विशेष

जयप्रकाश नारायण के विचारों को नए नजरिए से सामने लाती प्रशांत आनंद की किताब, जानिए क्यों है खास

भारतीय राजनीति में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी अहमियत किसी एक दौर तक सीमित नहीं रहती. लोकनायक जयप्रकाश नारायण भी ऐसी ही शख्सियत थे. उन्होंने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया, समाजवाद की राह पर चले और बाद में भ्रष्टाचार तथा व्यवस्था में बदलाव के लिए संपूर्ण क्रांति का नारा दिया. उनकी राजनीति का मकसद सिर्फ सत्ता बदलना नहीं, बल्कि समाज में ऐसी व्यवस्था बनाना था, जहां आम आदमी को सम्मान, न्याय और अपने अधिकार मिल सकें.

इसी विचारधारा और संघर्ष को नए सिरे से समझने की कोशिश की गई है आईपीएस अधिकारी प्रशांत आनंद की नई किताब ‘जयप्रकाश है नाम: स्वतंत्रता, सर्वोदय और संपूर्ण क्रांति की महायात्रा’ में. प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित 208 पन्नों की यह पुस्तक जयप्रकाश नारायण के जीवन की घटनाओं को सामने रखने के साथ-साथ उनके विचारों की आज के समय में अहमियत पर भी ध्यान दिलाती है.

लेखक प्रशांत आनंद का प्रयास जयप्रकाश नारायण की जिंदगी से जुड़ी पुरानी जानकारियों को दोहराने भर तक सीमित नहीं है. उन्होंने खास तौर पर उनके सर्वोदय दर्शन, नैतिक मूल्यों और बिना किसी सत्ता या पद के लालच के जनता के लिए काम करने की भावना को समझने पर जोर दिया है.

जयप्रकाश नारायण के लिए आजादी का मतलब केवल अंग्रेजों से मुक्ति पाना नहीं था. वह चाहते थे कि देश के हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने का मौका मिले और समाज में अन्याय तथा असमानता को दूर किया जाए. उनकी नजर में लोकतंत्र तभी मजबूत हो सकता है, जब राजनीति का केंद्र आम जनता हो.

पुस्तक में जयप्रकाश के विचारों को महात्मा गांधी की विरासत से भी जोड़कर देखा गया है. लेखक के मुताबिक, गांधी के आध्यात्मिक विचारों को आगे बढ़ाने में आचार्य विनोबा भावे की अहम भूमिका रही, जबकि उनके राजनीतिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण को जयप्रकाश नारायण ने आगे बढ़ाया. उन्होंने वर्गों के बीच टकराव के बजाय आपसी सहयोग की गांधीवादी सोच को महत्व दिया.

आजादी की लड़ाई से संपूर्ण क्रांति तक का सफर

किताब जयप्रकाश नारायण के जीवन के अलग-अलग पड़ावों को जोड़ते हुए उनकी वैचारिक यात्रा सामने लाती है. इसमें स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनके संघर्ष, समाजवाद के प्रति उनकी प्रतिबद्धता, सर्वोदय की दिशा में किए गए प्रयास और बाद में संपूर्ण क्रांति के आह्वान तक की कहानी शामिल है.

जयप्रकाश नारायण ने अपने सार्वजनिक जीवन में यह दिखाया कि राजनीति में बदलाव लाने के लिए सिर्फ पद हासिल करना जरूरी नहीं है. जनता के बीच रहकर, गलत नीतियों का विरोध करके और व्यवस्था से सवाल पूछकर भी देश की दिशा बदली जा सकती है. खासकर युवाओं के बीच उनका प्रभाव इसी विश्वास से जुड़ा था कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना और बेहतर समाज का सपना देखना जरूरी है.

पुस्तक इसी पहलू को सामने लाने की कोशिश करती है कि आखिर क्यों जयप्रकाश नारायण का नाम आज भी लोकतांत्रिक अधिकारों, जनभागीदारी और राजनीतिक बदलाव की चर्चा में लिया जाता है.

गांधी आश्रम से मिली प्रेरणा, किताब तक पहुंचा सफर

प्रशांत आनंद झारखंड कैडर के 2013 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं. उनके लेखन के पीछे व्यक्तिगत अनुभवों और बचपन में मिले संस्कारों की भी अहम भूमिका रही है. उनका बचपन भागलपुर के गांधी आश्रम में बीता, जहां महात्मा गांधी, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण से जुड़े विचारों और प्रसंगों से उनका परिचय हुआ.

बचपन में मिली यही प्रेरणा आगे चलकर उनकी वैचारिक रुचि का हिस्सा बनी. प्रशांत आनंद इससे पहले ‘राज कौशल’ जैसी पुस्तक भी लिख चुके हैं. हालांकि, ‘जयप्रकाश है नाम’ उनके लिए खास महत्व रखती है, क्योंकि इसमें भारतीय राजनीति और समाज को देखने का उनका वैचारिक नजरिया भी दिखाई देता है.

11 अक्टूबर को हुआ पुस्तक का लोकार्पण

इस पुस्तक का लोकार्पण 11 अक्टूबर 2026 को लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 124वीं जयंती के अवसर पर नई दिल्ली स्थित लोकनायक जयप्रकाश नारायण स्मारक पार्क में किया गया. कार्यक्रम में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए, जबकि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष राम बहादुर राय विशिष्ट अतिथि रहे. आयोजन में जेपीडीएफ और प्रभात प्रकाशन का भी सहयोग रहा.

आज के दौर में क्यों जरूरी हैं जयप्रकाश के विचार?

आज राजनीति, लोकतंत्र और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता को लेकर लगातार बहस होती रहती है. ऐसे समय में जयप्रकाश नारायण की सोच पर आधारित यह पुस्तक पाठकों को कुछ बुनियादी सवालों पर विचार करने का मौका देती है. क्या राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता हासिल करना होना चाहिए? क्या जनसेवा पद और प्रतिष्ठा से बड़ी नहीं है? और क्या लोकतंत्र की मजबूती के लिए आम नागरिक की भागीदारी जरूरी नहीं है?

जयप्रकाश नारायण का जीवन इन सवालों पर सोचने की प्रेरणा देता है. उन्होंने अपने आचरण से यह संदेश देने की कोशिश की कि सार्वजनिक जीवन में सिद्धांतों और नैतिक जिम्मेदारी की अपनी अहमियत होती है.

प्रशांत आनंद की यह किताब उन पाठकों के लिए उपयोगी हो सकती है, जो जयप्रकाश नारायण को केवल संपूर्ण क्रांति के नारे तक सीमित करके नहीं देखना चाहते, बल्कि उनके पूरे वैचारिक सफर को समझना चाहते हैं.

ये भी पढ़ें- आखिर क्यों दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज हुआ पाकिस्तान? जानिए हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट का कड़वा सच

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

Recent Posts

रूस में हिंदी नाटक चांदनी रातें का हुआ मंचन, Bharat Express रहा मीडिया पार्टनर, रूसी दर्शकों का मिला भरपूर प्यार

Chandni Raatein Play: रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में हिंदी नाटक 'चांदनी रातें' का मंचन किया…

14 minutes ago

प्रदर्शन का हक या रोजी-रोटी? कनॉट प्लेस मार्च पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक- सब आपस में जुड़े हैं

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क में CJP के ‘लहरा दो…

21 minutes ago

दिवाली से पहले केंद्रीय कर्मचारियों की मौज! मोदी सरकार ने किया एडहॉक बोनस का ऐलान, मिलेंगे 6,908 रुपये

दिवाली से पहले केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए पात्र केंद्रीय कर्मचारियों को…

37 minutes ago

नोएडा में पुलिस और चेन स्नैचर्स के बीच मुठभेड़, दो बदमाश घायल; महंगी बाइक समेत 2.19 लाख रुपये बरामद

Police Encounter Chain Snatchers: नोएडा के थाना सेक्टर-39 क्षेत्र में चेकिंग के दौरान पुलिस और…

47 minutes ago

Delhi Riots Case: अतहर खान की जमानत याचिका पर टली सुनवाई, दिल्ली पुलिस ने किया कड़ा विरोध

Supreme Court: दिल्ली दंगे की बड़ी साजिश के आरोपी अतहर खान की जमानत याचिका पर…

57 minutes ago