Google DeepMind Controversy: कभी दुनिया भर के टेक प्रोफेशनल्स के लिए गूगल की पहचान उसके चर्चित आदर्श वाक्य ‘डोंट बी ईविल’ यानी ‘बुराई मत करो’ से हुआ करती थी. लेकिन आज वही सिलिकॉन वैली और लंदन के कांच के दफ्तर एक नैतिक द्वंद्व के अखाड़े में तब्दील हो चुके हैं. सवाल यह उठ रहा है कि क्या तकनीक इंसानियत की सहूलियत के लिए है या फिर युद्धक्षेत्र में विनाश का नया औजार बनने जा रही है? गूगल की सबसे आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इकाई ‘गूगल डीपमाइंड’ (Google DeepMind) के भीतर इन दिनों भीषण घमासान मचा हुआ है.
अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) और इजरायली सेना के साथ किए गए सैन्य और क्लाउड समझौतों के विरोध में डीपमाइंड के कई शीर्ष शोधकर्ताओं व इंजीनियरों ने या तो इस्तीफा दे दिया है या कंपनी छोड़ने का मन बना चुके हैं. कर्मचारियों का सीधा आरोप है कि जिस AI को उन्होंने मानव कल्याण के लिए विकसित किया था, वह अब जंग के मैदान में ‘किल चेन’ का हिस्सा बनाया जा रहा है.
गूगल के भीतर उभरे इस असंतोष की जड़ में दो बड़े रक्षा समझौते हैं. इजरायली सरकार और उसकी सेना के साथ किया गया बहु-अरब डॉलर का क्लाउड और एआई समझौता, जिसका गाजा युद्ध के बाद से लगातार विरोध हो रहा है. अप्रैल में अमेरिकी रक्षा विभाग के साथ हुआ करार, जिसके तहत सेना को गोपनीय ऑपरेशंस और “किसी भी वैध सरकारी उद्देश्य” के लिए गूगल के उन्नत एआई मॉडल इस्तेमाल करने की खुली छूट दी गई.
हालांकि समझौते में लिखा है कि एआई का उपयोग बिना मानवीय नियंत्रण वाले स्वायत्त हथियारों या व्यापक घरेलू निगरानी में नहीं होगा, लेकिन आलोचकों का कहना है कि सैन्य फैसलों पर गूगल के पास कोई वीटो पावर नहीं है. ऐसे में यह नियम केवल कागजी साबित होते हैं.
कंपनी छोड़ने वाले वैज्ञानिकों का दर्द सीधे तौर पर तकनीक के दुरुपयोग से जुड़ा है. लंदन स्थित डीपमाइंड की इंजीनियर सोफिया ने अपने आंतरिक पत्र में लिखा कि मुझे अब विश्वास नहीं रहा कि हमारी तकनीक का समाज पर कोई सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. उन्होंने आरोप लगाया कि आंतरिक मंचों पर विरोध करने पर ‘नरसंहार’ जैसे शब्दों वाली पोस्ट हटा दी गईं और मैनेजमेंट ने इसे ‘आक्रामक लहजा’ बताकर पल्ला झाड़ लिया.
वरिष्ठ शोधकर्ता एंड्रियास किर्श ने डीपमाइंड छोड़ते हुए खुलासा किया कि 2014 में जब गूगल ने डीपमाइंड को खरीदा था, तब सैन्य इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की शर्त रखी गई थी. आज उनमें से एक भी सुरक्षा मानक कायम नहीं रहा.
गूगल प्रबंधन ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है. कंपनी के प्रवक्ता टॉम हेवेट का कहना है कि वैश्विक स्तर पर सार्वजनिक क्षेत्र के साथ काम करते हुए सभी अनुबंधों की समीक्षा उनके एआई सिद्धांतों के आधार पर की जाती है. गूगल का तर्क है कि पारदर्शी और कड़े मानकों के साथ सेना को तकनीक मुहैया कराना “राष्ट्रीय सुरक्षा का समर्थन करने के लिए एक जिम्मेदार दृष्टिकोण” है.
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गौरतलब है कि पेंटागन के साथ दौड़ में सिर्फ गूगल नहीं, बल्कि OpenAI और एलन मस्क की xAI भी समझौते कर चुकी हैं. वहीं दूसरी तरफ, एआई कंपनी एंथ्रोपिक (Anthropic) को पेंटागन ने इसलिए ब्लैकलिस्ट कर दिया क्योंकि उसने अपने मॉडल से हथियारों और निगरानी से जुड़े सुरक्षा प्रतिबंध हटाने से साफ इनकार कर दिया था.
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जब प्रयोगशाला में लिखे जाने वाले कंप्यूटर कोड युद्ध के मैदान में मिसाइलों के निशाने तय करने लगें, तो वैज्ञानिक का असहज होना स्वाभाविक है. गूगल के गलियारों में छिड़ी यह जंग सिर्फ कर्मचारियों और प्रबंधन की खींचतान नहीं, बल्कि 21वीं सदी का सबसे बड़ा मानवीय सवाल है. अगर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी असीमित ताकत को बिना किसी ठोस अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण के सेनाओं के सुपुर्द कर दिया गया, तो सहूलियत की आड़ में तकनीक मानवता के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा संकट बन सकती है.
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