इतिहास सिर्फ पुरानी तारीखों, राजाओं और युद्धों का सिलसिला नहीं है. हम अपने अतीत को जिस तरह समझते हैं, उसका सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि हम आज खुद को किस नजर से देखते हैं. प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर की किताब वर्तमान जैसा अतीत इसी सवाल को केंद्र में रखती है. किताब का मूल अंग्रेजी शीर्षक The Past as Present: Forging Contemporary Identities Through History है.
थापर का मानना है कि जब किसी मौजूदा राजनीतिक या सामाजिक सोच को सही साबित करने के लिए अतीत का इस्तेमाल किया जाता है, तब यह देखना बेहद जरूरी हो जाता है कि जिस अतीत का हवाला दिया जा रहा है, वह वास्तव में कितना प्रमाणित है. आखिर हम जिस इतिहास को सच मानकर आगे बढ़ रहे हैं, उसके पीछे ठोस सबूत कितने हैं?
वर्तमान जैसा अतीत 2014 में अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था. यह अलग-अलग समय में लिखे गए लेखों और दिए गए व्याख्यानों का संग्रह है, जिसमें करीब चार दशकों के दौरान थापर के इतिहास संबंधी विचार सामने आते हैं. बाद में इसका हिंदी अनुवाद भी प्रकाशित हुआ.
किताब को चार हिस्सों में बांटा गया है. इनमें इतिहास और आम जनता, धर्म और इतिहास, इतिहास से जुड़ी बहसें तथा महिलाओं की स्थिति जैसे विषय शामिल हैं.
थापर खास तौर पर इस बात पर जोर देती हैं कि इतिहास को बिना जांचे-परखे स्वीकार नहीं किया जा सकता. किसी घटना की व्याख्या करते समय उसके समय, सामाजिक परिस्थितियों और उपलब्ध प्रमाणों को देखना जरूरी है.
औपनिवेशिक नजरिए की छाप
किताब के एक हिस्से में वे भारतीय इतिहास-लेखन पर औपनिवेशिक दौर के प्रभाव की चर्चा करती हैं. उन्नीसवीं सदी में यूरोपीय इतिहासकारों ने भारत के अतीत को जिस तरह वर्गीकृत किया, उसका असर लंबे समय तक बना रहा.
इतिहास को हिंदू, मुस्लिम और ब्रिटिश काल में बांटने का तरीका इसका एक चर्चित उदाहरण है. थापर बताती हैं कि इस तरह की सरल श्रेणियां भारत के जटिल सामाजिक इतिहास को पूरी तरह समझाने में सक्षम नहीं हैं.
वे पाठ्यपुस्तकों को लेकर हुए विवादों की ओर भी ध्यान दिलाती हैं. उनके लिए स्कूल की किताबें महज पढ़ाई का माध्यम नहीं हैं. वे यह भी तय करती हैं कि आने वाली पीढ़ियां अपने अतीत को किस नजर से देखेंगी.
धर्म और साम्प्रदायिकता को अलग-अलग समझना जरूरी
रोमिला थापर की इतिहास-दृष्टि में साम्प्रदायिकता का मुद्दा भी अहम है. उनका तर्क है कि आधुनिक साम्प्रदायिक राजनीति को सीधे प्राचीन भारत पर लागू करके देखना सही नहीं है.
पुराने समाजों में लोगों की पहचान केवल धर्म से तय नहीं होती थी. जाति, क्षेत्र, भाषा, पेशा और सामाजिक स्थिति भी पहचान के महत्वपूर्ण आधार थे. इसलिए पूरे अतीत को एक ही धार्मिक पहचान में समेट देना इतिहास की जटिलताओं को नजरअंदाज करना होगा.
थापर यह भी दिखाती हैं कि समय के साथ इतिहास की कुछ व्याख्याओं को राजनीतिक जरूरतों के मुताबिक नया रूप दिया गया. यही वजह है कि अतीत को समझते समय यह पूछना जरूरी है कि किसी खास कहानी को किसने, कब और किस उद्देश्य से आगे बढ़ाया.
आर्य और महाकाव्यों पर भी सवाल
किताब का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आर्यों, रामायण और महाभारत जैसे विषयों से जुड़ा है. आर्यों की पहचान को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है. थापर आर्यों को किसी नस्लीय श्रेणी के तौर पर देखने की धारणा पर सवाल उठाती हैं और प्रवासन से जुड़े ऐतिहासिक तर्कों पर चर्चा करती हैं.
इसी तरह वे रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों को सीधे-सीधे ऐतिहासिक दस्तावेज मान लेने से भी सावधान करती हैं. उनके अनुसार साहित्यिक रचनाओं का अपना महत्व है, लेकिन उन्हें समझने के लिए साहित्य, पुरातत्व और दूसरे उपलब्ध प्रमाणों को साथ रखकर देखना चाहिए.
इतिहास में महिलाओं की कहानी भी उतनी ही जरूरी
किताब का आखिरी हिस्सा महिलाओं की स्थिति और पितृसत्ता पर केंद्रित है. थापर प्राचीन साहित्य में महिलाओं के चित्रण से लेकर आधुनिक समाज में महिलाओं के खिलाफ हिंसा तक के बीच ऐतिहासिक संबंधों को समझने की कोशिश करती हैं.
उनका सवाल यह है कि ऐसी सामाजिक धारणाएं कैसे बनती और मजबूत होती हैं, जिनमें महिलाओं पर नियंत्रण को सामान्य माना जाने लगता है. इस नजरिए से देखें तो महिलाओं के खिलाफ हिंसा सिर्फ आज की समस्या नहीं रह जाती, बल्कि उसके पीछे मौजूद लंबे सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास को समझना भी जरूरी हो जाता है.
आज के दौर में क्यों प्रासंगिक है यह किताब?
वर्तमान जैसा अतीत की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यह पाठक को इतिहास को आंख मूंदकर स्वीकार करने के बजाय सवाल पूछने के लिए प्रेरित करती है. जब अतीत का इस्तेमाल वर्तमान की राजनीति, पहचान या सामाजिक बहसों को सही साबित करने के लिए किया जाता है, तब इतिहास की विश्वसनीयता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है.
रोमिला थापर का संदेश है कि इतिहास को मिथक, पूर्वाग्रह या राजनीतिक सुविधा के हिसाब से नहीं गढ़ा जाना चाहिए. उसे उपलब्ध प्रमाणों, संदर्भ और आलोचनात्मक सोच के आधार पर समझना चाहिए.
आखिरकार, किसी देश की पहचान सिर्फ उसके वर्तमान से नहीं बनती. लोग अपने अतीत को कैसे याद करते हैं और उसकी व्याख्या कैसे करते हैं, इसका भी उस पहचान पर गहरा असर पड़ता है. इसलिए इतिहास को समझने की जिम्मेदारी केवल इतिहासकारों की नहीं है. आम पाठक के लिए भी यह जानना जरूरी है कि जो कहानी उसे अतीत के नाम पर बताई जा रही है, उसके पीछे प्रमाण क्या हैं.
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