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National Statistics Day: कौन थे पीसी महालनोबिस? जिन्होंने ‘डेटा’ को बनाया देश की तरक्की का सबसे बड़ा हथियार

आजादी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती भरोसेमंद आंकड़ों की कमी थी, जिसके बिना विकास योजनाएं बनाना मुश्किल था.

पीसी महालनोबिस

पीसी महालनोबिस

National Statistics Day: आजादी के बाद भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा था, जहां देश को तेजी से विकास की जरूरत थी. लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत ये थी कि फैसले लेने के लिए भरोसेमंद डेटा ही मौजूद नहीं था. ना खेती-किसानी का सही आंकड़ा, ना उद्योगों की स्पष्ट तस्वीर और ना ही गरीबी-बेरोजगारी का सटीक हिसाब था. इसी कमी को लेकर उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी एक बार कहा था कि ‘हम अंधेरे में काम कर रहे हैं क्योंकि हमारे पास पर्याप्त आंकड़े नहीं हैं.’

इसी ‘अंधेरे’ को रोशनी में बदलने का काम किया प्रोफेसर प्रसांत चंद्र महालनोबिस ने, जिन्हें आज भारत में सांख्यिकी का जनक माना जाता है.

कोलकाता से शुरू हुई एक वैज्ञानिक सोच की यात्रा

29 जून 1893 को कोलकाता में जन्मे प्रशांत चंद्र महालनोबिस ने शुरुआत में भौतिकी की पढ़ाई की और पढ़ाने का काम भी किया. लेकिन धीरे-धीरे उनका झुकाव आंकड़ों और डेटा की दुनिया की तरफ बढ़ता गया. 1920 के दशक में उन्होंने अपने कॉलेज में ही एक सांख्यिकी प्रयोगशाला की नींव रखी, जो उस समय एक बेहद नया और अनोखा कदम था.

इसके बाद 1931 में उन्होंने भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) की स्थापना की, जो आगे चलकर दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित सांख्यिकी संस्थानों में से एक बन गया.

डेटा से देश निर्माण तक का सफर

महालनोबिस सिर्फ किताबों तक सीमित वैज्ञानिक नहीं थे. उन्होंने डेटा को सीधे देश की नीतियों से जोड़ दिया. उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में “महालनोबिस दूरी” नाम का सांख्यिकीय मॉडल शामिल है, जो आज भी मशीन लर्निंग और डेटा साइंस में इस्तेमाल होता है.

आजादी के बाद वे नेहरू के करीबी सलाहकार बने और देश की योजनाओं में उनकी अहम भूमिका रही. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) और केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (CSO) जैसी संस्थाओं की स्थापना में उनका बड़ा योगदान रहा.

1956-61 की दूसरी पंचवर्षीय योजना में महालनोबिस मॉडल को अपनाया गया, जिसमें भारी उद्योगों के विकास पर जोर दिया गया. यह मॉडल भारत की औद्योगिक नीति की दिशा तय करने वाला साबित हुआ. दो-क्षेत्रीय और चार-क्षेत्रीय विकास मॉडल भी उनकी ही देन थे.

आज भी क्यों हैं महालनोबिस प्रासंगिक

आज जब देश बिग डेटा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा साइंस की बात करता है, तो उसकी बुनियाद कहीं न कहीं महालनोबिस की सोच में ही दिखाई देती है. उनकी याद में हर साल 29 जून को राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस मनाया जाता है.

महालनोबिस ने साबित किया कि आंकड़े सिर्फ गणना नहीं होते, बल्कि सही इस्तेमाल होने पर ये किसी भी देश के भविष्य को बदलने की ताकत रखते हैं.

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-भारत एक्सप्रेस



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