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राजीव मल्होत्रा की नई किताब ‘गंगा में विषधर’ पर छिड़ी बहस; पश्चिमी विचार, हार्वर्ड और भारतीय संस्कृति पर क्या हैं दावे?

भारतीय सभ्यता, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं पर लंबे समय से अध्ययन करने वाले लेखक और विचारक राजीव मल्होत्रा एक बार फिर चर्चा में हैं. उनकी चर्चित किताब ‘Breaking India’ के बाद अब उनकी अगली कृति ‘Snakes in the Ganga: Breaking India 2.0’ का हिंदी संस्करण ‘गंगा में विषधर’ के नाम से सामने आया है. इस किताब की सह-लेखिका विजया विश्वनाथन हैं, जबकि हिंदी संस्करण का संपादन अनुराग शर्मा ने किया है.

यह किताब भारत की सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक ढांचे और राष्ट्रीय एकता को लेकर कई गंभीर सवाल उठाती है. लेखक का दावा है कि आज भारत के सामने चुनौतियां केवल राजनीतिक या आर्थिक स्तर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विचारों, संस्थानों और वैश्विक नेटवर्क के स्तर पर भी मौजूद हैं.

‘गंगा में विषधर’ नाम के पीछे क्या है सोच?

किताब का शीर्षक अपने आप में एक बड़ा प्रतीक है. भारत में गंगा को पवित्रता, आस्था और जीवन का प्रतीक माना जाता है. करोड़ों लोग इस नदी को श्रद्धा के साथ देखते हैं. लेकिन किताब के लेखक इसी गंगा के रूपक के जरिए यह तर्क रखते हैं कि जिस तरह शांत और पवित्र दिखने वाली गंगा के भीतर छिपे खतरे हो सकते हैं, उसी तरह भारतीय समाज और संस्थानों के बीच भी कुछ ऐसी विचारधाराएं सक्रिय हो सकती हैं जो बाहर से सकारात्मक नजर आती हैं, लेकिन उनके प्रभाव को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं.

लेखक के अनुसार, ये ‘विषधर’ उन छिपी हुई चुनौतियों का प्रतीक हैं जो शिक्षा, संस्कृति, उद्योग और सामाजिक संस्थाओं के जरिए धीरे-धीरे प्रभाव बढ़ा रही हैं.

पश्चिमी विचारधाराओं और भारत के संदर्भ पर बहस

किताब में अमेरिका की क्रिटिकल रेस थ्योरी (CRT) को लेकर भी विस्तार से चर्चा की गई है. लेखकों का कहना है कि अमेरिका में नस्लीय भेदभाव को समझने के लिए विकसित यह विचारधारा भारत में सीधे लागू नहीं की जा सकती. उनके अनुसार, भारत में जाति व्यवस्था को नस्लीय संघर्ष के ढांचे में देखने की कोशिश की जा रही है, जिससे भारतीय समाज की जटिल वास्तविकताओं को सही तरीके से समझना मुश्किल हो सकता है.

वहीं, आलोचकों का कहना है कि सामाजिक असमानताओं पर चर्चा को केवल बाहरी प्रभाव बताकर खारिज नहीं किया जा सकता. उनके मुताबिक, भारत में जाति और सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर गंभीर बातचीत जरूरी है.

हार्वर्ड और वैश्विक संस्थानों की भूमिका पर सवाल

किताब में अमेरिका के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों, खासकर हार्वर्ड जैसे संस्थानों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं. लेखकों का आरोप है कि कुछ पश्चिमी अकादमिक संस्थानों में विकसित विचार भारत की सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक व्यवस्था को एक खास नजरिए से देखने को बढ़ावा देते हैं.

किताब में यह भी कहा गया है कि भारतीय मूल के कई शिक्षाविद, उद्योगपति और प्रभावशाली लोग इन संस्थानों को आर्थिक सहयोग देते हैं, जिससे ऐसे विचारों को भारत में जगह मिलती है.

कॉर्पोरेट जगत और नई नीतियों पर चर्चा

‘गंगा में विषधर’ में कॉर्पोरेट क्षेत्र में बढ़ते ESG (Environmental, Social and Governance) मानकों और निजी विश्वविद्यालयों में आ रहे बदलावों का भी जिक्र किया गया है. लेखकों का तर्क है कि कई बार पश्चिमी सामाजिक मानकों को भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखे बिना अपनाया जाता है.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में लिबरल आर्ट्स और नए शैक्षणिक मॉडललेखकों का मानना है कि अगर भारत अपनी बौद्धिक और सांस्कृतिक ताकत को कमजोर करता है, तो इसका फायदा दूसरे देश उठा सकते हैं. किताब में चीन का उदाहरण देते हुए को लेकर भी किताब में अपनी चिंताएं व्यक्त की गई हैं.

लेखकों का मानना है कि अगर भारत अपनी बौद्धिक और सांस्कृतिक ताकत को कमजोर करता है, तो इसका फायदा दूसरे देश उठा सकते हैं. किताब में चीन का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर चल रही वैचारिक प्रतिस्पर्धा में भारत को सतर्क रहने की जरूरत है.

पहली किताब से कैसे अलग है ‘गंगा में विषधर’?

राजीव मल्होत्रा की पहली चर्चित किताब ‘Breaking India’ में मुख्य रूप से उन ताकतों पर चर्चा की गई थी, जिन पर भारत को विभाजित करने वाली पहचान-आधारित राजनीति को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया था. वहीं, ‘गंगा में विषधर’ का फोकस आधुनिक शिक्षा संस्थानों, वैश्विक नेटवर्क और नई सामाजिक विचारधाराओं पर है.

किताब का दावा है कि आज की चुनौती पहले से ज्यादा जटिल है, क्योंकि इसमें केवल बाहरी ताकतें ही नहीं बल्कि भारत के अंदर के प्रभाव यह किताब भारत की सांस्कृतिक सुरक्षा और बौद्धिक स्वतंत्रता से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने लाती है. उनके अनुसार, यह पश्चिमी अकादमिक सोच के प्रभुत्वशाली वर्ग भी शामिल हैं.

‘गंगा में विषधर’ के आने के बाद इस पर काफी चर्चा हुई है. समर्थकों का कहना है कि यह किताब भारत की सांस्कृतिक सुरक्षा और बौद्धिक स्वतंत्रता से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने लाती है. उनके अनुसार, यह पश्चिमी अकादमिक सोच के प्रभुत्व पर सवाल उठाती है.

दूसरी ओर, आलोचक इसे जरूरत से ज्यादा आशंकाओं से भरी किताब बताते हैं. उनका कहना है कि सामाजिक समस्याओं और असमानताओं पर चर्चा को किसी साजिश के रूप में देखना सही नहीं है.

क्यों महत्वपूर्ण है यह किताब?

चाहे कोई इस किताब के विचारों से सहमत हो या असहमत, इतना तय है कि ‘गंगा में विषधर’ ने भारत की पहचान, संस्कृति और भविष्य को लेकर एक बड़ी बहस को जन्म दिया है. यह किताब कई ऐसे सवाल उठाती है जिन पर आने वाले समय में भी चर्चा जारी रह सकती है.

क्या भारत अपनी सांस्कृतिक सोच और परंपराओं के साथ आधुनिक दुनिया में आगे बढ़ सकता है? क्या वैश्विक विचारधाराओं को अपनाते समय भारतीय परिस्थितियों का ध्यान रखा जा रहा है? और क्या भारत को अपनी बौद्धिक दिशा खुद तय करनी चाहिए?

इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द यह किताब अपनी जगह बनाती है. यह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता, पहचान और वैचारिक स्वतंत्रता को लेकर चल रही व्यापक बहस का हिस्सा है.

ये भी पढ़ें: जौहर यूनिवर्सिटी के 38 भवनों पर नहीं चलेगा बुलडोजर, क्या है वजह?

-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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