आज घर बैठे सैकड़ों टीवी चैनल और OTT प्लेटफॉर्म देखना बिल्कुल सामान्य बात है. लेकिन करीब तीन दशक पहले तस्वीर पूरी तरह अलग थी. 1992 में भारत में टेलीविजन का मतलब लगभग सिर्फ दूरदर्शन हुआ करता था. निजी सैटेलाइट चैनल की बात तब किसी दूर के सपने जैसी लगती थी.
इसी दौर में 2 अक्टूबर 1992 को एक नया चैनल शुरू हुआ—Zee TV. शुरुआत बेहद छोटी थी. चैनल के पास दिन में सिर्फ तीन घंटे का प्रसारण समय था. लेकिन इस छोटे से प्रयोग ने आगे चलकर भारतीय टेलीविजन की तस्वीर ही बदल दी.
इसके पीछे थे हरियाणा के हिसार से आने वाले कारोबारी सुभाष चंद्रा. मीडिया की दुनिया में उनका कोई पारंपरिक अनुभव नहीं था. इसके बावजूद उन्होंने ऐसा जोखिम उठाया, जिसे उस समय शायद बहुत कम लोग लेने की हिम्मत करते.
सुभाष चंद्रा की कहानी किसी बड़े मीडिया परिवार से शुरू नहीं होती. उनकी शुरुआत कारोबार से हुई. अपनी आत्मकथा ‘Z फैक्टर: सही वक्त, पर गलत आदमी – मेरी जीवन यात्रा’, जिसे उन्होंने प्रांजल शर्मा के साथ लिखा है, में चंद्रा ने अपने सफर के कई पहलुओं को विस्तार से बताया है.
किताब के मुताबिक, वह महज 17 साल की उम्र में 17 रुपये लेकर दिल्ली पहुंचे थे. परिवार का कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी उनके सामने थी. इसके बाद उन्होंने अनाज के कारोबार से लेकर पैकेजिंग और ट्यूब बनाने के कारोबार तक अलग-अलग क्षेत्रों में हाथ आजमाया. बाद में मनोरंजन के क्षेत्र में एस्सेल वर्ल्ड जैसी परियोजनाएं भी सामने आईं.
लेकिन असली मोड़ तब आया, जब उनकी नजर सैटेलाइट टेलीविजन पर पड़ी.
1991 के आसपास भारत आर्थिक बदलाव के दौर में प्रवेश कर रहा था. उदारीकरण की शुरुआत हो चुकी थी और दुनिया के लिए भारतीय बाजार के दरवाजे खुल रहे थे. इसी समय चंद्रा ने समझ लिया कि टेलीविजन भी आने वाले वर्षों में तेजी से बदलने वाला है.
सैटेलाइट पर चैनल चलाना उस समय बेहद महंगा और जटिल काम था. एशियासैट पर ट्रांसपॉन्डर लेने के लिए उन्हें भारी रकम चुकानी थी. हांगकांग के कारोबारी ली का-शिंग के साथ हुई बातचीत में उन्हें करीब 50 लाख डॉलर सालाना की पेशकश मिली. रकम इतनी बड़ी थी कि किसी भी कारोबारी के कदम पीछे खींचने के लिए काफी थी. लेकिन चंद्रा ने जोखिम लेना चुना.
2 अक्टूबर 1992 को Zee TV की शुरुआत हुई. शुरुआती दौर में चैनल पर पुरानी फिल्में, गेम शो और पहले से उपलब्ध कार्यक्रम दिखाए जाते थे. प्रसारण का समय भी सिर्फ तीन घंटे था. फिर धीरे-धीरे दर्शकों को यह नया चैनल पसंद आने लगा.
‘सांप सीढ़ी’, ‘अंताक्षरी’, ‘ज़ी हॉरर शो’, ‘खाना खजाना’ और ‘आप की अदालत’ जैसे कार्यक्रमों ने Zee को घर-घर पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई. दर्शक बढ़े तो विज्ञापनदाता भी आने लगे. तीन घंटे का प्रसारण बढ़कर छह घंटे हुआ, फिर 12 घंटे और आखिरकार चैनल 24 घंटे चलने लगा.
‘Z फैक्टर’ की खास बात यह है कि इसमें सिर्फ उपलब्धियों का जिक्र नहीं है. चंद्रा ने अपने कारोबारी फैसलों, राजनीतिक और व्यावसायिक रिश्तों, विवादों और गलतियों के बारे में भी खुलकर लिखा है.
रूपर्ट मर्डोक के साथ कारोबारी रिश्ते हों या शेयर बाजार से जुड़े उतार-चढ़ाव, किताब में उनके कारोबारी सफर के कई ऐसे पहलू सामने आते हैं, जो आमतौर पर सफल लोगों की आत्मकथाओं में कम देखने को मिलते हैं.
कुछ फैसले सफल नहीं हुए. सैटेलाइट टेलीफोनी और इंडियन क्रिकेट लीग जैसी योजनाओं को अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली. लेकिन चंद्रा इन असफलताओं को छिपाने के बजाय उनसे मिली सीख को भी अपनी कहानी का हिस्सा बनाते हैं.
किताब का शीर्षक भी ‘सही वक्त, पर गलत आदमी’ है. चंद्रा खुद को मीडिया उद्योग का एक तरह का ‘आउटसाइडर’ मानते हैं. उनके पास न मीडिया की पारिवारिक विरासत थी और न ही किसी बड़े महानगर से आया हुआ मजबूत नेटवर्क. फिर भी उन्होंने उस समय मौका पहचाना, जब भारत बदल रहा था और स्थापित कारोबारी शायद इस नए क्षेत्र को लेकर उतने आश्वस्त नहीं थे. यही बात उनकी कहानी को दिलचस्प बनाती है. यह सिर्फ Zee TV के बनने की कहानी नहीं है. यह उस दौर की कहानी भी है, जब भारत की अर्थव्यवस्था बदल रही थी, नई तकनीकें दस्तक दे रही थीं और कारोबार करने के पुराने तरीके तेजी से बदल रहे थे.
आज जब टीवी चैनलों की भरमार है और मोबाइल पर कुछ सेकंड में दुनिया भर का कंटेंट उपलब्ध हो जाता है, तब यह याद करना दिलचस्प है कि भारतीय निजी टेलीविजन की बड़ी कहानियों में से एक की शुरुआत सिर्फ तीन घंटे के प्रसारण से हुई थी.
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-भारत एक्सप्रेस
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