आज भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है—वह दिन जब 1950 में हमारा संविधान लागू हुआ था, और हमने खुद को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया. इस अवसर पर वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक “हम भारत के लोग : भारतीय संविधान पर नौ निबंध” की चर्चा करना विशेष रूप से प्रासंगिक है.
यह पुस्तक तरुणाभ खेतान (संविधान विशेषज्ञ, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर) और सुरभि करवा द्वारा लिखी गई है, जो 2025 में प्रकाशित हुई. यह एक संक्षिप्त लेकिन गहन रचना है, जो भारतीय संविधान के मूल आदर्शों को आम नागरिक तक पहुंचाने का प्रयास करती है.
पुस्तक का मूल उद्देश्य वर्तमान समय के उन दावों पर विचार करना है, जो पिछले कुछ वर्षों में कई चिंतित नागरिकों, न्यायाधीशों, राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और शिक्षाविदों द्वारा किए गए हैं—कि *भारतीय संविधान खतरे में है. लेखक इस सवाल का सीधा जवाब देने के बजाय पाठक को खुद सोचने-समझने का अवसर देते हैं. वे संविधान के मुख्य आदर्शों—जैसे संघवाद, शक्ति का पृथक्करण (separation of powers), स्वतंत्रता, कानून का शासन (rule of law), मौलिक अधिकार, सामाजिक न्याय आदि—पर नौ निबंधों के माध्यम से चर्चा करते हैं.
गणतंत्र दिवस हमें याद दिलाता है कि संविधान केवल एक कागज नहीं, बल्कि एक जीवंत दस्तावेज है, जिसे हम सब मिलकर बचाते और मजबूत करते हैं. “हम भारत के लोग” पुस्तक ठीक इसी भावना को पुनर्जागृत करती है—कि लोकतंत्र की रक्षा व्यक्तिगत जागरूकता और सक्रिय भागीदारी से ही संभव है.
यदि आप संविधान के प्रति गहरी रुचि रखते हैं या वर्तमान राजनीतिक बहसों को संवैधानिक नजरिए से समझना चाहते हैं, तो यह पुस्तक अवश्य पढ़ें.
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-भारत एक्सप्रेस
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