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सुप्रीम कोर्ट में डिजिटल परिवर्तन पर राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू, CJI सूर्यकांत ने किया AI का समर्थन

भारत की न्यायिक अवसंरचना को मजबूत बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में ‘न्यायिक प्रक्रिया पुनर्गठन और डिजिटल परिवर्तन’ पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू हो गया है. इसका आयोजन सुप्रीम कोर्ट की एडिशनल बिल्डिंग में किया गया है. सुप्रीम कोर्ट खुद इसकी मेजबानी कर रहा है. सीजेआई सूर्यकांत ने ई-कोर्ट परियोजना के तीसरे चरण की द्विवार्षिक रिपोर्ट का अनावरण किया है. इस पर केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने अपना संबोधन दिया. सुप्रीम कोर्ट ई-समिति के अध्यक्ष और जज जस्टिस विक्रम नाथ, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और जितिन प्रसाद ने भी उद्घाटन सत्र को संबोधित किया.

एआई (AI) के समावेश और नियमन पर सीजेआई का समर्थन

सम्मेलन के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के समावेश का समर्थन किया है. उन्होंने कहा कि गोपनीयता या नैतिक चिंताओं के कारण इस तकनीक से दूरी बनाने के बजाय, एक मजबूत प्रक्रियात्मक ढांचे के माध्यम से इसके उपयोग को विनियमित किया जाना चाहिए. सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि समाज के विकास के साथ-साथ उसकी सेवा करने वाली संस्थाओं का भी विकास होना चाहिए. हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि प्रौद्योगिकी की शक्ति का उपयोग करते हुए भी, आर्थिक, भौगोलिक या अन्य बाधाओं के बावजूद न्याय सभी के लिए सुलभ बना रहे?

डिजिटलीकरण और न्याय व्यवस्था की बदलती जरूरतें

सीजेआई ने आगे कहा कि अदालतों के डिजिटलीकरण और हाइब्रिड सुनवाई के माध्यम से ई-फाइलिंग ने न्याय व्यवस्था को हमारे समय की बदलती जरूरतों के प्रति अधिक संवेदनशील बना दिया है. लेकिन अगर इस प्रगति को वास्तव में सार्थक बनाना है, तो हमें केवल प्रौद्योगिकी को अपनाने से आगे बढ़कर उन प्रक्रियाओं की जांच करनी होगी, जिन्हें यह प्रौद्योगिकी सेवा प्रदान करना चाहती है.

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एआई के उपयोग में प्राइवेसी और मानवीय विशेषज्ञता का महत्व

सीजेआई ने कहा कि निर्णय लेने वाले उपकरणों में एआई का बढ़ता उपयोग गोपनीयता और स्वतंत्र निर्णय की सुरक्षा को लेकर जायज चिंताएं पैदा करता है. उन्होंने कहा कि मध्यस्थता की वैधता न केवल इसकी दक्षता से, बल्कि इस भरोसे से आती है कि निर्णय निष्पक्ष मानवीय विशेषज्ञता का परिणाम है. इसलिए समाधान तकनीक को पूरी तरह से त्यागने में नहीं, बल्कि एक प्रक्रियात्मक ढांचे के माध्यम से इसके उपयोग को नियंत्रित करने में है. उन्होंने यह भी कहा कि अदालतों को मध्यस्थता की कार्यवाही में निष्क्रिय रहना चाहिए और केवल स्पष्ट दुरुपयोग के मामले में ही हस्तक्षेप करना चाहिए.

गोपाल कृष्ण

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