राजधानी दिल्ली के सिविल लाइन्स (शाम नाथ मार्ग) में आयोजित होने वाली ऐतिहासिक दिल्ली दुर्गा पूजा समिति (कश्मीरी गेट दुर्गा पूजा) इस वर्ष अपने गौरवशाली इतिहास के 116वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है. वर्ष 1910 में दिल्ली में बसे प्रवासी बंगाली समुदाय द्वारा शुरू की गई यह पूजा आज पूरे दिल्ली-NCR की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित दुर्गा पूजा बन चुकी है. इस वर्ष भी उत्सव को भव्य और सफल बनाने के लिए 500 से अधिक श्रद्धालु और वॉलेंटियर्स दिन-रात सेवा में जुटे हुए हैं.
‘न्यूक्लियर’ नहीं ‘जॉइंट फैमिली’ का संदेश
इस वर्ष की पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज को एक बेहद संवेदनशील संदेश भी दे रही है. इस वर्ष की थीम ‘मानव विकास’ (Human Development) पर आधारित है. इस संबंध में विशेष जानकारी देते हुए समिति के जनरल सेक्रेटरी (महासचिव) सुभाषीश घोषाल ने बताया-
“हमारी समिति की पूजा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि मां दुर्गा की प्रतिमा को ‘एक चाला’ (एक ही ढांचे या फ्रेम) पर तैयार किया गया है. इसका तात्पर्य यह है कि भगवान गणेश और देवी सरस्वती की मूर्तियां अलग-अलग ढांचे पर न होकर, माँ दुर्गा की मुख्य प्रतिमा का ही एक हिस्सा हैं.”
घोषाल ने आगे इसके पीछे की गहरी सामाजिक सोच को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह थीम हमारी उस सदियों पुरानी साल भर की परंपरा पर आधारित है, जो आज के दौर में एकाकी परिवारों (Nuclear Families) के बजाय संयुक्त परिवारों (Joint Families) के साथ मिलकर रहने का बड़ा संदेश देती है.
18 फीट ऊंची प्रतिमा का इको-फ्रेंडली विसर्जन
पंडाल में स्थापित मां दुर्गा की यह भव्य प्रतिमा लगभग 18 फीट ऊंची और 12 फीट चौड़ी है. पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए समिति ने पूरी प्रतिमा को इको-फ्रेंडली (पर्यावरण-अनुकूल) सामग्रियों से तैयार करवाया है. यमुना नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए, दशमी के दिन मां दुर्गा का विसर्जन निरंकारी कॉलोनी में विशेष रूप से बनाए गए एक कृत्रिम तालाब में किया जाएगा.
सांस्कृतिक उत्सव की धूम
इस वर्ष पंडाल में आने वाले भक्तों और दर्शकों के लिए कला और संगीत का एक अद्भुत संगम तैयार किया गया है. उत्सव की शुरुआत लोक नृत्यों और पारंपरिक शहनाई वादन के साथ हुई, जिसने पूरे माहौल को भक्तिमय कर दिया. आने वाले दिनों में आयोजित होने वाले अन्य मुख्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शामिल हैं.
- अल्पना (Alpona): बंगाल की पारंपरिक लोक कला (रंगोली) की खूबसूरत प्रस्तुतियां
- शंख ध्वनि (Shanko Dhwani): महिलाओं और श्रद्धालुओं द्वारा पवित्र शंखनाद की प्रतियोगिता
- शास्त्रीय नृत्य: देश के दो सबसे प्रतिष्ठित नृत्य रूपों, भरतनाट्यम और कथक की मंत्रमुग्ध कर देने वाली प्रस्तुतियां
- बांसुरी वादन: सुरीली बांसुरी की तानों से सजी संगीतमय शाम
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अनेकता में एकता का महापर्व
नवरात्रि का यह नौ दिवसीय त्योहार देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है, लेकिन इसका मूल तत्व एक ही है ‘अधर्म पर धर्म की विजय’. जहां उत्तर भारत में लोग इन नौ दिनों में उपवास रखकर मां के नौ स्वरूपों की आराधना करते हैं, वहीं गुजरात में गरबा और डांडिया की धूम रहती है. आंध्र प्रदेश में इसे प्रकृति के उत्सव ‘बथुकम्मा’ के रूप में मनाया जाता है, तो बंगाली समुदाय इसे ‘दुर्गा पूजा’ के रूप में मनाता है.
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