नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस बार कई मायनों में अहम रहा. भारत की अध्यक्षता में हुए इस सम्मेलन में संगठन के 11 सदस्य देशों में से आठ देशों के राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री खुद शामिल हुए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत मंडपम में पहुंचे विदेशी नेताओं की मेजबानी की. सम्मेलन का मुख्य विषय था “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability”, यानी बदलती वैश्विक परिस्थितियों में मजबूती, नवाचार, सहयोग और टिकाऊ विकास पर जोर देना.
बैठक में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी, इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबिय अहमद और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो जैसे प्रमुख नेता मौजूद रहे.
हालांकि तीन सदस्य देशों ब्राजील, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के शीर्ष नेता सम्मेलन में खुद नहीं पहुंचे. इन देशों ने अपनी जगह वरिष्ठ प्रतिनिधियों को भेजा. ऐसे में सवाल उठा कि आखिर इन तीनों देशों के नेता दिल्ली क्यों नहीं आए?
ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा की गैरमौजूदगी के पीछे मुख्य वजह घरेलू राजनीति बताई गई. अक्टूबर में होने वाले चुनावों की तैयारियों और प्रचार अभियान के चलते लूला अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी सीमित कर रहे हैं.
उनकी जगह ब्राजील के विदेश मंत्री माउरो विएरा ने सम्मेलन में देश का प्रतिनिधित्व किया. लूला पहले भी संकेत दे चुके थे कि चुनावी व्यस्तताओं के कारण वह कुछ अंतरराष्ट्रीय बैठकों से दूर रह सकते हैं.
संयुक्त अरब अमीरात की ओर से राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान सम्मेलन में शामिल नहीं हुए. उनकी जगह अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने यूएई का प्रतिनिधित्व किया. उनकी मौजूदगी को भी महत्वपूर्ण माना गया, खासकर इसलिए क्योंकि सम्मेलन के दौरान पश्चिम एशिया की स्थिति पर चर्चा हुई.
सऊदी अरब की ओर से विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद दिल्ली पहुंचे. सऊदी अरब की ब्रिक्स सदस्यता को लेकर पहले से कुछ अस्पष्टता रही है, लेकिन सम्मेलन में उसकी मंत्री स्तर पर सक्रिय भागीदारी बनी रही.
ब्रिक्स के विस्तार के बाद अब संगठन में 11 सदस्य देश हैं. ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, यूएई और सऊदी अरब.
इन देशों की सामूहिक आर्थिक और जनसंख्या ताकत काफी बड़ी है. ब्रिक्स देश दुनिया की करीब आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं और वैश्विक जीडीपी में लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं. यही वजह है कि दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था में इस समूह की भूमिका लगातार बढ़ रही है.
लेकिन सदस्यों की संख्या बढ़ने के साथ चुनौतियां भी बढ़ी हैं. हर देश के अपने रणनीतिक हित हैं और कई मुद्दों पर उनकी राय एक-दूसरे से अलग है. पश्चिम एशिया का तनाव इसका बड़ा उदाहरण है.
सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में नई दिल्ली घोषणापत्र का सर्वसम्मति से पारित होना रहा. इसे लेकर सदस्य देशों के बीच काफी बातचीत हुई और कई मुद्दों पर सहमति बनाने के लिए लंबी चर्चा चली.
पश्चिम एशिया में जारी तनाव, ईरान और यूएई के बीच मतभेद तथा दूसरे भू-राजनीतिक मुद्दों को देखते हुए सभी देशों को एक साझा दस्तावेज पर राजी करना आसान नहीं था. इसके बावजूद भारत की अध्यक्षता में बातचीत आगे बढ़ी और घोषणापत्र पर सहमति बन गई.
घोषणापत्र में पश्चिम एशिया में अधिकतम संयम बरतने की अपील की गई. आतंकवाद की निंदा करते हुए पहलगाम हमले का भी जिक्र किया गया. इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और उसमें भारत व ब्राजील की बड़ी भूमिका के समर्थन की बात कही गई.
व्यापार के मोर्चे पर भी महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए. एकतरफा टैरिफ और प्रतिबंधों के विरोध के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया गया.
सम्मेलन की एक और बड़ी घटना चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा रही. करीब सात साल बाद उनकी भारत यात्रा को दोनों देशों के संबंधों में सुधार की कोशिशों के लिहाज से अहम माना गया.
भारत और चीन के रिश्तों में पिछले कुछ वर्षों में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं. ऐसे में ब्रिक्स के मंच पर दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की मौजूदगी ने इस बैठक को अतिरिक्त महत्व दिया.
इसी तरह ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और यूएई के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच हुई मुलाकात भी चर्चा में रही. दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद रहे हैं, इसलिए उनकी बातचीत को क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया.
इस सम्मेलन का असली संदेश शायद यही रहा कि ब्रिक्स का विस्तार जितना बड़ा हुआ है, उसके भीतर सहमति बनाना उतना ही चुनौतीपूर्ण हो गया है. सदस्य देशों के हित हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं हैं, लेकिन इसके बावजूद भारत घोषणापत्र को सर्वसम्मति से पारित कराने में सफल रहा.
भारत ब्रिक्स को केवल आर्थिक सहयोग का मंच बनाने के बजाय वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने वाले समूह के रूप में भी आगे बढ़ाना चाहता है. संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाओं में सुधार, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करने जैसे मुद्दे इसी दिशा की ओर इशारा करते हैं.
यह भी पढ़ें-सूर्य नमस्कार से सिर्फ वजन ही नहीं, तनाव भी होगा कम; जानिए 12 आसनों का साइंस और सही तरीका
-भारत एक्सप्रेस
Salman Khan Controversy: सलमान खान ने बिग बॉस में खुलासा किया कि कोर्ट केस और…
Kal ka Mausam: IMD ने 5 से 7 अक्टूबर के दौरान बिहार, झारखंड और ओडिशा…
Premanand Maharaj Ashram Case: शिष्य दीपक लोधी की मौत के 9 दिन बाद प्रेमानंद महाराज…
Captain Smit Machchhar: नेतन्याहू ने भारतीय पायलट स्मित मच्छार की बहादुरी की तारीफ कर उन्हें…
Saudi Riyadh Missile Attack: सऊदी अरब की राजधानी रियाद में अरामको की सुविधा को बैलिस्टिक…
Aaj Ka Panchang: जानें आश्विन कृष्ण नवमी तिथि, पुनर्वसु नक्षत्र, शुभ मुहूर्त, अभिजीत मुहूर्त, राहुकाल,…