विशेष

सिदो-कानू और चांद-भैरव की वो वीरगाथा, जब जल-जंगल-जमीन के लिए वीरों ने पानी की तरह बहाया था खून

Hool Diwas: आज सन्ताल हूल दिवस है. यह दिवस 1855 के उस महान आदिवासी विद्रोह की याद में मनाया जाता है, जिसने ब्रिटिश उपनिवेशवाद, जमींदारी शोषण और महाजनों के अत्याचार के खिलाफ सन्ताल समुदाय की एकजुट आवाज को पूरी ताकत से बुलंद किया. 30 जून को सन्ताल हूल दिवस के रूप में मनाने की परंपरा सन्ताल योद्धाओं के बलिदान और उनके अदम्य साहस को श्रद्धांजलि देने का माध्यम है.

सन्ताल हूल: इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय

1854-55 में बंगाल प्रेसीडेंसी (वर्तमान झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के हिस्सों) में सन्ताल जनजाति ने ‘हूल’ (विद्रोह) का बिगुल फूंक दिया. यह विद्रोह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से पहले का सबसे संगठित और व्यापक जन-आंदोलन था.

सिदो मुर्मू, कानू मुर्मू, चांद मुर्मू और भैरव मुर्मू के नेतृत्व में हजारों सन्ताल योद्धा एकजुट हुए. जनजातीय इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि सन्ताल समुदाय पूर्ण रूप से व्यवस्थित और सशस्त्र होकर मैदान में उतरा. वे व्यापारिक केंद्रों, जमींदारों के ठिकानों और ब्रिटिश प्रशासनिक स्थानों पर हमले करने निकले. हजारों की संख्या में सन्ताल योद्धा बारहेट तक पहुंचे और शोषकों को लूटकर अपनी आर्थिक एवं सामाजिक न्याय की मांग को दर्ज कराया.

इस विद्रोह के मुख्य कारण थे:

  • जमींदारों द्वारा सन्तालों की जमीन हड़पना
  • महाजनों का सूदखोरी शोषण
  • ब्रिटिश प्रशासन की पक्षपाती नीतियां
  • पुलिस और कर्मचारियों का अत्याचार

हूल को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार को भारी सैन्य बल का उपयोग करना पड़ा, जिसमें सैकड़ों सन्ताल शहीद हुए. फिर भी यह विद्रोह आदिवासी प्रतिरोध की प्रेरणा का स्रोत बना रहा.

पुस्तक: ‘सन्ताल हूल’

इस महान घटना को विस्तार से समझने के लिए राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. ए.पी. सिंह की पुस्तक ‘सन्ताल हूल’ अत्यंत महत्वपूर्ण है. पुस्तक सन्ताल हूल को केवल एक विद्रोह के रूप में नहीं, बल्कि जनजातीय इतिहास का अनुपम अध्याय बताती है.

लेखक ने सिदो-कानू-चांद-भैरव के महान नेतृत्व, सन्तालों की संगठन क्षमता और उनके संघर्ष की विस्तृत चर्चा की है. पुस्तक में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि ‘जनजातीय इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा था’ जब सन्ताल समुदाय इतनी बड़ी संख्या और व्यवस्था के साथ मैदान में उतरा. यह कृति उन पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो मुख्यधारा के इतिहास के अलावा आदिवासी स्वरों को सुनना चाहते हैं.

 

सन्ताल हूल दिवस हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता की लड़ाई केवल शहरों या बड़े नेताओं तक सीमित नहीं थी. यह उन अनगिनत आदिवासी समुदायों की भी लड़ाई थी, जिन्होंने अपनी जमीन, संस्कृति और गरिमा बचाने के लिए खून बहाया. आज के समय में जब आदिवासी अधिकार, वन-जमीन विवाद और सांस्कृतिक संरक्षण की चर्चा होती है, तब हूल का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है.

‘हूल’ शब्द केवल विद्रोह नहीं, बल्कि न्याय की पुकार है. सिदो-कानू जैसे नेताओं ने साबित कर दिया कि शोषण के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना संभव है.

ये भी पढ़ें:National Statistics Day: कौन थे पीसी महालनोबिस? जिन्होंने ‘डेटा’ को बनाया देश की तरक्की का सबसे बड़ा हथियार

-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

Recent Posts

रांची में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का संवाद कार्यक्रम: शिक्षा, सामाजिक समरसता और विकसित भारत पर ज़ोर

प्रो. (डॉ.) शाहिद अख़्तर ने कहा— “शिक्षा से सशक्तिकरण, संवाद से एकता और समरसता से…

4 hours ago

यूपी में बीजेपी का बड़ा संगठनात्मक फेरबदल: एससी मोर्चा के 95 जिला अध्यक्ष घोषित

उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने संगठनात्मक मजबूती के लिए एससी मोर्चा के 95 जिला अध्यक्षों…

5 hours ago

श्री विजयपुरम में नवरात्रि की धूम: उपराज्यपाल डॉ. दिनेश शर्मा पहले ‘डांडिया महोत्सव’ में हुए शामिल, माता दुर्गा के सामने टेका मत्था

अंडमान-निकोबार की राजधानी श्री विजयपुरम के ITF मैदान में प्रथम डांडिया महोत्सव आयोजित हुआ. उपराज्यपाल…

6 hours ago

अंडमान-निकोबार में राज्यपाल डॉ. दिनेश शर्मा ने किया इंडियन ऑयल के बार्ज ‘MT IRIS’ का लोकार्पण

अंडमान-निकोबार के श्री विजयपुरम में उपराज्यपाल डॉ. दिनेश शर्मा ने इंडियन ऑयल के नए बार्ज…

6 hours ago

सऊदी अरब के रियाद एयरपोर्ट पर भीषण हमला, 12 की मौत और 300 से ज्‍यादा घायल; 11 भारतीय भी चपेट में आए

Riyadh Airport Attack: सऊदी अरब के रियाद स्थित किंग खालिद एयरपोर्ट पर भीषण हमला हुआ.…

7 hours ago