आज महाराष्ट्र की राजनीति के उस “सत्ता के सम्राट” को याद किया जा रहा है, जिन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा, कोई सरकारी पद नहीं संभाला, फिर भी दशकों तक मुंबई से लेकर दिल्ली तक के सत्ता समीकरणों को प्रभावित करने की हैसियत में रहा. बालासाहेब ठाकरे का जन्म 23 जनवरी 1926 को पुणे में हुआ था. वे नौ भाई-बहनों में सबसे बड़े थे. उनके पिता केशव ठाकरे सामाजिक कार्यकर्ता और मराठी राज्य आंदोलन के योद्धा थे.
उनका सफर कार्टूनिस्ट से शुरू हुआ. 1950 के दशक में फ्री प्रेस जर्नल में कार्टूनिस्ट बने, जहां उनकी रेखाएं जापान के असाही शिंबुन और न्यूयॉर्क टाइम्स तक पहुंचीं. 1960 में भाई के साथ ‘मार्मिक’ साप्ताहिक शुरू किया, जिसमें ‘मराठी माणुस’ की आवाज बुलंद हुई. 19 जून 1966 को शिवसेना का गठन किया – मुख्य उद्देश्य ‘महाराष्ट्र फॉर महाराष्ट्रीयन्स’. शुरुआत क्षेत्रीय अस्मिता से हुई, लेकिन बाद में यह उग्र हिंदुत्व की ओर बढ़ी.
बालासाहेब का व्यक्तित्व बेबाक था. टकराव से बेखौफ, बयानबाजी में किसी की परवाह नहीं. वे कहते थे, “शिवसेना सिर्फ संगठन नहीं, छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना है.” उन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन 1995 में शिवसेना-बीजेपी गठबंधन सत्ता में आया तो कहा गया कि “सरकार का रिमोट कंट्रोल मातोश्री से चलता है.” वे पर्दे के पीछे रहे – विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री और सांसद बनाए, लेकिन खुद कभी आगे नहीं आए. उन्हें ‘हिंदू हृदयसम्राट’ कहा गया, आलोचकों ने ‘महाराष्ट्र का गॉडफादर’.
उनके विवाद भी बड़े थे. 1992 में बाबरी मस्जिद गिरने पर कहा, “मस्जिद शिवसैनिकों ने गिराई है. यह हमारे लिए गर्व की बात है.” 2002 में “हिंदुओं को आत्मघाती दस्ते बनाने चाहिए” जैसे बयान दिए. इमरजेंसी में इंदिरा गांधी का समर्थन किया, बाद में राष्ट्रपति चुनावों में गठबंधन तोड़े. चुनाव आयोग ने 1999-2005 तक छह साल मताधिकार छीना. 1987 का नारा “गर्व से कहो हम हिंदू हैं” आज भी गूंजता है.
उत्तराधिकार का दर्द भी रहा. उद्धव को कमान सौंपी, लेकिन राज ठाकरे अलग होकर मनसे बनाए. फिर भी, बालासाहेब की सिंहगर्जना आज भी महाराष्ट्र में गूंज रही है. जन्मशताब्दी वर्ष की शुरुआत में मुंबई के षण्मुखानंद सभागृह में भव्य सोहला हुआ, जहां उद्धव और राज ठाकरे एक मंच पर आए. यह ऐतिहासिक एकता का संकेत है. सामना के अग्रलेख में लिखा गया:
“सिंहगर्जनेची शताब्दी! सिंहगर्जनेला शंभर वर्षे झाली तरी ती जमिनीवर, आसमंतात घुमतच आहे.”
बालासाहेब ठाकरे पर किताबें भी उनकी विरासत को जीवंत रखती हैं:
बालासाहेब का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने आम मराठी व्यक्ति को अपनी ताकत महसूस कराई. चुनाव न लड़कर भी सत्ता का अनोखा सम्राट बने. उनकी बेबाकी, व्यंग्य और जन-भावनाओं से जुड़ाव आज भी लोगों की स्मृतियों में है.
ये भी पढ़ें: शादी में बदली जेल की लव स्टोरी, उम्रकैद के दोषी प्रिया सेठ और हनुमान प्रसाद की प्रेम कहानी
-भारत एक्सप्रेस
अलीगढ़ में तीन तलाक के बाद महिला से दो देवरों द्वारा जबरन हलाला कराने का…
केंद्र सरकार ने 5 अक्टूबर 2026 को दिल्ली, गुजरात और तेलंगाना हाईकोर्ट में कार्यवाहक मुख्य…
ग्वालियर में 20 रुपये के मोमोज की संख्या कम होने पर सवाल पूछना एक छात्र…
नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर विंटर शेड्यूल से पहले सस्ती बसों, ऐप टैक्सियों और फ्री…
उमेश पाल ट्रिपल मर्डर केस के 5 लाख के इनामी आरोपी अरमान बिहारी को प्रयागराज…
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गाइ परमेलिन को भारत की समृद्ध विरासत और…