नज़रिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीतिक प्रतिभा

एक रणनीतिक कदम, जिसने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में घोषणा की कि पूर्व प्रधानमंत्रियों पी वी नरसिम्हा राव और चौधरी चरण सिंह, हरित क्रांति के प्रणेता डॉ. एम एस स्वामीनाथन को भारत रत्न से सम्मानित किया जाएगा. मोदी सरकार के इस ऐलान को लोकसभा चुनाव से पहले एक तरह से मास्टरस्ट्रोक कदम माना जा रहा है.

चुनाव से ठीक कुछ महीने पहले मोदी सरकार की इस घोषणा को एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. जाट राजनीति में एक कद्दावर शख्सियत चौधरी चरण सिंह को सम्मानित करके, भाजपा का लक्ष्य उत्तर प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत करना है, जहां 2014 से जाट समुदाय बीजेपी का एक महत्वपूर्ण समर्थक रहा है. यह कदम विशेष रूप से हरियाणा में भी काफी महत्वपूर्ण है, जहां जाट समुदाय पिछले कुछ समय से बीजेपी से नाराज चल रहा है. इस घोषणा के बाद हरियाणा में जाटों के बीच कमजोर होती बीजेपी की सियासी जमीन मजबूत होने की उम्मीद भी की जा रही है. इसके अलावा चौधरी चरण सिंह के साथ संबंधों को और अधिक बल मिलने के साथ ही उनके पोते, जयंत चौधरी, जो राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) का नेतृत्व करते हैं, अब आगामी चुनाव में भाजपा के साथ गठबंधन कर रही है.

वहीं पी वी नरसिम्हा राव को भारत रत्न देने के राजनीतिक महत्व को भी कम करके नहीं आंका जा सकता. राव, जिन्होंने 1991 से 1996 तक प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया, ने देश को गहरे वित्तीय संकट से बाहर निकालने और आर्थिक सुधार शुरू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. राव को सम्मानित करने का निर्णय न केवल उनकी प्रशासनिक कौशल की मान्यता है, बल्कि उनके नेतृत्व पर भाजपा के रुख के बारे में एक स्पष्ट संदेश भी है जो पारिवारिक संबंधों पर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देता है. इस कदम को नेहरू-गांधी परिवार के साथ मतभेदों के कारण कांग्रेस पार्टी द्वारा राव की कथित उपेक्षा के प्रतिवाद के रूप में देखा जा रहा है.

अयोध्या में राम मंदिर के अभिषेक के ठीक बाद, पीवी नरसिम्हा राव को भारत रत्न देने का समय, इसके महत्व को और अधिक बढ़ा देता है. कांग्रेस के कुछ लोगों ने नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान गलत अनुमान लगाने के आरोप में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के लिए फंसाया. अब उन्हें सम्मानित करके, भाजपा रणनीतिक रूप से मंदिर मुद्दे पर खुद को मजबूत करने के साथ ऐतिहासिक घटनाओं पर कांग्रेस के रुख को चुनौती देती हुई दिखाई दे रही है.

यह कदम मोदी सरकार द्वारा भारत रत्न और अन्य पुरस्कारों के लिए चुने गए नामों की श्रृंखला का हिस्सा है. भाजपा के वरिष्ठ नेता और राम जन्मभूमि आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लालकृष्ण आडवाणी को पहले सम्मानित किया गया था, जो राम मंदिर को वास्तविकता बनाने में उनकी भूमिका की सरकार की स्वीकार्यता को दर्शाता है. यह कदम चुनावों से पहले महत्वपूर्ण मंदिर मुद्दे पर भाजपा के एजेंडे के अनुरूप है.

ओबीसी आरक्षण के प्रणेता और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देना एक और रणनीतिक कदम है. यह पिछड़ी जातियों के प्रति भाजपा की सहानुभूति और उनके उत्थान को लेकर चिंता का संकेत है, खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश में, जहां भाजपा सक्रिय रूप से इन समुदायों को लुभाने में लगी हुई है. यह कदम ऐसे समय आया जब विपक्ष जाति जनगणना की अपनी मांग को जनता के बीच उठाकर उनके साथ खड़े होने का दावा कर रहा है.

अपने दो कार्यकालों के दौरान, मोदी सरकार ने भारत रत्न देने वालों के नामों को बहुत ही चतुराई के साथ चुना है. पंडित मदन मोहन मालवीय और अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर प्रणब मुखर्जी, भूपेन हजारिका और नानाजी देशमुख तक, हर नाम ने एक राजनीतिक संदेश दिया है. ये सम्मान व्यक्तिगत उपलब्धियों को मान्यता देने से कहीं आगे जाते हैं; वे राजनीतिक संदेश देने के लिए एक बहुत ही मजबूत चेहरे के तौर पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है इसके साथ ही इन शख्सियतों के ऐसे आख्यानों को आकार देते हैं जो भाजपा की वैचारिक दृष्टि से मेल खाते हैं.

आखिर में, पी वी नरसिम्हा राव और चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न से सम्मानित किया जाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीतिक प्रतिभा को रेखांकित करता है. यह कदम रणनीतिक रूप से भाजपा के राजनीतिक उद्देश्यों के साथ संरेखित है, एक ऐसी पटकथा तैयार होती है जो विविध मतदाता आधारों के साथ प्रतिध्वनित होती है और राष्ट्रीय हित और समावेशी शासन के लिए पार्टी की प्रतिबद्धता को मजबूत करती है. जैसे-जैसे राजनीतिक परिदृश्य विकसित होगा, ये सावधानी से चुने गए सम्मान निस्संदेह सार्वजनिक धारणा को आकार देने और चुनावी परिणामों को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.

-भारत एक्सप्रेस

उपेन्द्र राय, सीएमडी / एडिटर-इन-चीफ, भारत एक्सप्रेस

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