भारत के इतिहास में 17 जुलाई का दिन महिलाओं के अधिकारों और समान अवसरों की दिशा में एक बेहद अहम पड़ाव माना जाता है. साल 1948 में इसी दिन एक ऐसा फैसला लिया गया, जिसने देश की आधी आबादी के लिए सरकारी सेवाओं के दरवाजे खोल दिए. इस ऐतिहासिक कदम के बाद महिलाएं भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS) और अन्य सार्वजनिक सेवाओं की परीक्षाओं में हिस्सा लेने के योग्य बनीं.
आज जब देश में बड़ी संख्या में महिलाएं प्रशासन, पुलिस, विदेश सेवा और नीति निर्माण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं, तो इसकी शुरुआत के पीछे 17 जुलाई 1948 का यह फैसला एक मजबूत आधार के रूप में याद किया जाता है.
आजादी के बाद भी जारी थी पाबंदी
भारत को 15 अगस्त 1947 को आजादी मिलने के बाद भी सरकारी सेवाओं, खासकर ऊंचे प्रशासनिक और पुलिस पदों पर महिलाओं की भागीदारी सीमित थी. इन सेवाओं में पुरुषों का दबदबा था और महिलाओं को कई जगहों पर अवसर नहीं दिए जाते थे.
स्वतंत्रता के करीब एक साल बाद सरकार ने इस भेदभाव को खत्म करने की दिशा में कदम उठाया. 17 जुलाई 1948 को जारी आधिकारिक अधिसूचना में साफ किया गया कि केवल लिंग के आधार पर किसी व्यक्ति को सार्वजनिक सेवाओं से दूर नहीं रखा जा सकता. यह फैसला समानता के उस विचार को मजबूत करता था, जो आगे चलकर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15 में भी दिखाई दिया.
राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद दस्तावेजों के अनुसार, इस बदलाव के बाद महिलाओं को IAS और IPS सहित किसी भी सार्वजनिक सेवा के लिए अयोग्य नहीं माना जा सकता था.
कई महिलाओं ने रचा नया इतिहास
इस फैसले के बाद महिलाओं ने न सिर्फ इन सेवाओं में प्रवेश किया, बल्कि अपनी मेहनत और क्षमता से नई मिसालें भी कायम कीं.
अन्ना राजम मल्होत्रा भारत की पहली महिला IAS अधिकारी बनीं. वे 1951 बैच की अधिकारी थीं और उन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाले प्रशासनिक क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई. उनका करियर आने वाली पीढ़ियों की महिलाओं के लिए प्रेरणा बना.
इसी तरह किरण बेदी ने साल 1972 में भारत की पहली महिला IPS अधिकारी बनकर इतिहास रचा. पुलिस सेवा में रहते हुए उन्होंने कई सुधारों और सख्त प्रशासनिक फैसलों के लिए पहचान बनाई. बाद में वे पुडुचेरी की उपराज्यपाल भी बनीं.
इसके अलावा, 1949 में चोनिरा बेलियप्पा मुथम्मा भारत की पहली महिला विदेश सेवा (IFS) अधिकारी बनीं और उन्होंने कूटनीति के क्षेत्र में महिलाओं के लिए रास्ते खोले.
एक फैसले से शुरू हुआ सामाजिक बदलाव
17 जुलाई 1948 का फैसला सिर्फ सरकारी नियमों में बदलाव नहीं था, बल्कि यह समाज की सोच में बदलाव की शुरुआत भी था. इसने महिलाओं को देश के प्रशासन और शासन व्यवस्था में बराबरी से योगदान देने का मौका दिया. आज UPSC सिविल सेवा परीक्षा में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है. देश के अलग-अलग हिस्सों में महिला अधिकारी जिला कलेक्टर, पुलिस अधिकारी, विदेश सेवा अधिकारी और कई अन्य जिम्मेदार पदों पर काम कर रही हैं.
यह दिन याद दिलाता है कि समान अवसर देने का एक फैसला कितने बड़े बदलाव ला सकता है. 17 जुलाई उन सभी महिलाओं के संघर्ष और सपनों का प्रतीक है, जिन्होंने पुरानी सीमाओं को चुनौती दी और देश की सेवा में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
महिलाओं को आगे बढ़ने का मौका मिलने से ना सिर्फ उनका जीवन बदला, बल्कि पूरे समाज को आगे बढ़ने की नई दिशा मिली. यही वजह है कि 17 जुलाई 1948 भारतीय इतिहास में महिला सशक्तिकरण की यात्रा का एक यादगार अध्याय बना हुआ है.
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