Supreme Court Case: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम 2026 के खिलाफ दायर याचिकाओं पर केंद्र सरकार से 6 हफ्ते में जवाब मांगा है. विवाद की मुख्य वजह स्व-पहचान के अधिकार को खत्म कर मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट अनिवार्य करना है. याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह कानून 2014 के नालसा फैसले और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है.
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम 2026 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को जारी किया नोटिस, 6 सप्ताह में मांगा जवाब. सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ठ किया कि इस मामले की सुनवाई तीन जजों की पीठ करेगी. दायर याचिका में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की मान्यता, अधिकारों और संरक्षण को नियंत्रित करने वाले विभिन्न प्रविधानों में किए गए संशोधनों को चुनौती दी गई है.
यह याचिका ट्रांसजेंडर पर्सन परिषद के अध्यक्ष लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और जैनब जाविद पटेल की ओर से दाखिल की गई है. ट्रांसजेंडर संशोधन कानून को बीते 31 मार्च को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई थी. यह कानून इस बात को पुनर्परिभाषित करता है कि किसे ट्रांसजेंडर व्यक्ति माना जाएगा, साथ ही यह जबरन पहचान परिवर्तन और शारीरिक नुकसान जैसे गंभीर अपराधों से निपटने के लिए दंडात्मक प्रविधानों को भी मजबूत करता है.
हालांकि संशोधित कानून को लेकर विपक्षी दल व एलजीबीटीक्यू समूह सवाल उठा रहे हैं.
इस संशोधन में साल 2019 के कानून के आर्टिकल 4(2) हटाने का प्रस्ताव है. इसमें जेंडर के सेल्फ आइडेंटिफिकेशन के अधिकार का जिक्र था. नई परिभाषा के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति जिनका संबंध किन्नर, हिजड़ा, अरावनी या जोगता जैसे सामाजिक सांस्कृतिक पहचान वाले समुदाय से है, उन्हें ट्रांसजेंडर माना जाएगा. इसके अलावा इंटरसेक्स लोगों को भी इस परिभाषा के अन्तर्गत रखा गया है.
इसमें सबसे बड़ा बदलाव यह है कि यह 2019 कि तुलना में ट्रांसजेंडर पहचान को सीमित कर देती है. इसमें अब सेल्फ आइडेंटिफिकेशन वाले ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को जगह नहीं मिली है. इसके अलावा नए बिल में सजा का भी प्रावधान है, नए बिल में बच्चों को ट्रांसजेंडर बनाने पर आजीवन कारावास की सजा व 5 लाख रुपए जुर्माना का प्रावधान है.
वही बालिग के मामले में 10 साल तक कि सजा व दो लाख तक का जुर्माना हो सकता है. नए संशोधित बिल के मुताबिक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अब अपनी पहचान खुद तय करने का अधिकार नहीं होगा, ट्रांसजेंडर पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट आवश्यक होगी. ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ अपराधों के लिए सख्त सजा हो सकती है.
ऐसे में खुद को ट्रांसजेंडर मानने वाले लाखों लोग इस कैटेगरी से बाहर हो जाएंगे. 2019 के एक्ट में यह प्रावधान था कि कोई भी शख्स अपनी इच्छा से खुद को ट्रांसजेंडर घोषित कर सकता था और उसके बाद उसे डीएम से सर्टिफिकेट मिल जाता है.
लेकिन अब यह व्यवस्था समाप्त हो गई है और मेडिकल टेस्ट कराना जरूरी कर दिया गया है. मेडिकल टेस्ट के बाद ही डीएम किसी को ट्रांसजेंडर का सर्टिफिकेट दे पाएंगे. सुप्रीम कोर्ट ने नालसा बनाम भारत संघ 2014 के केस में यह फैसला सुनाया था कि खुद की पहचान मौलिक अधिकार है. कोई भी व्यक्ति यह तय कर सकता है कि वह पुरुष है, महिला है या फिर ट्रांसजेंडर है.
इसके लिए किसी मेडिकल जांच की जरूरत नहीं है. साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय कानून सेवा प्राधिकरण से जुड़े फैसले में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को मान्यता दी थी.
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-भारत एक्सप्रेस
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