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सियाचिन की बर्फ से थार के रेगिस्तान तक: कैसे बदल रही हैं भारत की सीमावर्ती गांवों की तस्वीर, युवाओं को मिल रही नई पहचान

भारत के सीमावर्ती गांवों की पहचान अब धीरे-धीरे बदल रही है. कभी इन गांवों को देश के दूर-दराज के इलाके मानकर देखा जाता था, जहां सड़क, बिजली, इंटरनेट, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं जुटाना बड़ी चुनौती हुआ करता था. लेकिन अब इन इलाकों को विकास, पर्यटन, स्थानीय कारोबार और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है.

इस बदलाव के केंद्र में हैं यहां के युवा. सरकार की वाइब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम यानी जीवंत गांव कार्यक्रम की सोच भी कुछ ऐसी ही है. मकसद सिर्फ गांवों में सड़कें बनाना या बिजली पहुंचाना नहीं, बल्कि वहां रहने वाले लोगों को अपने ही क्षेत्र में बेहतर भविष्य बनाने के मौके देना है.

लद्दाख की बर्फीली पहाड़ियों से लेकर राजस्थान के थार रेगिस्तान और गुजरात के सीमावर्ती इलाकों तक, हर जगह की जरूरत अलग है. कहीं मौसम और ऊंचाई बड़ी चुनौती हैं, तो कहीं पानी की कमी और लंबी दूरियां. ऐसे में विकास की योजना भी स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार करनी होगी. सबसे जरूरी बात यह है कि सीमावर्ती इलाकों के युवाओं को रोजगार के लिए अपना घर छोड़ने की मजबूरी न हो.

सीमावर्ती गांवों के विकास के लिए क्या है सरकार की योजना?

सीमावर्ती गांवों के विकास की इसी सोच को आगे बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने 2023 में वाइब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम (VVP) को मंजूरी दी थी. शुरुआत में इसका ध्यान उत्तरी सीमा से लगे गांवों पर था. बाद में इस पहल का दायरा बढ़ाते हुए दूसरे अंतरराष्ट्रीय भूमि सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए वाइब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम-II (VVP-II) भी लाया गया.

पहले चरण के तहत लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के 19 जिलों के 46 ब्लॉकों में चुने गए गांवों को विकसित करने की योजना बनाई गई. वित्त वर्ष 2022-23 से 2025-26 तक के लिए इसके लिए 4,800 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था. इसमें से 2,500 करोड़ रुपये हर मौसम में इस्तेमाल की जा सकने वाली सड़कों के निर्माण के लिए रखे गए थे.

दूसरे चरण का दायरा इससे बड़ा है. VVP-II के लिए 6,839 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है और इसे वित्त वर्ष 2028-29 तक लागू करने की योजना है. इसमें सड़क, बिजली, दूरसंचार, शिक्षा, कौशल विकास, पर्यटन, वित्तीय सेवाओं और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने जैसे मुद्दों पर ध्यान दिया गया है.

इस योजना का असली उद्देश्य गांवों में सुविधाएं बढ़ाने के साथ-साथ स्थानीय आबादी को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है. जब गांव में ही कमाई के रास्ते खुलेंगे, तो लोगों के पलायन का दबाव भी कम हो सकता है.

सीमावर्ती इलाकों को लंबे समय तक देश के आखिरी छोर पर बसे गांवों के रूप में देखा जाता रहा. लेकिन अब इन्हें देश के पहले गांव के तौर पर पहचान देने पर जोर दिया जा रहा है.

सुनने में यह बदलाव छोटा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे सोच का बड़ा फर्क है. किसी गांव को आखिरी गांव कहने पर उसकी पहचान दूरी और पिछड़ेपन से जुड़ जाती है. वहीं, पहले गांव के रूप में देखने का मतलब है कि वह देश की पहचान, संस्कृति और विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

इस नजरिए से गांवों में सड़क बनाना सिर्फ आवाजाही आसान करने का काम नहीं रह जाता. सड़क से बच्चों को स्कूल पहुंचने में मदद मिलती है, मरीजों को अस्पताल ले जाना आसान होता है और स्थानीय उत्पादों को बाजार तक पहुंचाया जा सकता है.

इसी तरह इंटरनेट की सुविधा किसी युवा के लिए ऑनलाइन पढ़ाई, डिजिटल भुगतान या अपना छोटा कारोबार शुरू करने का रास्ता खोल सकती है. यानी बुनियादी सुविधाओं का फायदा तभी पूरा मिलता है, जब उनके साथ रोजगार और कमाई के अवसर भी जुड़ें.

सीमावर्ती इलाकों की असली ताकत हैं वहां के युवा

किसी गांव में सड़क, बिजली और मोबाइल नेटवर्क कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर वहां के लोगों के पास रोजगार नहीं है, तो विकास अधूरा ही रहेगा. सीमावर्ती गांवों के मामले में यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है.

यहां के युवा अपने इलाके की भौगोलिक स्थिति, मौसम, स्थानीय भाषा, संस्कृति और रोजमर्रा की चुनौतियों को अच्छी तरह समझते हैं. उन्हें पता होता है कि बर्फबारी के दौरान कौन-सा रास्ता मुश्किल हो जाता है, किस मौसम में किस उत्पाद की मांग बढ़ती है और बाहर से आने वाले लोगों को स्थानीय जीवन के बारे में क्या जानना चाहिए.

अगर इस अनुभव को आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ दिया जाए, तो यही जानकारी कमाई का जरिया बन सकती है.

मिसाल के तौर पर, कोई युवा अपने गांव में होमस्टे शुरू कर सकता है. कोई पर्यटकों को स्थानीय पर्यटन स्थलों की सैर करा सकता है. कोई हस्तशिल्प या ऊनी उत्पादों को ऑनलाइन बेच सकता है. वहीं, डिजिटल सेवाओं की जानकारी रखने वाला युवा गांव के लोगों को सरकारी फॉर्म भरने, बैंकिंग सेवाओं और ऑनलाइन आवेदन में मदद दे सकता है.

स्थानीय स्तर पर रोजगार के कुछ प्रमुख रास्ते इस तरह विकसित हो सकते हैं:

  • पर्यटन और होमस्टे: पर्यटकों के ठहरने, घूमने, खाने और स्थानीय संस्कृति को समझने की सुविधाएं देना.
    डिजिटल सेवाएं: ऑनलाइन फॉर्म, डिजिटल भुगतान, टेलीमेडिसिन और ई-लर्निंग में लोगों की मदद करना.
    स्थानीय उत्पाद: ऊन, हस्तशिल्प, बाजरा, मसाले, डेयरी उत्पाद और बागवानी से जुड़े सामान को बाजार तक पहुंचाना.
    तकनीकी सेवाएं: सौर ऊर्जा उपकरणों की देखभाल, मरम्मत, परिवहन और सामान की आपूर्ति जैसे काम करना.
    संस्कृति से जुड़े कारोबार: लोक संगीत, पारंपरिक खानपान, स्थानीय त्योहारों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए रोजगार पैदा करना.

इनमें से हर काम अपने आप में छोटा लग सकता है, लेकिन जब एक ही गांव में ऐसे कई काम शुरू होते हैं, तो स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई ताकत मिलती है.

सड़क, बिजली और इंटरनेट से कैसे बदल सकती है गांव की जिंदगी?

कल्पना कीजिए कि किसी सीमावर्ती गांव में एक युवा परिवार के साथ होमस्टे चलाना चाहता है. लेकिन गांव तक पहुंचने वाली सड़क खराब है, मोबाइल नेटवर्क ठीक से काम नहीं करता और बिजली की आपूर्ति भी भरोसेमंद नहीं है. ऐसी स्थिति में कारोबार शुरू करना जोखिम भरा होगा.

अब अगर सड़क बेहतर हो जाए, बिजली की सुविधा मिले और इंटरनेट का कनेक्शन मजबूत हो, तो वही युवा अपने होमस्टे का प्रचार ऑनलाइन कर सकता है. पर्यटकों से बुकिंग ले सकता है, डिजिटल भुगतान स्वीकार कर सकता है और स्थानीय लोगों को भी काम दे सकता है.

यही बात खेती, हस्तशिल्प और दूसरे छोटे व्यवसायों पर भी लागू होती है.

बेहतर सड़कें स्थानीय उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने का समय और खर्च कम कर सकती हैं. बिजली मिलने से छोटे उपकरण चलाना, सामान सुरक्षित रखना और डिजिटल सेवाएं देना आसान होता है. दूरसंचार सुविधाओं से विद्यार्थी ऑनलाइन पढ़ाई कर सकते हैं और कारोबारी ग्राहकों से सीधे संपर्क में रह सकते हैं.

इसका एक सामाजिक असर भी होता है. जब युवाओं को अपने आसपास ही नए अवसर दिखाई देते हैं, तो उनके लिए गांव में रहने या पढ़ाई के बाद वापस लौटने का फैसला करना आसान हो सकता है.

हालांकि, सिर्फ सुविधाएं उपलब्ध करा देना काफी नहीं होगा. स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण, वित्तीय मदद, बाजार तक पहुंच और कारोबार चलाने के लिए जरूरी मार्गदर्शन भी देना होगा.

पर्यटन से गांवों को मिल सकती है नई पहचान

भारत के सीमावर्ती इलाकों में प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विविधता की कमी नहीं है. कहीं बर्फ से ढकी पहाड़ियां हैं, तो कहीं दूर तक फैले रेगिस्तान. कहीं पारंपरिक घर और स्थानीय खानपान पर्यटकों को आकर्षित कर सकते हैं, तो कहीं लोक संगीत और सदियों पुरानी जीवनशैली लोगों के लिए खास अनुभव बन सकती है.

इसी वजह से सीमावर्ती पर्यटन स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार का एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकता है. पर्यटन मंत्रालय ने भी सीमावर्ती गांवों के प्रतिनिधियों के साथ संवाद और स्थानीय युवाओं की पर्यटक सहायता से जुड़ी संभावनाओं को रेखांकित किया है.

इस क्षेत्र में रोजगार केवल होटल या गेस्ट हाउस तक सीमित नहीं है. स्थानीय युवा गाइड, ड्राइवर, रसोइये, हस्तशिल्प विक्रेता, फोटोग्राफी सहायक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजक के रूप में भी काम कर सकते हैं.

लेकिन पर्यटन बढ़ाने के साथ कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं. सीमावर्ती इलाके सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील हो सकते हैं और कई जगहों पर पर्यटकों की आवाजाही, फोटोग्राफी या प्रवेश के लिए विशेष नियम लागू होते हैं. इसके अलावा, पहाड़ी और रेगिस्तानी क्षेत्रों का पर्यावरण भी नाजुक होता है.

इसलिए पर्यटन की योजना बनाते समय स्थानीय लोगों की भागीदारी, पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षा नियमों का पालन प्राथमिकता होनी चाहिए. कमाई का बड़ा हिस्सा भी गांव के परिवारों तक पहुंचना चाहिए, न कि केवल बाहर से आने वाले कारोबारियों तक सीमित रहना चाहिए.

थार के रेगिस्तान में विकास का रास्ता पहाड़ों से अलग होगा

वाइब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम के दूसरे चरण का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि इसका दायरा हिमालयी क्षेत्रों से आगे बढ़कर पश्चिमी सीमा के गांवों तक पहुंचता है.

राजस्थान और गुजरात के सीमावर्ती इलाकों की चुनौतियां लद्दाख या अरुणाचल प्रदेश से काफी अलग हैं. यहां तेज गर्मी, पानी की कमी, बस्तियों के बीच लंबी दूरी और रेगिस्तानी पर्यावरण की सुरक्षा जैसे मुद्दे अहम हैं.

ऐसे में यहां रोजगार के अवसर भी स्थानीय जरूरतों के मुताबिक विकसित करने होंगे.

उदाहरण के लिए, थार क्षेत्र में ऊंटों के साथ पर्यटन, रेगिस्तानी पारिस्थितिकी की जानकारी देने वाले टूर, लोक संगीत, पारंपरिक हस्तशिल्प और बाजरे से बने उत्पाद कारोबार का आधार बन सकते हैं. वहीं, सौर ऊर्जा उपकरणों के रखरखाव, जल प्रबंधन और स्थानीय परिवहन से जुड़े काम भी युवाओं के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं.

हर गांव में एक ही तरह का विकास मॉडल लागू करना व्यावहारिक नहीं होगा. कहीं सड़क सबसे बड़ी जरूरत होगी, तो कहीं मोबाइल नेटवर्क या पीने के पानी की सुविधा पहले जरूरी होगी. किसी गांव में स्थानीय उत्पादों की बिक्री बढ़ाने से ज्यादा रोजगार पैदा हो सकता है, जबकि दूसरे गांव में पर्यटन की संभावनाएं बेहतर हो सकती हैं.

इसलिए योजनाओं की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे स्थानीय जरूरतों को कितनी अच्छी तरह समझती हैं.

देशभर के युवाओं को सीमावर्ती गांवों से जोड़ने की पहल

सीमावर्ती गांवों का विकास केवल वहां रहने वाले लोगों तक सीमित विषय नहीं है. देश के दूसरे हिस्सों के युवाओं को भी इन क्षेत्रों की वास्तविक परिस्थितियों को समझने का मौका मिलना चाहिए.

इसी दिशा में 2026 में विकसित वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम के तहत एक पहल में देश के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से 400 से अधिक स्वयंसेवकों ने हिस्सा लिया. इन स्वयंसेवकों को लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के 74 सीमावर्ती गांवों से जोड़कर सामुदायिक सेवा, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और जमीनी स्तर पर भागीदारी के अवसर दिए गए.

इस तरह की पहल से देश के अलग-अलग हिस्सों के युवाओं को एक-दूसरे से सीखने का मौका मिलता है. शहरों से आने वाले युवा डिजिटल तकनीक, सोशल मीडिया, डिजाइन और उद्यमिता से जुड़े अपने अनुभव साझा कर सकते हैं. दूसरी ओर, सीमावर्ती गांवों के युवा स्थानीय पर्यावरण, खेती, कठिन मौसम और समुदाय के बीच सहयोग से जुड़ा अपना ज्ञान दूसरों तक पहुंचा सकते हैं.

इसका फायदा सिर्फ जानकारी के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं रहता. ऐसे संपर्क भविष्य में नए सहयोग, रोजगार और कारोबार के अवसर भी पैदा कर सकते हैं.

गांव में विकास हो, लेकिन फायदा भी गांव को मिले

किसी भी विकास योजना की असली परीक्षा तब होती है, जब यह देखा जाता है कि उसका लाभ किसे मिल रहा है. सड़क बन जाए, पर्यटक आने लगें या कोई नया बाजार खुल जाए, लेकिन स्थानीय परिवारों की आमदनी में सुधार न हो, तो विकास का उद्देश्य पूरा नहीं माना जा सकता.

सीमावर्ती गांवों में यह सुनिश्चित करना खास तौर पर जरूरी है कि स्थानीय लोगों को योजनाओं में केवल लाभार्थी बनाकर न छोड़ दिया जाए, बल्कि उन्हें फैसले लेने और कारोबार चलाने में भी भागीदारी मिले.

इसके लिए सहकारी समितियां, स्वयं सहायता समूह, किसान उत्पादक संगठन और युवा समूह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. इनके जरिए छोटे उत्पादकों को एक साथ बाजार तक पहुंचने, सामान की गुणवत्ता सुधारने, बेहतर कीमत हासिल करने और वित्तीय सहायता प्राप्त करने में मदद मिल सकती है.

हर परियोजना शुरू करने से पहले कुछ बुनियादी सवालों पर ध्यान देना जरूरी है. इससे किसकी कमाई बढ़ेगी? सुविधा का रखरखाव कौन करेगा? स्थानीय लोगों को कौन-से नए कौशल मिलेंगे? और योजना तैयार करते समय गांव के लोगों की जरूरतों को कितना महत्व दिया गया है?

इन सवालों के जवाब मिलने से यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि विकास केवल निर्माण कार्यों और आंकड़ों तक सीमित न रहे, बल्कि लोगों की जिंदगी में वास्तविक बदलाव लाए.

मजबूत गांव, मजबूत सीमा

सीमावर्ती इलाकों की चर्चा अक्सर सुरक्षा और सेना के संदर्भ में होती है. लेकिन सीमा की मजबूती में वहां रहने वाले नागरिकों की भी अहम भूमिका होती है.

वाइब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम-II का उद्देश्य सीमावर्ती आबादी के जीवन स्तर और रोजगार के अवसरों को बेहतर बनाना, सुरक्षित सीमाओं को बढ़ावा देना और सीमा पार होने वाले अपराधों पर नियंत्रण में मदद करना भी है. कार्यक्रम की परिकल्पना में स्थानीय आबादी को सीमा की निगरानी करने वाले सुरक्षा बलों की आंख और कान के रूप में सक्षम बनाने की बात भी शामिल है.

इसका अर्थ यह नहीं है कि नागरिकों को सैनिकों की भूमिका निभानी है. बात यह है कि जो लोग इलाके में रहते हैं, वे वहां के हालात और स्थानीय बदलावों को अच्छी तरह समझते हैं. जब उनका प्रशासन से संपर्क मजबूत होता है और वे आर्थिक रूप से सक्रिय रहते हैं, तो समुदाय की जागरूकता और भरोसा भी बढ़ सकता है.

बेहतर सड़कें आपातकालीन सेवाओं को मदद देती हैं. संचार सुविधाएं लोगों और प्रशासन के बीच संपर्क बनाए रखती हैं. रोजगार के अवसर परिवारों की आर्थिक मजबूती बढ़ाते हैं. इन सभी चीजों का संयुक्त असर सीमावर्ती गांवों की स्थिरता पर पड़ता है.

इसके लिए अलग-अलग सरकारी विभागों, स्थानीय प्रशासन, सुरक्षा बलों, पर्यटन से जुड़े संस्थानों और समुदायों के बीच तालमेल भी जरूरी है. प्रशिक्षण देने के बाद युवाओं को बाजार से जोड़ना, पर्यटन शुरू करने से पहले सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करना और स्थानीय कारोबारियों को परिवहन तथा वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना इसी तालमेल का हिस्सा है.

अब असली चुनौती है युवाओं के सपनों को पूरा करना

वाइब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितनी सड़कें बनीं, कितने भवन तैयार हुए या कितने गांवों में बिजली पहुंची. यह भी देखना होगा कि कितने युवाओं को रोजगार मिला, कितने स्थानीय कारोबार शुरू हुए और कितने परिवारों की आमदनी में सुधार आया.

यह काम आसान नहीं है. पहाड़ी इलाकों में खराब मौसम और बर्फबारी विकास कार्यों को प्रभावित कर सकते हैं. रेगिस्तानी क्षेत्रों में पानी की कमी और दूरियां बड़ी चुनौती बनी रह सकती हैं. कुछ जगहों पर सुरक्षा संबंधी प्रतिबंध भी लागू रहेंगे. इसके अलावा, स्थानीय संस्थाओं को मजबूत बनाने और युवाओं को बाजार के अनुरूप प्रशिक्षण देने में समय लगेगा.

फिर भी, इस पहल की अहमियत इसी में है कि यह सीमावर्ती गांवों को केवल भौगोलिक दृष्टि से दूर स्थित बस्तियों के रूप में देखने के बजाय उन्हें देश के विकास से जोड़ने की कोशिश करती है.

सियाचिन की बर्फीली ऊंचाइयों से लेकर थार के रेत के टीलों तक, इन गांवों का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि वहां के युवाओं को अपने ही इलाके में आगे बढ़ने के कितने अवसर मिलते हैं.

जब कोई युवा अपने गांव में कारोबार शुरू कर सके, कोई स्थानीय कारीगर अपने उत्पाद देशभर में बेच सके, कोई छात्र इंटरनेट के जरिए बेहतर शिक्षा हासिल कर सके और कोई परिवार पर्यटन से नियमित आमदनी कमा सके, तभी विकास का असर जमीन पर दिखाई देगा.

आखिरकार, सीमावर्ती गांवों को मजबूत बनाने का मतलब केवल सीमा के पास बुनियादी ढांचा खड़ा करना नहीं है. इसका मतलब है वहां रहने वाले लोगों को सम्मान, सुविधाएं और बेहतर भविष्य देना. जब युवाओं को अपने गांव में संभावनाएं नजर आएंगी, तो वे केवल वहां रहने वाले नागरिक नहीं रहेंगे, बल्कि अपने क्षेत्र की आर्थिक तरक्की, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक मजबूती के सक्रिय भागीदार बनेंगे.

Prashant Kumar

CEO – Bharat Express Digital Chief Advisor to the Chairman & Managing Director and Editor-in-Chief Mr. Prashant Kumar is a digital, media and growth transformation leader with 18+ years of experience across strategy, technology, AI, marketing and business transformation, having worked with leading organisations including Amazon, IBM, Adidas and Tata Consumer Products. At Bharat Express, he leads digital transformation, audience growth, technology, partnerships, monetisation and new business initiatives to build a scalable, future-ready media ecosystem.

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