दिल्ली आर्बिट्रेशन वीकेंड 2025 के तहत आयोजित समारोह के दौरान जस्टिस विक्रमनाथ ने एआई को लेकर कहा कि टेक्नोलॉजी सहायता हो सकती है, लेकिन न्याय के मूल में इंसानियत है, जिसे मैं हार्टबीट कहता हूं.
सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली हाई कोर्ट और दिल्ली इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर द्वारा आयोजित कार्यक्रम के दौरान जस्टिस विक्रमनाथ ने यह बातें कही है.
उन्होंने कहा कि मशीनें दस्तवेज़ों का विश्लेषण कर सकती हैं और पैटर्न ढूढ़ सकती है, लेकिन उनमें निष्पक्षता, सहानुभूति और अंतः करण नहीं होता है. उन्होंने आगे कहा कि प्रारंपरिक मुकदमों की धीमी गति के जवाब में आर्बिट्रेशन की व्यवस्था शुरू हुई थी.
उन्होंने कहा कि समय के साथ-साथ यह प्रक्रिया पेपर बंडल और डाक के पत्राचार से ऑनलाइन फाइलिंग और वर्चुअल सुनवाई तक पहुची. जस्टिस विक्रमनाथ ने कहा कि अगर आर्बिट्रेशन समय बचाने के लिए बना था, तो एआई के पास समय की परिभाषा ही बदलने की क्षमता है.
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं का हवाला दिया-जैसे Chartered Institute of Arbitrators की गाइडलाइंस, जिसमें आर्बिट्रेटर द्वारा एआई के इस्तेमाल का खुलासा जरूरी है और सिंगापुर इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर का गेटवे प्लेटफॉर्म जो केस मैनेजमेंट को डिजिटाइज कर रहा है.
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एआई के इस्तेमाल को लेकर भी उन्होंने चर्चा की. जस्टिस विक्रमनाथ ने कहा कि यदि एआई का दुरुपयोग हुआ तो आर्बिट्रेशन प्रक्रिया पर विश्वास डगमगा सकता है. वही मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस एन आनंद वेंकटेश ने कहा कि डिजिटल डेटाबेस, ट्रांसक्रिप्शन और एनोटेशन टूल्स ने पहले ही आर्बिट्रेशन की तस्वीर बदल दी है. लेकिन एआई एक नया युग लाता है, क्योंकि यह केवल आदेश मानने वाली मशीन नहीं है. बल्कि विश्लेषण और तर्क परीक्षण जैसी सक्रिय भूमिका निभा सकता है.
उन्होंने आगे कहा कि एआई अब सक्रिय प्रतिभागी बनने जा रहा है, जो आर्बिट्रेशन की मूलभूत कार्यप्रणाली को प्रभावित करेगा. जबकि इस कार्यक्रम में मौजूद सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एआई के खतरों की ओर इशारा किया. उन्होंने फर्जी केस लॉ और आदेश तैयार करने को लेकर खतरा बताया है.
एसजी मेहता ने हँसते हुए कहा कि जैसे कई बार लोकप्रिय लेखक अपने लिखे उपन्यास खुद नहीं लिखते, वैसे ही कभी-कभी न्यायाधीशों पर भी मजाक होता है कि वे फैसले खुद नहीं लिखते.
-भारत एक्सप्रेस
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