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सब्जी मंडी में फल बेचने वाले ‘विजय पाल’ कैसे बने कुश्ती के ‘महागुरु हनुमान’? जानिए आखिर क्या है उनकी कहानी

भारतीय कुश्ती की दुनिया में जब भी बड़े नामों का जिक्र होता है, तो गुरु हनुमान का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है. आज उनकी पुण्यतिथि पर देशभर के खिलाड़ी, कोच और खेल प्रेमी उन्हें याद कर रहे हैं. गुरु हनुमान सिर्फ एक कोच नहीं थे, बल्कि वो शख्स थे जिन्होंने भारतीय कुश्ती को अखाड़ों की सीमाओं से निकालकर अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई.

15 मार्च 1901 को राजस्थान के चिरावा में जन्मे विजय पाल यादव को दुनिया बाद में “गुरु हनुमान” के नाम से जानने लगी. उनका जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था. साधारण परिवार में जन्म लेने वाले विजय पाल युवावस्था में दिल्ली आ गए थे. उस दौर में वे सब्जी मंडी इलाके में फल बेचकर अपना गुजारा करते थे. लेकिन उनके भीतर एक पहलवान बसता था, जिसे मिट्टी से बेहद लगाव था.

कहते हैं कि मेहनत और लगन कभी छिपती नहीं. उनकी मजबूत काया और कुश्ती के प्रति जुनून ने उद्योगपति कृष्ण कुमार बिड़ला का ध्यान खींचा. बिड़ला ने उन्हें जमीन उपलब्ध कराई और यहीं से 1925 में “गुरु हनुमान अखाड़ा” की शुरुआत हुई. दिल्ली के शक्ति नगर में बना यह अखाड़ा आगे चलकर भारतीय कुश्ती की सबसे बड़ी पाठशाला बन गया.

दूसरे कोचों से अलग पहचान बनाने वाली रणनीति

गुरु हनुमान की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने परंपरागत भारतीय मिट्टी कुश्ती को आधुनिक मैट रेसलिंग से जोड़ा. उस समय जब दुनिया तेजी से बदल रही थी, उन्होंने समझ लिया था कि भारतीय पहलवानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफल होना है तो उन्हें नई तकनीक और आधुनिक प्रशिक्षण अपनाना होगा. यही सोच उन्हें बाकी कोचों से अलग बनाती थी.

उनके अखाड़े से निकले पहलवानों ने देश का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया. महाबली सतपाल सिंह, कारतार सिंह और प्रेमनाथ जैसे कई दिग्गज पहलवान उनके शिष्य रहे. गुरु हनुमान के प्रशिक्षण का असर इस बात से समझा जा सकता है कि उनके शिष्यों ने अर्जुन पुरस्कार, पद्मश्री और द्रोणाचार्य जैसे बड़े सम्मान हासिल किए. एशियाई खेलों में भी उनके पहलवानों ने कई स्वर्ण पदक जीतकर भारत का गौरव बढ़ाया.

देश ने भी उनके योगदान को समय-समय पर सम्मान दिया. उन्हें 1983 में पद्मश्री से नवाजा गया, जबकि 1985 में उन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार मिला. खास बात यह रही कि वे इस सम्मान को पाने वाले भारत के पहले द्रोणाचार्य बने.

आज भी गुरु हनुमान अखाड़ा सिर्फ एक प्रशिक्षण केंद्र नहीं, बल्कि सपनों की वह जगह माना जाता है जहां युवा पहलवान पसीना बहाकर अपने भविष्य को आकार देते हैं. वहां की मिट्टी आज भी संघर्ष, अनुशासन और समर्पण की कहानी सुनाती है.

गुरु हनुमान भले आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सोच और उनकी बनाई परंपरा आज भी भारतीय कुश्ती में जिंदा है. हर बार जब कोई भारतीय पहलवान देश के लिए पदक जीतता है, तो कहीं न कहीं उसमें गुरु हनुमान की विरासत की झलक दिखाई देती है.

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-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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