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सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में हो रहे मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सपोर्ट में एक ओर याचिका की दायर

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग द्वारा बिहार में कराए जा रहे मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर एक और याचिका दायर की गई है. यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दायर की है. जस्टिस सुधांशू धूलिया और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय से डिफेक्ट क्लियर करने को कहा है.

उपाध्याय ने कोर्ट से किया आग्रह

उपाध्याय ने कोर्ट से आग्रह किया कि उनकी याचिका पर जल्द सुनवाई की जाए. उन्होंने कहा कि कम से कम कोर्ट नोटिस कर मामले को लंबित याचिका के साथ टैग कर दे. लेकिन कोर्ट ने नोटिस जारी करने से इनकार कर दिया. दायर याचिका में कहा गया है कि बिहार विधानसभा चुनाव से पहले हो रहा विशेष गहन परीक्षण बिल्कुल सही है. उन्होंने कहा है कि इस तरह के विशेष गहन पुनरीक्षण हर चुनाव से पहले होना चाहिए, ताकि विदेशी घुसपैठियों को रोका जा सके.

10 से अधिक याचिका की गई दायर

बता दें कि इसको लेकर 10 से अधिक याचिका खिलाफ दायर की गई है, जबकि सपोर्ट में भी एक याचिका दायर की गई है. कोर्ट पहले से ही 10 जुलाई को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर रखा है. पिछली सुनवाई में कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से चुनाव आयोग को याचिका की कॉपी मुहैया कराने का आदेश दिया था. दायर याचिकाओं में कहा गया है कि चुनाव आयोग का यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करता है. इस तरह से विशेष पुनरीक्षण से कई मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा सकते हैं, जिसके बड़े पैमाने पर नागरिकों के वोटिंग अधिकार प्रभावित हो सकते हैं.

चुनाव आयोग के इस फैसले से लाखों मतदाता हो सकते हैं वंचित

एडीआर द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग के इस फैसले से लाखों मतदाता अपने मताधिकार से वंचित हो सकते हैं. आयोग का यह फैसला मनमाना और गलत है. लिहाजा सुप्रीम कोर्ट इस मामले में दखल दें. याचिकाकर्ता के अनुमान के मुताबिक करीब तीन करोड़ ऐसे प्रवासी मतदाता है जो आयोग के इस फैसले के बाद मताधिकार से वंचित हो सकते हैं. याचिकाकर्ता का मानना है कि आयोग का यह आदेश स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की प्रक्रिया को कमजोर करता है.

आयोग द्वारा शुरू किए गए विशेष सघन मतदाता सूची पुनरीक्षण से ग्रामीण क्षेत्रों के मतदाता काफी परेशान है, क्योंकि पहचान के तौर पर जो दस्तावेज उनसे मांगा जा रहा है, उस उनके पास मौजूद नहीं है. याचिकाकर्ता का दावा है कि यह आदेश मनमाना, संविधान के मौलिक अधिकारों यानी अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (स्वतंत्रता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता), अनुच्छेद 325 और अनुच्छेद 326 (चुनावी अधिकार) का उल्लंघन करता है.

-भारत एक्सप्रेस 

गोपाल कृष्ण

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