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कोलकाता के छोटे कमरे से हर भारतीय रसोई तक: जानिए कैसे बनी देश की सबसे पुरानी बिस्किट कंपनी ‘ब्रिटानिया’

महज 295 रुपये से शुरू होकर 1.21 लाख करोड़ की कंपनी बनने वाली ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज का 134 साल पुराना इतिहास. जानिए कैसे विदेशी हाथों से निकलकर यह बनी देश की सबसे बड़ी खाद्य कंपनी.

History Of Britannia Industries 134 Years Success Story Bharat Express

आखिर कैसे 'Britannia' बनी देश की सबसे पुरानी बिस्किट कंपनी? (AI IMAGE)

Edited by Vaibhav Gupta

भारत में बिस्किट और कुकीज का बाजार बहुत बड़ा है. घर-घर में रोजाना खाए जाने वाले ये स्नैक उत्पाद कई बड़े ब्रांड्स से जुड़े हैं. इनमें सबसे पहला और पुराना नाम है ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज. यह सिर्फ एक बिस्किट कंपनी नहीं, बल्कि भारत की सबसे पुरानी खाद्य कंपनियों में से एक है, जिसकी शुरुआत 134 साल पहले हुई थी.

शुरुआत: महज 295 रुपये से कोलकाता में

ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज की नींव 1892 में कोलकाता में ब्रिटिश व्यापारियों के एक समूह ने रखी. शुरुआती निवेश महज 295 रुपये का था. शुरुआत में बिस्किट एक छोटे से घर में स्थानीय स्तर पर बनाए जाते थे. बाद में इस उद्यम को गुप्ता बंधुओं (मुख्य रूप से वकील नलिन चंद्र गुप्ता) ने अधिग्रहित कर लिया और इसे वी.एस. ब्रदर्स के नाम से चलाया.

1918 में कोलकाता स्थित अंग्रेज व्यवसायी सी.एच. होम्स को भागीदार बनाया गया और ‘ब्रिटानिया बिस्किट कंपनी लिमिटेड’ (BBCO) का औपचारिक रूप से गठन हुआ. 1924 में मुंबई में नया कारखाना लगा और ब्रिटिश कंपनी पीक फ्रीन्स ने इसमें नियंत्रण हिस्सेदारी हासिल कर ली. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान कंपनी ने ब्रिटिश सेना के लिए बड़ी मात्रा में ‘सर्विस बिस्किट’ बनाए, जिससे उसकी उत्पादन क्षमता और बिक्री दोनों को मजबूती मिली.

1978 में कंपनी ने पब्लिक इश्यू निकाला और भारतीय हिस्सेदारी 60 प्रतिशत से अधिक हो गई. अगले साल यानी 1979 में इसका नाम बदलकर ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज लिमिटेड रख दिया गया.

स्वामित्व का संघर्ष और भारतीय कंपनी बनना

1980 के दशक में कंपनी पर अमेरिकी कंपनी आरजेआर नैबिस्को का प्रभाव बढ़ा. इसी दौरान केरल मूल के व्यवसायी राजन पिल्लई (जिन्हें ‘बिस्किट राजा’ कहा जाता था) ने फ्रांसीसी खाद्य कंपनी ग्रुप डैनोन के समर्थन से कंपनी पर नियंत्रण हासिल किया.

1990 के दशक की शुरुआत में नुस्ली वाडिया के नेतृत्व वाले वाडिया ग्रुप ने इसमें दखल दिया. 1993 में वाडिया ग्रुप ने एसोसिएटेड बिस्किट्स इंटरनेशनल (एबीआईएल) में हिस्सेदारी खरीदकर डैनोन के साथ बराबर का साझेदार बन गया और पिल्लई को नियंत्रण से बाहर कर दिया. पिल्लई पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे. वे सिंगापुर भाग गए, बाद में भारत लौटे और 1995 में दिल्ली की तिहाड़ जेल में उनका निधन हो गया.

वाडिया और डैनोन के बीच लंबे समय तक साझेदारी रही, लेकिन मतभेद भी बढ़ते गए. आखिरकार 2009 में डैनोन ने अपनी हिस्सेदारी वाडिया ग्रुप को बेच दी. इससे ब्रिटानिया पूरी तरह वाडिया ग्रुप के नियंत्रण में आ गई और एक ठोस भारतीय कंपनी के रूप में स्थापित हो गई.

आज की ब्रिटानिया

आज ब्रिटानिया वाडिया ग्रुप की प्रमुख कंपनी है. इसकी बाजार पूंजीकरण लगभग 1.21 लाख करोड़ रुपये के आसपास है. कंपनी का करीब 80 प्रतिशत राजस्व बिस्किट से आता है. बिस्किट के अलावा यह ब्रेड, केक, रस्क, चीज, घी और दही जैसे डेयरी उत्पाद भी बेचती है. गुड डे, मारी गोल्ड, टाइगर, न्यूट्रीचॉइस, 50-50, ट्रीट, मिल्क बिकिस और बॉर्बन जैसे ब्रांड्स भारतीय घरों में आम हो चुके हैं.

कोलकाता के एक छोटे घर से शुरू होकर देशभर में फैली फैक्ट्रियों और करोड़ों उपभोक्ताओं तक पहुंच बनाने वाली ब्रिटानिया की कहानी उद्यमिता, संघर्ष और बदलाव की मिसाल है. 134 साल बाद भी यह भारतीय नाश्ते का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है.

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-भारत एक्सप्रेस



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