देश के राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ के समान दर्जा देने और इसे देश के सभी शिक्षण संस्थानों में अनिवार्य रूप से बजाने व गाने की मांग को लेकर एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले से जुड़ी एक अहम ट्रांसफर याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को औपचारिक नोटिस जारी कर उनका जवाब तलब किया है. इस जनहित याचिका के सामने आने के बाद देश में राष्ट्रगीत के संवैधानिक और सामाजिक दर्जे को लेकर बहस एक बार फिर छिड़ गई है.
27 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ ने इस मामले की सुनवाई की. अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित इस याचिका को सीधे सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करने की मांग को स्वीकार करने पर विचार करते हुए केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया है.
याचिका में शीर्ष अदालत से मांग की गई है कि वह केंद्र और राज्य सरकारों को एक स्पष्ट और सख्त नीति बनाने का निर्देश दे, ताकि देश के सभी स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में हर कार्यदिवस पर ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान दोनों को समान रूप से बजाया और गाया जा सके.
वरिष्ठ अधिवक्ता और याचिकाकर्ता उपाध्याय द्वारा दायर इस याचिका में 24 जनवरी 1950 का ऐतिहासिक संदर्भ दिया गया है. याचिका में कहा गया है कि संविधान सभा के प्रथम अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपने ऐतिहासिक बयान में साफ तौर पर कहा था कि ‘वंदे मातरम’ को ‘जन-गण-मन’ के बराबर का दर्जा दिया जाएगा.
हालांकि, आजादी के बाद राष्ट्रगान के लिए तो कानूनी प्राथमिकताएं तय कर दी गईं, लेकिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की रीढ़ रहे ‘वंदे मातरम’ के लिए कोई ठोस कानून या स्पष्ट राष्ट्रीय नीति नहीं बनाई गई, जिसके कारण इसे वह औपचारिक प्रशासनिक सम्मान नहीं मिल सका जो राष्ट्रगान को प्राप्त है.
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याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि ‘वंदे मातरम’ हमारे समृद्ध इतिहास, राष्ट्रीय संप्रभुता, अखंडता और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इस एक गीत ने पूरे देश को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट किया था. याचिका में कहा गया है कि यदि कोई नागरिक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसका अनादर करता है, तो यह न केवल एक असामाजिक कृत्य माना जाएगा, बल्कि एक संप्रभु राष्ट्र के नागरिक के अधिकारों और अस्तित्व के लिए भी बेहद खतरनाक होगा. इसलिए प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होना चाहिए कि वह न केवल खुद इसका सम्मान करे, बल्कि इसका अनादर करने की कोशिश करने वालों को भी सख्ती से रोके.
-भारत एक्सप्रेस
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