महारानी गायत्री देवी
महारानी गायत्री देवी की कहानी सिर्फ एक राजघराने की शख्सियत की नहीं है, बल्कि उस सोच की है जिसने परंपराओं की दीवारों को चुनौती दी. अगर चाहतीं तो वे पूरी जिंदगी महलों की आरामदायक दुनिया में बिता सकती थीं, लेकिन उन्होंने इससे आगे बढ़कर समाज में बदलाव लाने का रास्ता चुना. उनका फोकस खुद की शानो-शौकत से ज्यादा देश की महिलाओं और आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य पर रहा.
महारानी गायत्री देवी का जन्म 23 मई 1919 को लंदन में हुआ था. उनका बचपन का नाम आयशा था. उनके पिता कूचबिहार के राजकुमार जितेंद्र नारायण और मां बड़ौदा की राजकुमारी इंदिरा राजे थीं. पढ़ाई-लिखाई के मामले में उन्हें बेहतरीन माहौल मिला—शांतिनिकेतन, लंदन और स्विट्जरलैंड जैसे जगहों पर उन्होंने शिक्षा हासिल की. घुड़सवारी और पोलो जैसे खेलों में भी उनकी खास पकड़ थी, जो उस समय किसी भी शाही महिला के लिए असामान्य माना जाता था.
1939 में उनका विवाह जयपुर के महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय से हुआ. इसके बाद वे जयपुर की महारानी बनीं. उस दौर में जब राजपूताना समाज में परंपराएं काफी सख्त थीं, वे बिना पर्दे के सार्वजनिक जीवन में आने वाली पहली आधुनिक महारानी मानी जाती हैं. उनकी शख्सियत सिर्फ सुंदरता तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे एक प्रभावशाली और प्रगतिशील नेता के रूप में भी जानी गईं.
1943 में उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया जिसने राजस्थान में लड़कियों की शिक्षा की तस्वीर बदल दी. उन्होंने महारानी गायत्री देवी गर्ल्स पब्लिक स्कूल (MGD) की शुरुआत की. उस समय स्कूल में सिर्फ 40 छात्राएं और एक शिक्षिका थीं, लेकिन सोच बड़ी थी. उस दौर में जब बाल विवाह और पर्दा प्रथा जैसी परंपराएं आम थीं, लड़कियों की पढ़ाई लगभग असंभव मानी जाती थी. ऐसे माहौल में यह स्कूल एक नई शुरुआत साबित हुआ.
आज यही संस्थान देश के प्रतिष्ठित गर्ल्स स्कूलों में गिना जाता है और हजारों लड़कियों के जीवन को नई दिशा दे चुका है.
महारानी गायत्री देवी ने महिलाओं के अधिकारों के लिए भी खुलकर काम किया. वे ऑल इंडिया वीमेन्स कॉन्फ्रेंस से जुड़ीं और समाज में महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता पर जोर देती रहीं. उन्होंने पर्दा प्रथा जैसी परंपराओं के खिलाफ भी आवाज उठाई.
1962 में वे स्वतंत्र पार्टी से लोकसभा सांसद बनीं और भारी मतों से जीत हासिल की. इसके बाद 1967 और 1971 में भी वे संसद में रहीं. आपातकाल के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा, जहां उन्होंने लगभग पांच महीने बिताए. बाद में उन्होंने अपनी आत्मकथा A Princess Remembers लिखी, जो काफी चर्चित रही.
उन्होंने राजस्थान के हस्तशिल्प को नई पहचान दिलाई. स्थानीय कारीगरों, खासकर महिलाओं को काम और मंच देने में उनका बड़ा योगदान रहा. ब्लॉक प्रिंटिंग, जड़ाऊ काम और बुनाई जैसे पारंपरिक हुनर को उन्होंने आगे बढ़ाया. इसके साथ ही ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं और अस्पतालों के सुधार पर भी उन्होंने लगातार काम किया.
महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय की पत्नी महारानी गायत्री देवी का निधन 29 जुलाई 2009 को हुआ, लेकिन उनकी सोच और काम आज भी जीवित हैं. जयपुर का MGD स्कूल और उनके सामाजिक प्रयास आज भी महिलाओं के सशक्तिकरण की मिसाल हैं.
ये भी पढ़ें: पश्चिम बंगाल में बकरीद की सरकारी छुट्टी में बदलाव, अब दो की जगह सिर्फ एक दिन का अवकाश
Also Follow Bharat Express on Youtube
-भारत एक्सप्रेस
सोशल मीडिया पर दो बच्चों का बड़ी साइकिल चलाने का अनोखा देसी जुगाड़ वायरल हो…
Gold-Silver Price Today: दशहरे के दिन सोने और चांदी के बाजार में क्या रहे हाल?…
यमन के शबवा इलाके में हूती विद्रोहियों के हमले में सऊदी समर्थित सरकारी सेना के…
Ajab Gajab News: दशहरे पर देश भर में रावण दहन होता है, लेकिन क्या आप…
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुभकामनाएं दी. उन्होंने…
गढ़चिरोली पुलिस ने सीमावर्ती इलाके में नाकाबंदी के दौरान मोटर साइकिल के पेट्रोल टैंक में…