दिल्ली-एनसीआर के सबसे प्रमुख और प्रतिष्ठित दुर्गा पूजा आयोजनों में शुमार ‘बालाका दुर्गोत्सव’ अपने 18वें वर्ष में भव्यता, वास्तुकला और ऐतिहासिक विरासत का नया कीर्तिमान रचने जा रहा है. 16 से 21 अक्टूबर 2026 तक नोएडा के सेक्टर-61 स्थित कम्युनिटी सेंटर में आयोजित हो रहे इस पांच दिवसीय शारदोत्सव में इस वर्ष भारत के ऐतिहासिक स्मारक ‘विक्टोरिया मेमोरियल’ का सजीव रूपांतरण देखने को मिल रहा है. इस उत्सव का समापन 21 अक्टूबर को पारंपरिक विजयादशमी सिंदूर खेला और मां दुर्गा के विसर्जन के साथ होगा.
खाली मैदानों पर बनने वाले पारंपरिक बांस-कपड़े के पंडालों से अलग, बालाका का यह पंडाल इंजीनियरिंग और वास्तुकला की एक नायाब मिसाल है. यह पंडाल किसी खाली प्लॉट पर नहीं, बल्कि सेक्टर-61 कम्युनिटी सेंटर की स्थायी इमारत के ऊपर एक जटिल ‘अडैप्टिव आर्किटेक्चरल ट्रांसफॉर्मेशन’ के जरिए तैयार किया गया है.
पंडाल का अग्रभाग हूबहू कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल की शाही बनावट को दर्शाता है. हर गुंबद, मेहराबदार खिड़कियां, नक्काशीदार खंभे और गलियारे इस बारीकी से तराशे गए हैं कि इसके पीछे का पक्का कंक्रीट ढांचा पूरी तरह छिप गया है.
बालाका दुर्गोत्सव अपनी समृद्ध सांस्कृतिक संध्याओं के लिए पूरे उत्तर भारत में विख्यात है. 16 से 20 अक्टूबर तक प्रतिदिन शाम को विविध सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आयोजित हो रही हैं.
वर्ष 2008 में कुछ परिवारों के आत्मीय प्रयास से शुरू हुआ बालाका दुर्गोत्सव आज नोएडा-एनसीआर की ‘टॉप 5 दुर्गा पूजा’ में अपनी जगह बना चुका है. यह संस्था बंगाली कल्चरल एसोसिएशन (पंजीकरण संख्या: 3291/2016) के अंतर्गत संचालित होती है. बालाका केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘अटेरू अरण्यम’ ट्री प्लांटेशन ड्राइव, वंचित बच्चों के लिए वस्त्र-भोजन वितरण और रक्तदान जैसे सामाजिक सरोकारों से सालभर जुड़ी रहती है.
बालाका दुर्गोत्सव का पंडाल नोएडा के प्राइम लोकेशन पर स्थित है, जहां दिल्ली, गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा से आसानी से पहुंचा जा सकता है:
इस वर्ष बालाका दुर्गोत्सव का सबसे पवित्र और भावुक आकर्षण मां दुर्गा की दिव्य प्रतिमा है. यह प्रतिमा एनसीआर के सबसे सम्मानित और पुरस्कार विजेता मूर्तिकार स्वर्गीय श्री सलिल भट्टाचार्य द्वारा अपने जीवन में गढ़ी गई अंतिम पूर्ण कलाकृति है.
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दशकों तक अपनी अप्रतिम शिल्पकला से मिट्टी में प्राण फूंकने वाले सलिल भट्टाचार्य की यह अंतिम कृति अब पवित्र कला के प्रति उनके जीवन की अमर श्रद्धांजलि बन चुकी है. श्रद्धालु इस पंडाल में आकर न केवल मां भगवती के अलौकिक दर्शन कर रहे हैं, बल्कि इस महान कलाकार की अंतिम धरोहर के साक्षी भी बन रहे हैं.
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