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तार आया है! 172 साल पहले आज ही शुरू हुई थी वह सेवा, जिसने भारत में संचार की दुनिया बदल दी

आज ही के दिन, 27 अप्रैल 1854 को भारत में आधुनिक संचार क्रांति की औपचारिक शुरुआत हुई. बंबई (मुंबई) से पुणे के बीच पहला आधिकारिक ‘तार’ भेजा गया. यह मात्र एक तकनीकी घटना नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की नींव को और मजबूत करने वाला एक निर्णायक कदम था.

रेलवे के बाद टेलीग्राफ व्यवस्था औपनिवेशिक भारत का दूसरा सबसे शक्तिशाली नियंत्रण साधन बन गई. हजारों मील दूर स्थित कलकत्ता के गवर्नर-जनरल को बंबई, मद्रास या लाहौर से क्षणों में संदेश मिलने लगा. सेना की आवाजाही, विद्रोह की सूचना, प्रशासनिक आदेश और व्यापारिक सूचनाएँ—सब कुछ अब पहले से कहीं तेज़ गति से संभव हो गया. ब्रिटिश साम्राज्य के लिए यह ‘तार’ वास्तव में एक अदृश्य लेकिन अत्यंत प्रभावी शृंखला साबित हुई, जिसने विशाल उपमहाद्वीप को केंद्रीय शक्ति के अधीन रखने में मदद की.

इसी कारण स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी नेता दोनों ही टेलीग्राफ लाइनों को निशाना बनाते थे. रेलवे स्टेशनों और टेलीग्राफ कार्यालयों पर हमले आम हो गए, क्योंकि वे जानते थे कि इन दो व्यवस्थाओं के बिना ब्रिटिश प्रशासन का ढांचा लड़खड़ा जाएगा.

भारतीय जीवन में तार की गहरी पैठ

धीरे-धीरे टेलीग्राफ केवल शासन का औजार नहीं रहा. यह भारतीय समाज का अभिन्न अंग बन गया. सरकारी दफ्तरों, अदालतों, व्यापारियों, ज़मींदारों और आम परिवारों तक में इसकी उपस्थिति महसूस होने लगी. दूर-दराज के शहरों और कस्बों में रहने वाले लोग अब रिश्तेदारों की खबर तार के माध्यम से प्राप्त कर सकते थे.

राष्ट्रीय आंदोलन में भी तार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. कांग्रेस के सत्रों के आयोजन, आंदोलनों के समन्वय, गिरफ्तारियों की सूचना और महात्मा गांधी व अन्य नेताओं के संदेश—सब कुछ तार के जरिए तेज़ी से फैलता था.

पर आम भारतीय घरों में ‘तार’ का नाम सुनते ही एक अलग तरह का भय और बेचैनी फैल जाती थी. “तार आया है” वाक्य अक्सर किसी बुरी खबर बीमारी, दुर्घटना या मृत्यु का पूर्वानुमान माना जाता था. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने अपनी आत्मकथात्मक रचना *कुल्ली भाट* में इन्फ्लूएंजा महामारी के दौरान अपनी पत्नी की गंभीर बीमारी की सूचना वाले तार का मार्मिक वर्णन किया है. उस समय तार न केवल सूचना का साधन था, बल्कि भावनात्मक आघात का प्रतीक भी बन चुका था.

अंत और विरासत

टेलीग्राफ सेवा ने पूरे 159 वर्ष भारत की सेवा की. अंततः 14 जुलाई 2013 को भारत सरकार ने इस ऐतिहासिक सेवा को औपचारिक रूप से बंद कर दिया. मोबाइल फोन, इंटरनेट और त्वरित डिजिटल संचार के युग में तार व्यवस्था आर्थिक और तकनीकी रूप से पुरानी पड़ चुकी थी. आखिरी तार भेजने के बाद टेलीग्राफ कार्यालयों में एक युग का अंत हो गया.

फिर भी, भारतीय टेलीग्राफ का इतिहास सिर्फ़ तकनीक का नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों का भी इतिहास है. इस विषय पर इतिहासकार Amelia Bonea की पुस्तक The News of Empire: Telegraphy, Journalism, and the Politics of Reporting in Colonial India विशेष रूप से उल्लेखनीय है. यह किताब टेलीग्राफ व्यवस्था के तकनीकी विकास, पत्रकारिता पर इसके प्रभाव और औपनिवेशिक शक्ति के साथ उसके संबंध को गहराई से विश्लेषित करती है.

आज जब हम एक क्लिक में पूरी दुनिया से जुड़ जाते हैं, तब 1854 के उस पहले तार को याद करना रोचक है जिसने भारत को आधुनिक संचार युग में प्रवेश कराया और जिसने एक विशाल साम्राज्य को नियंत्रित करने में मदद की, साथ ही आम भारतीयों के भावनात्मक जीवन को भी गहराई से प्रभावित किया.

तार अब इतिहास की किताबों में सिमट गया है, लेकिन उसकी याद आज भी उन पीढ़ियों को जोड़ती है जिन्होंने ‘तार आया है’ सुनकर दिल थाम लिया था.

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-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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