तमिलनाडु की आधुनिक राजनीति की जड़ें 1940 के दशक की उन घटनाओं में हैं, जब ई.वी. रामासामी ‘पेरियार’ और उनके सबसे करीबी सहयोगी सी.एन. अन्नादुरै के बीच मतभेद गहराए. इन मतभेदों ने न सिर्फ द्रविड़ कषगम (DK) को तोड़ा, बल्कि द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (DMK) जैसी शक्तिशाली पार्टी को जन्म दिया. तीन प्रमुख घटनाएं इस विभाजन की कहानी कहती हैं.
15 अगस्त 1947 को जब पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था, पेरियार ने इसे ‘शोक दिवस’ या ‘ब्लैक डे’ घोषित कर दिया. उनके अनुसार यह सच्ची आजादी नहीं थी. ब्रिटिश सत्ता सिर्फ ब्राह्मण-बनिया वर्ग के हाथों में चली गई थी. द्रविड़ नाडु (दक्षिण भारत का अलग देश) की उनकी मांग अनसुनी रह गई थी और जाति व्यवस्था जस की तस बनी हुई थी.
पेरियार ने काले झंडे फहराने और शोक मनाने का आह्वान किया. लेकिन तब डॉ. क. के महासचिव अन्नादुरै ने खुलेआम असहमति जताई. उन्होंने कहा कि इस दिन को ‘इनब नाळ, इनिया नाळ’ (खुशी और मधुर दिन) के रूप में मनाया जाए. कई कार्यकर्ताओं ने अन्नादुरै की बात मान ली और जश्न मनाया. यह पहला सार्वजनिक संकेत था कि दोनों नेताओं के रास्ते अलग हो रहे हैं.
1949 में विवाद चरम पर पहुंचा. लगभग 70 वर्षीय पेरियार ने अपनी करीब 30-32 वर्षीय सहयोगी मनियाम्मै से शादी कर ली. मनियाम्मै डॉ. क. की सक्रिय कार्यकर्ता और पेरियार की निजी सहायक थीं. पेरियार का तर्क साफ था—वे संगठन और संपत्ति का ट्रस्ट किसी ऐसे व्यक्ति को सौंपना चाहते थे जिस पर उन्हें पूरा भरोसा हो. उस समय के कानून में महिला को आसानी से उत्तराधिकारी नहीं बनाया जा सकता था, इसलिए शादी कानूनी उपाय बन गई.
पार्टी के अंदर भारी विरोध हुआ. आयु का बड़ा अंतर और ‘असमान विवाह’ का मुद्दा उठा. कई नेताओं ने पार्टी गतिविधियों से अलग होने की घोषणा कर दी. अन्नादुरै और उनके समर्थकों ने इसे संगठन के सिद्धांतों के खिलाफ बताया. शादी अंतिम टूट का तात्कालिक कारण बन गई.
मतभेद सिर्फ शादी तक सीमित नहीं थे. पेरियार डॉ. क. को गैर-राजनीतिक सामाजिक सुधार संगठन बनाए रखना चाहते थे, जबकि अन्नादुरै और युवा नेता चुनावी राजनीति में उतरना चाहते थे. नेतृत्व शैली को लेकर भी असंतोष था. पेरियार के एकतरफा फैसलों से कई लोग नाराज थे.
सितंबर 1949 में अन्नादुरै और उनके समर्थकों ने डॉ. क. छोड़कर नई पार्टी बनाई द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (DMK). 17 सितंबर 1949 (पेरियार का जन्मदिन) को औपचारिक रूप से पार्टी का गठन हुआ. अन्नादुरै ने भावुक भाषण में कहा कि DK और DMK ‘इरट्टई कुषल तुप्पाक्कि’ (दो नाल वाली बंदूक) हैं, एक ही आदर्श के दो रूप. उन्होंने पेरियार को अपना ‘थलैवर’ (नेता) मानने की बात कही, लेकिन नया रास्ता चुन लिया.
पेरियार सामाजिक सुधार और तर्कवाद के प्रतीक बने रहे. उनकी डॉ. क. चुनावी राजनीति से दूर रही. अन्नादुरै ने द्रविड़ आंदोलन को राजनीतिक रूप दिया. DMK ने 1967 में सत्ता हासिल की और तमिलनाडु की राजनीति की दिशा बदल दी.
ये घटनाएं सिर्फ व्यक्तिगत मतभेद नहीं थीं. ये द्रविड़ आंदोलन के दो रास्तों (सामाजिक सुधार बनाम राजनीतिक सत्ता) के बीच के संघर्ष की कहानी हैं. आज भी तमिलनाडु की राजनीति इन्हीं जड़ों पर खड़ी है.
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-भारत एक्सप्रेस
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