेष शक्ति) का प्रयोग करके भी अदालतें राज्यपाल की जगह खुद बिल को स्वीकृत नहीं मान सकती.
राज्यों के तरफ से यह भी कहा गया है कि अदालत केवल यह घोषणा या अनुरोध कर सकती है कि राज्यपाल को बिल पर निर्णय यथाशीघ्र लेना चाहिए, लेकिन वह खुद राज्यपाल की भूमिका नहीं निभा सकती. जवाब में यह भी कहा गया है कि कोर्ट संविधान में संशोधन नहीं कर सकता या संविधान निर्माताओं की मंशा को विफल नही कर सकता. बशर्ते कि संविधान पीठ में ऐसी कोई प्रक्रियागत जनादेश न हो. पिछली सुनवाई में सीजेआई गवई ने कहा था कि शुरुआत में हम प्रारंभिक आपत्ति पर पक्षों की एक घंटे तक सुनवाई करेंगे. उसके बाद हम 19 अगस्त, 20 अगस्त, 21 अगस्त और 26 अगस्त को अटॉर्नी जनरल और केंद्र सरकार के प्रेसिडेंशियल रेफरेंस का समर्थन करने वाले पक्षों अपनी दलीलें सुनेगा.
जबकि प्रेसिडेंशियल रेफरेंस का विरोध करने वाले पक्षों को 25 अगस्त, दो सितंबर, 3 सितंबर और 9 सितंबर को दलीलें सुनेगा. केंद्र सरकार, गोवा और पुड्डुचेरी ने अपने जवाब में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर आपत्ति जाहिर की है, जिसमें तमिलनाडु की याचिका पर राज्यपालों के लिए विधेयक को मंजूरी देने की समय-सीमा तय कर दी गई थी. संविधान पीठ में सीजेआई बी आर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर शामिल है. सीजेआई ने कहा कि सुनवाई किसी भी परिस्थिति में बदलाव नहीं किया जाएगा.
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बता दें कि तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से 13 मई के प्रेसिडेंशियल रेफरेंस को अनुपालन योग्य नहीं बताते हुए उसे वापस करने का आग्रह किया है. साथ ही इसे राज्यपाल की शक्तियों पर स्थापित संवैधानिक कानून को फिर से खोलने का प्रयास बताया है. पंजाब बनाम राज्यपाल के प्रधान सचिव (2024) तेलंगाना और तमिलनाडु के फैसलों का हवाला देते हुए राज्य सरकार ने तर्क दिया है कि अनुच्छेद 143 (1) के तहत कोई नया कानून का महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं उठता है. जिससे यह रेफरेंस एक छिपी हुई अपील बन जाता है और इसे अनुत्तरित वापस कर दिया जाना चाहिए.
इससे पहले मामले की सुनवाई के दौरान केरल सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील के वेणुगोपाल ने राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए संदर्भ पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि यह मुद्दा सुनवाई योग्य नही है. संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से 14 संवैधानिक सवालों पर राय मांगी है. राष्ट्रपति ने पूछा है कि जब राज्यपाल को भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत कोई विधेयक प्रस्तुत किया जाता है कि उनके सामने संवैधानिक विकल्प क्या है?,
क्या राज्यपाल भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत किसी विधेयक को प्रस्तुत किए जाने पर अपने पास उपलब्ध सभी विकल्पों के प्रयोग करते समय मंत्री परिषद द्वारा दी गई सहायता और सलाह से बाध्य है? राष्ट्रपति ने कहा कि संविधान में राष्ट्रपति या राज्यपाल के विवेकाधीन निर्णय के लिए किसी समय-सीमा का उल्लेख नहीं है. यह निर्णय संविधान के संघीये ढांचे, कानूनों की एकरूपता, राष्ट्र की सुरक्षा और शक्तियों के पृथक्करण जैसे बहुआयामी विचारों पर आधारित है.
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-भारत एक्सप्रेस
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