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क्या कभी भारत का हिस्सा था दुबई और कुवैत? जानिए किस फैसले ने हमेशा के लिए बदल दी खाड़ी देशों की तस्वीर

आज अगर कोई दुबई, अबू धाबी, कुवैत, बहरीन, कतर या ओमान का नाम ले, तो शायद ही किसी भारतीय के जेहन में ब्रिटिश भारत की तस्वीर उभरे. लेकिन करीब एक सदी पहले कहानी कुछ और थी. खाड़ी का एक बड़ा हिस्सा उस प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ था, जिसे ब्रिटिश भारत के तहत चलाया जाता था. इतिहासकार सैम डैलरिम्पल ने अपनी किताब Shattered Lands में इसी भूले-बिसरे इतिहास को सामने रखा है.

उनके मुताबिक, बीसवीं सदी की शुरुआत में अरब प्रायद्वीप का करीब एक-तिहाई हिस्सा किसी न किसी रूप में ब्रिटिश भारतीय प्रशासन से जुड़ा हुआ था. अदन से लेकर कुवैत तक फैले कई अरब संरक्षित इलाकों की देखरेख दिल्ली से होती थी. वहां तैनात अधिकारी भारतीय राजनीतिक सेवा के तहत काम करते थे और भारतीय सैनिकों की भी बड़ी भूमिका थी.

दिल्ली से चलता था खाड़ी का कामकाज

यह रिश्ता केवल नाम या कागजों तक सीमित नहीं था. खाड़ी के इन इलाकों में ब्रिटिश भारत की प्रशासनिक और सैन्य मौजूदगी साफ दिखाई देती थी. भारतीय सैनिक वहां तैनात रहते थे और कई मामलों में उनकी जवाबदेही वायसराय के प्रति होती थी.

अदन इसका खास उदाहरण था. आज यह यमन का हिस्सा है, लेकिन उस दौर में इसे बंबई प्रेसिडेंसी से जोड़ा गया था. इसे भारत का सबसे पश्चिमी बंदरगाह भी माना जाता था. वहां भारतीय पासपोर्ट जारी होते थे और भारतीय रुपया इस्तेमाल किया जाता था.

खाड़ी के कई शेख और सुल्तान भारत आते-जाते थे और कुछ ने यहां शिक्षा भी हासिल की. व्यापार से लेकर सुरक्षा और कूटनीतिक मामलों तक, भारत सरकार की भूमिका अहम थी. ब्रिटिश नक्शों में कई बार इन इलाकों की स्थिति को जानबूझकर अस्पष्ट रखा जाता था, क्योंकि ऑटोमन साम्राज्य के साथ तनाव बढ़ने का खतरा था. लेकिन प्रशासनिक स्तर पर दिल्ली का प्रभाव काफी मजबूत था.

इतिहास का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि 1889 के Interpretation Act के तहत इन संरक्षित क्षेत्रों की कानूनी स्थिति ब्रिटिश भारत से जुड़ी हुई थी. आधिकारिक सूचियों में भारत से जुड़ी रियासतों का क्रम अबू धाबी से शुरू होने जैसी बातें भी दर्ज थीं.

1947 में बदली पूरी तस्वीर

भारत की आजादी का समय नजदीक आते ही सवाल उठा कि खाड़ी के इन इलाकों का भविष्य क्या होगा. ब्रिटेन के सामने यह विकल्प था कि वहां की प्रशासनिक जिम्मेदारी स्वतंत्र भारत या पाकिस्तान को दी जाए.

बताया जाता है कि इस संभावना पर विचार भी हुआ था. हालांकि भारतीय अधिकारियों ने इसमें खास दिलचस्पी नहीं दिखाई. उस समय भारत खुद विभाजन, प्रशासनिक बदलाव और आजादी की बड़ी चुनौतियों से गुजर रहा था. खाड़ी का प्रशासन भारतीय नेतृत्व को अतिरिक्त बोझ जैसा लग रहा था.

दूसरी तरफ, ब्रिटिश अधिकारियों का एक वर्ग भी नहीं चाहता था कि खाड़ी के अरब शासकों के साथ संबंधों की जिम्मेदारी भारत या पाकिस्तान को मिले. आखिरकार ब्रिटेन ने अलग रास्ता चुना.

1 अप्रैल 1947 को दुबई समेत कई खाड़ी राज्यों को औपचारिक रूप से ब्रिटिश भारत की प्रशासनिक व्यवस्था से अलग कर दिया गया. इसके बाद इन इलाकों का कामकाज सीधे ब्रिटेन के विदेश कार्यालय के अधीन चला गया. भारतीय राजनीतिक सेवा के अधिकारी और भारतीय सैनिक भी वहां से हटने लगे.

भारत की आजादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन ने देशी रियासतों के भारत में विलय की बड़ी मुहिम शुरू की. सैकड़ों रियासतें भारतीय संघ का हिस्सा बनीं. लेकिन खाड़ी के अरब शेखडम उस प्रक्रिया में शामिल नहीं हुए.

इसकी सबसे बड़ी वजह यही थी कि वे आजादी से कुछ महीने पहले ही ब्रिटिश भारत की प्रशासनिक व्यवस्था से अलग किए जा चुके थे. इसलिए जब भारत का राजनीतिक नक्शा दोबारा तैयार हो रहा था, तब ये इलाके उस प्रक्रिया के बाहर थे.

आने वाले दशकों में खाड़ी की राजनीति ने भी बड़ा बदलाव देखा. 1971 में ब्रिटेन ने खाड़ी क्षेत्र में अपने संरक्षण की व्यवस्था समाप्त की और इसी दौर में संयुक्त अरब अमीरात जैसे नए राष्ट्र अस्तित्व में आए.

इतिहास का एक भूला हुआ मोड़

आज भारत और खाड़ी देशों के बीच मजबूत कारोबारी, ऊर्जा और प्रवासी संबंध हैं, लेकिन यह तथ्य कम ही चर्चा में आता है कि कभी इन रिश्तों की प्रशासनिक डोर दिल्ली से जुड़ी हुई थी.

डैलरिम्पल की व्याख्या में 1947 का यह अलगाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद खाड़ी का राजनीतिक भविष्य पूरी तरह अलग दिशा में चला गया. बाद के वर्षों में इस क्षेत्र में तेल की विशाल संपदा सामने आई और खाड़ी दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक ताकतों में शामिल हो गई.

इसलिए पीछे मुड़कर देखें तो यह सवाल स्वाभाविक है कि अगर 1947 में फैसला कुछ और होता, तो भारत और खाड़ी का रिश्ता आज कैसा होता?

बहरहाल, इतिहास का सच यह है कि आज जिन देशों को हम अलग-अलग राष्ट्रों के रूप में जानते हैं, उनकी वर्तमान सीमाएं हमेशा से ऐसी नहीं थीं. ब्रिटिश भारत की प्रशासनिक और राजनीतिक पहुंच कभी अदन से लेकर रंगून तक फैली हुई थी. आज के भारत, पाकिस्तान और कई दूसरे देशों का नक्शा बनने की प्रक्रिया में कई ऐसे फैसले हुए, जिनका असर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचा.

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-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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