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MRI Technology: देश में बनी पहली 1.5 टेस्ला मशीन से छोटे शहरों में आसान होगी जांच

MRI Technology:  भारत में लंबे समय से MRI जैसी आधुनिक मेडिकल जांच तकनीक आम मरीजों की पहुंच से काफी दूर रही है. इसकी एक बड़ी वजह मशीनों की भारी कीमत, ज्यादा बिजली की खपत और लिक्विड हीलियम जैसी महंगी जरूरतें रही हैं. यही कारण है कि देश के कई छोटे शहरों और जिला स्तर के अस्पतालों में MRI की सुविधा आज भी आसानी से उपलब्ध नहीं है.

लेकिन अब इस स्थिति को बदलने की दिशा में भारत में एक अहम कदम उठाया गया है. भारतीय कंपनी वॉक्सेलग्रिड्स (VoxelGrids) ने देश का पहला पूरी तरह स्वदेशी MRI स्कैनर विकसित किया है. 1.5 टेस्ला क्षमता वाला यह MRI स्कैनर महाराष्ट्र के चंद्रपुर स्थित एक कैंसर केयर सेंटर में इस्तेमाल भी किया जा रहा है.

महंगी MRI मशीनों का सस्ता विकल्प

भारत में इस्तेमाल होने वाली ज्यादातर MRI मशीनें अब तक विदेशों से आयात की जाती रही हैं. इनकी खरीद और रखरखाव पर अस्पतालों को बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है. इसके अलावा पारंपरिक MRI सिस्टम में लिक्विड हीलियम की जरूरत होती है, जिसकी व्यवस्था और रखरखाव भी आसान नहीं होता.

वॉक्सेलग्रिड्स की नई मशीन इस मामले में अलग है. इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि इसमें लिक्विड हीलियम की जरूरत नहीं पड़ती. इसका सीधा फायदा यह है कि मशीन को चलाना और उसका रखरखाव करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है.

मशीन की बिजली की खपत भी पारंपरिक सिस्टम की तुलना में कम रखी गई है. कंपनी के मुताबिक, इसकी कीमत आयातित MRI सिस्टम के मुकाबले करीब 40 प्रतिशत तक कम है. ऐसे में उन अस्पतालों के लिए यह एक व्यावहारिक विकल्प बन सकती है, जो महंगी MRI मशीन खरीदने में सक्षम नहीं हैं.

पे-पर-यूज मॉडल से छोटे अस्पतालों को फायदा

इस तकनीक की एक और खास बात इसका पे-पर-यूज मॉडल है. यानी अस्पतालों को मशीन खरीदने के लिए शुरुआत में बहुत बड़ा निवेश करने की जरूरत नहीं होगी. वे इस्तेमाल के आधार पर भुगतान कर सकते हैं.

भारत जैसे देश में इसका महत्व काफी ज्यादा है. महानगरों में बड़े निजी अस्पतालों के पास महंगी मेडिकल मशीनें खरीदने के लिए पर्याप्त संसाधन हो सकते हैं, लेकिन छोटे शहरों और दूरदराज के इलाकों में तस्वीर अलग है. वहां अस्पतालों के लिए करोड़ों रुपये की मशीन खरीदना हमेशा संभव नहीं होता.

अगर कम लागत वाली ऐसी तकनीक इन इलाकों तक पहुंचती है, तो मरीजों को MRI कराने के लिए बड़े शहरों का रुख करने की जरूरत कम हो सकती है.

अमेरिका की रिसर्च छोड़कर भारत लौटे अर्जुन

इस परियोजना के पीछे वॉक्सेलग्रिड्स के संस्थापक अर्जुन अरुणाचलम की अहम भूमिका रही है. उन्होंने अमेरिका में अपने शोध करियर को छोड़कर भारत लौटने का फैसला किया. उनका उद्देश्य ऐसी MRI तकनीक तैयार करना था, जो भारतीय परिस्थितियों और यहां की वास्तविक जरूरतों के हिसाब से काम कर सके.

इस सफर में टीम को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा. मशीन तैयार करने से लेकर उसके परीक्षण और तकनीकी सुधार तक, कई सालों तक काम चलता रहा. इस प्रयास को टाटा ट्रस्ट्स और FISE जैसे संस्थानों का सहयोग भी मिला.

यह काम केवल विदेशों में बनी MRI मशीन का कोई सस्ता संस्करण तैयार करने तक सीमित नहीं था. कोशिश ऐसी तकनीक विकसित करने की थी, जिसे भारत के सीमित संसाधनों वाले स्वास्थ्य केंद्र भी आसानी से अपना सकें.

छोटे शहरों में बेहतर जांच की उम्मीद

MRI जांच कई गंभीर बीमारियों की पहचान और इलाज की योजना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. कैंसर से लेकर शरीर के अलग-अलग हिस्सों की जटिल समस्याओं तक, डॉक्टरों को सही इलाज तय करने में MRI से मिलने वाली जानकारी काफी मदद करती है.

ऐसे में अगर कम लागत और कम संसाधनों में MRI सुविधा उपलब्ध हो पाती है, तो इसका सबसे बड़ा फायदा उन मरीजों को मिल सकता है जिन्हें आज जांच के लिए बड़े शहरों में जाना पड़ता है.

चंद्रपुर के कैंसर केयर सेंटर में इस स्वदेशी MRI का इस्तेमाल शुरू होना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है. आने वाले समय में अगर ऐसी मशीनें जिला अस्पतालों, छोटे मेडिकल सेंटरों और दूसरे कैंसर उपचार केंद्रों तक पहुंचती हैं, तो मेडिकल डायग्नोस्टिक्स की तस्वीर बदल सकती है.

वॉक्सेलग्रिड्स की पहल को केवल एक नई मशीन के निर्माण के तौर पर देखना शायद पर्याप्त नहीं होगा. इसका बड़ा महत्व इस बात में है कि भारत अब मेडिकल उपकरणों के लिए सिर्फ विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी जरूरत के हिसाब से तकनीक विकसित करने की कोशिश कर रहा है.

महंगी मशीनें, सीमित संसाधन और देश के अलग-अलग हिस्सों में स्वास्थ्य सुविधाओं की असमान उपलब्धता भारत की पुरानी चुनौतियां हैं. ऐसे में स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाई गई तकनीक इन समस्याओं का व्यावहारिक समाधान दे सकती है.

अगर स्वदेशी MRI तकनीक बड़े स्तर पर अपनाई जाती है, तो इससे न सिर्फ अस्पतालों की लागत कम करने में मदद मिल सकती है, बल्कि देश के उन हिस्सों तक आधुनिक जांच सुविधाएं पहुंचाने का रास्ता भी खुल सकता है, जहां आज मरीजों को इसके लिए लंबा सफर करना पड़ता है.

यह भी पढ़ें- रोमिला थापर की किताब ‘वर्तमान जैसा अतीत’, जानिए इतिहास को आंख मूंदकर स्वीकार करना क्यों है खतरनाक?

-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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