Vikram 1 Launch (AI IMAGE)
Vikram 1 Rocket Launch: आज श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC-SHAR) से Skyroot Aerospace का विक्रम-1 रॉकेट सफलतापूर्वक उड़ा. हैदराबाद स्थित इस निजी कंपनी द्वारा विकसित भारत का पहला निजी ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट तीन ठोस ईंधन चरणों और एक लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल से सुसज्जित है. यह 350 किलोग्राम तक के पेलोड को 450 किलोमीटर की निचली पृथ्वी कक्षा (LEO) में 60 डिग्री झुकाव पर स्थापित करने में सक्षम है. यह उपलब्धि महज एक प्रक्षेपण नहीं, बल्कि 46 वर्ष पुरानी विरासतका सजीव विस्तार है.
ठीक 46 साल पहले, 18 जुलाई 1980 को उसी श्रीहरिकोटा से ISRO का चार चरण वाला स्वदेशी रॉकेट SLV-3 ने रोहिणी उपग्रह (RS-1) को 354 किलोमीटर की कक्षा में सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया था. 35 किलोग्राम वजनी इस उपग्रह के साथ भारत दुनिया का छठा देश बना था जिसके पास स्वतंत्र उपग्रह प्रक्षेपण क्षमता थी.
इस मिशन में पूरी तरह स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया गया था. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम समेत सैकड़ों वैज्ञानिकों के अथक प्रयास से तैयार SLV-3 ने साबित कर दिया कि सीमित संसाधनों में भी भारत बड़े सपनों को हकीकत में बदल सकता है.
रोहिणी उपग्रह का वजन लगभग 35 किलोग्राम था. इसे विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (VSSC), तिरुवनंतपुरम में विकसित किया गया था. SLV-3 रॉकेट पूरी तरह से भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा डिजाइन और निर्मित था. इसकी लंबाई लगभग 22 मीटर थी और यह 17 टन वजन का था. प्रक्षेपण के समय रॉकेट 28,000 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से ऊपर उठा और ठीक 22 मिनट बाद उपग्रह को निर्धारित कक्षा में छोड़ दिया.
इस सफलता के पीछे डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम (जिन्हें बाद में भारत रत्न मिला) समेत सैकड़ों भारतीय वैज्ञानिकों का अथक परिश्रम था. यह प्रक्षेपण सोवियत संघ से प्राप्त तकनीकी सहायता के बिना किया गया था, जो भारत की स्वदेशी क्षमता का प्रतीक था.
इससे पहले भारत ने दो असफल प्रक्षेपण प्रयास किए थे. लेकिन 18 जुलाई 1980 को हुई सफलता ने पूरे देश को उत्साहित कर दिया. अखबारों में इसे ‘#LegacyOfTruth’ के रूप में याद किया गया. इस प्रक्षेपण ने PSLV और GSLV जैसे भविष्य के भारी रॉकेट कार्यक्रमों की नींव रखी.
आज ISRO (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) दुनिया के सबसे विश्वसनीय और किफायती स्पेस एजेंसियों में से एक है. चंद्रयान, मंगलयान, गगनयान और नाविक जैसी उपलब्धियां इसी 1980 के रोहिणी मिशन की विरासत पर टिकी हैं.
18 जुलाई 1980 वह दिन था जब भारत ने साबित कर दिया कि सीमित संसाधनों के बावजूद दृढ़ इच्छाशक्ति और वैज्ञानिक प्रतिभा से असंभव को संभव बनाया जा सकता है.
दोनों प्रक्षेपण एक ही स्थान से हुए, एक ही लक्ष्य के साथ आत्मनिर्भर भारत का अंतरिक्ष में विस्तार. रोहिणी ने नींव रखी, विक्रम-1 उस नींव पर नई इमारत खड़ी कर रहा है.
आज निजी कंपनियों का ISRO के साथ जुड़ना भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र को नई ऊंचाइयों की ओर ले जा रहा है. रोहिणी की सफलता ने जो सपना देखा था, वह आज विक्रम-1 जैसे रॉकेटों के रूप में साकार हो रहा है.
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-भारत एक्सप्रेस
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