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जब बच्चे कहानी पढ़ने से पहले खो जाते थे तस्वीरों में… याद आए ‘चंदामामा’ के मशहूर आर्टिस्ट के.सी. शिवाशंकर

आज 29 सितंबर को चन्दामामा के प्रसिद्ध चित्रकार के.सी. शिवाशंकर की छठी पुण्यतिथि है. 29 सितंबर 2020 को चेन्नई में 97 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था. वे चन्दामामा के अंतिम जीवित कलाकारों में से एक थे और उनकी कला ने पीढ़ियों को मोहित किया.

29 सितंबर की तारीख चन्दामामा से जुड़ी यादों को ताजा करने वाली है. इसी दिन प्रसिद्ध चित्रकार के.सी. शिवाशंकर की पुण्यतिथि होती है. 29 सितंबर 2020 को चेन्नई में 97 साल की उम्र में उनका निधन हुआ था. वह चन्दामामा के उन चुनिंदा कलाकारों में शामिल थे, जिन्होंने इस लोकप्रिय पत्रिका की कहानियों को सिर्फ चित्रों के जरिए नहीं सजाया, बल्कि उन्हें पाठकों की कल्पना का हिस्सा बना दिया.

शिवाशंकर ने चन्दामामा की सैकड़ों कहानियों के लिए चित्र बनाए. खास तौर पर विक्रम और बेताल के पात्रों को उन्होंने जिस अंदाज में कागज पर उतारा, वह लंबे समय तक पाठकों की यादों में रहा. उनके बनाए चित्रों में कहानी का रोमांच, पात्रों के चेहरे के भाव और भारतीय परिवेश साफ दिखाई देता था. यही वजह थी कि कई बार पाठक कहानी पढ़ने से पहले उसके चित्रों में ही खो जाते थे.

चित्रों में दिखती थी भारतीय कहानी की दुनिया

शिवाशंकर की कला की अपनी अलग पहचान थी. उनकी रेखाओं में सिनेमाई प्रभाव दिखाई देता था, लेकिन साथ ही भारतीय संस्कृति और रंग-रूप की मजबूत झलक भी मिलती थी. उनके चित्रों में पात्रों की भावनाएं और कहानी का माहौल इस तरह उभरता था कि बच्चों के साथ बड़े पाठक भी उनसे जुड़ जाते थे.

उस दौर में कलाकार घंटों ड्राइंग बोर्ड पर बैठकर काम करते थे. हर चित्र के पीछे मेहनत, धैर्य और बारीकी होती थी. शिवाशंकर ने भी वर्षों तक इसी समर्पण के साथ काम किया और चन्दामामा की काल्पनिक दुनिया को एक ऐसा दृश्य रूप दिया, जिसे कई पीढ़ियों ने देखा और याद रखा.

1947 में शुरू हुआ था चन्दामामा का सफर

चन्दामामा की शुरुआत 1947 में तेलुगु भाषा की पत्रिका के रूप में हुई थी. इसे प्रसिद्ध तेलुगु फिल्म निर्माता बी. नागी रेड्डी और चक्रपाणि ने शुरू किया था. पत्रिका के संपादन की जिम्मेदारी जाने-माने तेलुगु साहित्यकार कोडवतिगंति कुटुंब राव ने संभाली थी.

फिल्म जगत से जुड़े लोगों, लेखकों और चित्रकारों के इस मेल ने चन्दामामा को जल्द ही लोकप्रिय बना दिया. बाद में पत्रिका का विस्तार देश के अलग-अलग हिस्सों तक हुआ और यह हिंदी समेत कई प्रमुख भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होने लगी. इसके संस्कृत, संथाली और सिंधी जैसे भाषाई संस्करण भी निकले. श्रीलंका में इसका सिंहला संस्करण भी प्रकाशित हुआ.

एक समय ऐसा था जब चन्दामामा की हर महीने दो लाख से ज्यादा प्रतियां बिकती थीं. यह आंकड़ा बताता है कि पत्रिका ने भारतीय परिवारों और खासकर बच्चों के बीच कितनी गहरी जगह बनाई थी.

एक पूरी पीढ़ी की यादों का हिस्सा

चन्दामामा केवल मनोरंजन की पत्रिका नहीं थी. इसकी कहानियों में इतिहास, लोककथाएं, कल्पना और भारतीय संस्कृति का ऐसा मेल मिलता था, जिसने बच्चों को पढ़ने के साथ-साथ नई दुनिया की कल्पना करना भी सिखाया. अमर चित्र कथा के साथ चन्दामामा भी कई पीढ़ियों के बचपन का अहम हिस्सा बनी रही.

के.सी. शिवाशंकर जैसे कलाकारों का योगदान इस विरासत में खास रहा. उन्होंने अपनी कला से उन किरदारों को चेहरा दिया, जिन्हें पाठक सिर्फ शब्दों में पढ़ रहे थे. आज डिजिटल दौर में भले ही पढ़ने और कहानियां देखने के तरीके बदल गए हों, लेकिन चन्दामामा के पुराने पन्नों से जुड़ी यादें अब भी लोगों के लिए खास हैं.

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-भारत एक्सप्रेस



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