Facts About Arjuna Chariot Mahabharata
Facts About Arjuna Chariot Mahabharata: द्वापर युग में लड़ा गया महाभारत का युद्ध मानव इतिहास के सबसे विनाशकारी युद्धों में से एक माना जाता है. इस युद्ध में कुरुक्षेत्र के मैदान पर पांडवों की तरफ से महारथी अर्जुन ने अपने पराक्रम से पूरी कौरव सेना को तहस-नहस कर डाला था. लेकिन क्या आप जानते हैं कि अर्जुन जिस रथ पर सवार होकर युद्ध लड़ रहे थे, वह कोई साधारण रथ नहीं था. उस रथ का नाम ‘नंदीघोष’ था, जो बेहद शक्तिशाली और चमत्कारी शक्तियों से लैस था.
पौराणिक कथाओं के अनुसार, अर्जुन को यह दिव्य रथ खांडव वन दहन के समय अग्निदेव ने उपहार स्वरूप दिया था. जब अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण ने खांडव वन को जलाने में अग्निदेव की मदद की थी, तब प्रसन्न होकर अग्निदेव ने अर्जुन को गांडीव धनुष, कभी न खत्म होने वाले बाणों का तरकश और यह सोने का बना अभेद्य रथ भेंट किया था. इस रथ का निर्माण स्वयं देवताओं के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने किया था.
अर्जुन के इस दिव्य रथ को खींचने के लिए चार सफेद रंग के घोड़े जुते हुए थे. इन चारों घोड़ों के नाम शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक थे. ये कोई मामूली घोड़े नहीं थे, बल्कि गंधर्व लोक के दिव्य घोड़े थे. इनके पास ऐसी जादुई शक्ति थी कि ये कभी भी थकते नहीं थे और युद्ध के मैदान में बिजली की रफ्तार से दौड़ सकते थे. खास बात यह थी कि अगर युद्ध में इनमें से कोई घोड़ा घायल या मृत भी हो जाता, तो उसकी जगह तुरंत एक नया दिव्य घोड़ा अपने आप प्रकट हो जाता था.
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इस रथ की सबसे विशेषता इसका ध्वज (झंडा) भी था, जिसे ‘कपिध्वज’ कहा जाता है. इस ध्वज पर स्वयं वानर राज हनुमान जी विराजमान थे. हनुमान जी की उपस्थिति के कारण अर्जुन का यह रथ पूरी तरह से सुरक्षित था. कौरवों के बड़े से बड़े अस्त्र-शस्त्र भी हनुमान जी के कवच के कारण इस रथ का बाल भी बांका नहीं कर पाते थे. इसके अलावा, इस रथ के सारथी स्वयं ब्रह्मांड के नायक भगवान श्रीकृष्ण थे. जिस रथ के रक्षक कृष्ण और हनुमान जी हों, उस रथ को हरा पाना तीनों लोकों में किसी के वश में नहीं था.
भारत एक्स्प्रेस
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