Year Ender 2025: 2025 का वर्ष ग्लोबल साउथ की कूटनीति के लिए निर्णायक रहा, और इस उभार के केंद्र में भारत की भूमिका सबसे स्पष्ट रूप से सामने आई. पिछले एक दशक में भारत ने जिस तरह वैश्विक शक्ति-संतुलन में अपनी जगह बनाई है, वह अब सिर्फ आर्थिक विस्तार या जनसंख्या के आकार का परिणाम नहीं, बल्कि रणनीतिक कूटनीति, दक्षिण–दक्षिण सहयोग और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की सक्रिय मांगों का संयोग है.
जिस समय दुनिया पारंपरिक महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा से जूझ रही है, भारत ने खुद को उस पुल के रूप में स्थापित किया है जो विकसित और विकासशील दुनिया के बीच संवाद, विश्वास और विमर्श का आधार बनता है.
2025 में जब ब्रिक्स का विस्तार हुआ और रियो दी जिनेरियो में इसका 11+ देशों वाला स्वरूप सामने आया, भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को व्यापक वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं से जोड़ा. नई दिल्ली का यह मानना रहा है कि आईएमएफ, डब्ल्यूटीओ, यूएन सुरक्षा परिषद जैसे संस्थानों में वास्तविक सुधार तब तक संभव नहीं, जब तक प्रतिनिधित्व जनसंख्या, आर्थिक योगदान और भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के आधार पर न दिया जाए.
भारत के दृष्टिकोण का केंद्रीय तत्व यह है कि मौजूदा वैश्विक ढांचा 1945 की शक्ति-व्यवस्था का प्रतिबिंब है, जबकि 2025 की दुनिया पूरी तरह अलग आर्थिक भूगोल और राजनीतिक गतिशीलता पर खड़ी है. इसी वजह से भारत लगातार कोटा बढ़ोतरी, वोटिंग शेयर और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांगों को ग्लोबल साउथ की सामूहिक आवाज के तौर पर पेश करता रहा है.
भारत की भूमिका इसलिए भी विशिष्ट है कि वह सिर्फ बदलाव की मांग नहीं करता, बल्कि उसके मॉडल को अपने घरेलू विकास अनुभवों से जोड़कर प्रस्तुत करता है. डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (यूपीआई, आधार आधारित सेवाएं, कोविन मॉडल) को भारत ने वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं (ग्लोबल पब्लिक गुड्स) की अवधारणा से जोड़कर ग्लोबल साउथ को तकनीकी समानता और स्वायत्तता का रास्ता दिया है. अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका के कई देशों ने 2025 में भारत से डिजिटल सहयोग और तकनीकी साझेदारी के समझौते किए, जिससे भारत की कूटनीति सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि विकास-समर्थक और परिणाम-केंद्रित बन गई.
भारत ने 2025 में जलवायु कूटनीति को भी ग्लोबल साउथ के नजरिए से पुनर्परिभाषित किया. वैश्विक मंचों पर भारत ने बार-बार इस तथ्य को रेखांकित किया कि विकासशील देशों से नेट-जीरो या उत्सर्जन कटौती के कठोर लक्ष्य तभी अपेक्षित हो सकते हैं जब उन्हें वित्त, तकनीक और ऊर्जा संक्रमण में वास्तविक सहयोग मिले. भारत की यह स्थिति व्यापक दक्षिणी विश्व के हितों से मेल खाती है, क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा और विकास के बीच संतुलन बनाना ग्लोबल साउथ का साझा संघर्ष है. सीओपी मंचों पर भारत की यह नीति प्रतिरोध नहीं, बल्कि समाधान तलाशने वाली नेतृत्वकारी भूमिका के रूप में उभरी.
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि ग्लोबल साउथ की राजनीति अब सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि आर्थिक समूहबद्धता और नई वित्तीय व्यवस्थाओं के निर्माण की दिशा में भी कदम बढ़ाए गए. भारत ने कई परियोजनाओं को प्राथमिकता देने का आग्रह किया, ताकि दक्षिणी देशों के बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और शिक्षा में सीधे निवेश हो सके. यह वह क्षेत्र है जहां भारत पश्चिमी आर्थिक संस्थानों की तुलना में अधिक लचीला, समानता-आधारित और भरोसेमंद साझेदार के रूप में देखा जाता है.
भारत की कूटनीतिक सफलता का एक और महत्वपूर्ण तत्व यह रहा कि वह ग्लोबल साउथ को एकजुट करने के साथ-साथ पश्चिमी देशों से भी मजबूत संवाद बनाए रखता है. भारत की विदेश नीति का यह संतुलित मॉडल, स्ट्रैटजिक ऑटोनॉमी (सामरिक स्वायत्तता) 2025 में और अधिक स्पष्ट रूप से सामने आया, जहां भारत न तो किसी ब्लॉक का अधीन हिस्सा बना और न ही टकराव की राजनीति का हिस्सा. इसके बजाय, उसने एक व्यावहारिक, बहुपक्षीय और साझा-हित आधारित नेतृत्व का प्रदर्शन किया.
ग्लोबल साउथ का उभार वास्तव में भारत के नेतृत्व, नैरेटिव-निर्माण, विकास मॉडल और कूटनीतिक पूंजी की वजह से तेज हुआ है. ब्राजील, नाइजीरिया, इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश भी इसमें सक्रिय हैं, लेकिन भारत का आकार, स्थिरता, तकनीकी क्षमता और वैश्विक प्रतिष्ठा उसे इस परिवर्तन का अग्रदूत बनाती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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