उत्तर प्रदेश विधान परिषद चुनाव
Why Congress Surrender In MLC Election: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 के लिए अब बस कुछ महीने बचे हैं. इससे पहले समाजवादी पार्टी से बराबरी की सीटें मांगने वाली कांग्रेस पहले ही इम्तिहान में घुटने टेक दिए हैं. विधान परिषद चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी ने अपने-अपने योद्धा मैदान में उतार दिए, लेकिन ऐन वक्त पर कांग्रेस पूरी चुनावी प्रक्रिया से ही गायब हो गई.
11 में से एक भी सीट पर पार्टी ने अधिकृत सिंबल नहीं दिया. इसे राजनीतिक विश्लेषक सपा के दबाव के आगे कांग्रेस का ‘खामोश सरेंडर’ कह रहे हैं. क्योंकि, स्नातक और शिक्षक कोटे की 11 विधान परिषद चुनाव को 2027 का सेमीफाइनल माना जा रहा था.
यह महज चुनाव न लड़ने का फैसला नहीं है, बल्कि उस जमीनी कार्यकर्ता की पीठ में छुरा घोंपने जैसा है जो पिछले 10 से 12 महीनों से हाथ में तिरंगा थामे गांव-गांव, कॉलेज-कॉलेज घूमकर पार्टी के लिए वोटर लिस्ट तैयार कर रहा था. नामांकन के आखिरी दिन तक प्रदेश नेतृत्व का भरोसा मिलता रहा, लेकिन पर्चा भरने की घड़ी आई तो फोन काट दिए गए और दिल्ली का रुख कर लिया गया.
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पार्टी ने बाकायदा अभियान चलाकर एक साल पहले ही प्रत्याशियों के नामों का ऐलान कर दिया था. इन प्रत्याशियों को घर-घर जाकर स्नातक और शिक्षक मतदाताओं को जोड़ने का टास्क दिया गया था. पार्टी ने करीब 8 लाख से ज्यादा वोटर बनाने का दम भरा था.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस का यह फैसला रणनीति से ज्यादा अपनी बची-खुची साख बचाने की कवायद है. MLC चुनाव में ग्रेजुएट और शिक्षक मतदाता होते हैं, जहां केवल हवा-हवाई बयानों से वोट नहीं मिलता. यदि इन 11 सीटों पर कांग्रेस बुरी तरह हार जाती और तीसरे-चौथे नंबर पर खिसक जाती, तो 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा के सामने 50-60 सीटें मांगने की उसकी हैसियत ही खत्म हो जाती.
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सपा किसी भी सूरत में उच्च सदन के इस चुनाव में कांग्रेस को ज्यादा स्पेस देने के मूड में नहीं थी. कांग्रेस ने मुकाबला लड़ने के बजाय मैदान खाली करके सपा के सामने वॉकओवर देना ही मुफीद समझा. खैर देखना होगा की विधान परिषद में अघोषित हार के बाद कांग्रेस 2027 के चुनाव में कितनी रिकवरी कर पाती है.
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