Israel Iran War History Explainer: इजरायल और ईरान इन दिनों जंग के मौदान में हैं. अमेरिका इजरायल का साथ दे रहा है तो अबर देश दो खेमों में बंट गए हैं. मिडिल ईस्ट की सरजमीं पर फैली बारूद कोई चंद दिनों की रंजिश का नतीजा नहीं है. यह उस जलते हुए अंगारे की तरह है जिसे बुझाने की कोशिशें तो बहुत हुईं. लेकिन ज्यों-ज्यों दवा हुई मर्ज बढ़ता गया. आज जब ईरान और इजरायल आमने-सामने हैं तो दुनिया इसे तीसरे विश्व युद्ध की आहट मान रही है. दुनिया भर के देशों में अलर्ट है. आम नागरिक से लेकर बाजार तक इसके अंत के अजाम के बारे में सोच रहे हैं.
यह कोई आज की जंग नहीं है. इस खूनी दास्तान की इब्तिदा आज से 77 साल पहले ही हो चुकी थी. हाल फिलहाल में इसे साल 2023 में हवा मिली और उबाल आपके सामने है. इस जंग में कई जवानों के साथ ही मासूमों की भी जान जा चुकी है पर मुकाम है कि आज तक नहीं मिला. आइये इतिहास के पन्नों से 77 साल पुरानी इस जंग को समझते हैं.
7 अक्टूबर 2023 की वह सुबह जब हमास ने इजरायल पर अचानक हमला किया तो उसने सोए हुए जिन्न को जगा दिया. पहले हम उसे ‘गाजा युद्ध’ कह रहे थे लेकिन वह धीरे-धीरे ‘हिजबुल्लाह’ से होता हुआ सीधे ‘ईरान’ की दहलीज तक जा पहुंचा है. आज 2026 में हालात यह हैं कि यह जंग अब केवल फलस्तीन तक सीमित नहीं रही. बल्कि तेहरान और तेल अवीव के बीच सीधी जंग में तब्दील हो चुकी है. यह 2023 के उसी हमले की अगली कड़ी है जिसने मध्य पूर्व के समीकरणों को पलट कर रख दिया.
14 मई 1948 को जैसे ही डेविड बेन-गुरियन ने इजरायल की आजादी का ऐलान किया, अगले ही चंद घंटों में मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और इराक की सेनाओं ने चारों तरफ से हमला बोल दिया. अरब देशों का नारा था कि यहूदियों को समंदर में धकेल देंगे.
लगभग 10 महीने चली इस जंग में इजरायल न सिर्फ बचा रहा, बल्कि उसने संयुक्त राष्ट्र के विभाजन प्लान से भी 40% ज्यादा जमीन पर कब्जा कर लिया. करीब 7 लाख फलस्तीनियों को अपना घर छोड़ना पड़ा, जिसे उन्होंने तबाही का नाम दिया. जॉर्डन ने वेस्ट बैंक और मिस्र ने गाजा पट्टी पर अपना हक जमा लिया.
मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया. इससे बौखलाए ब्रिटेन और फ्रांस के साथ मिलकर इजरायल ने सिनाई प्रायद्वीप पर धावा बोल दिया. सैन्य रूप से इजरायल जीत गया, लेकिन अमेरिका और सोवियत संघ के दबाव में उसे पीछे हटना पड़ा. हालांकि, इस जंग ने साबित कर दिया कि इजरायल अब इस इलाके की एक बड़ी ‘फौजी ताकत’ बन चुका है.
तनाव चरम पर था. इजरायल ने पहले हमले की रणनीति अपनाई और कुछ ही घंटों में मिस्र की पूरी वायुसेना को जमीन पर ही मटियामेट कर दिया. महज 6 दिनों में इजरायल ने मिस्र से गाजा और सिनाई, जॉर्डन से वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलेम, और सीरिया से गोलान हाइट्स छीन लिए. इजरायल का आकार रातों-रात तीन गुना बढ़ गया. अरब जगत के लिए यह ‘जिल्लत’ की सबसे बड़ी तारीख बन गई.
अपनी खोई हुई जमीन और इज्जत वापस पाने के लिए मिस्र और सीरिया ने यहूदियों के सबसे पवित्र त्योहार ‘योम किप्पुर’ के दिन अचानक हमला किया. शुरुआत में इजरायली सेना संभल नहीं पाई और उसे भारी नुकसान हुआ. अमेरिका की मदद से इजरायल ने पलटवार तो किया, लेकिन इस युद्ध ने इजरायल के ‘अजेय’ होने के भ्रम को तोड़ दिया. इसी के बाद 1979 में कैंप डेविड समझौता हुआ और मिस्र पहला अरब देश बना जिसने इजरायल को मान्यता दी और अपना सिनाई वापस लिया.
साल 1982 में इजरायल ने लेबनान में सक्रिय फलस्तीनी लड़ाकों (PLO) को खत्म करने के लिए हमला किया. 2006 में इसी कड़ी में हिजबुल्लाह के साथ एक भीषण 34 दिनी युद्ध हुआ. इन युद्धों ने लेबनान को खंडहर बना दिया और इजरायल के सामने एक नया और खतरनाक दुश्मन ‘हिजबुल्लाह’ खड़ा हो गया, जिसे सीधे ईरान की सरपरस्ती हासिल थी.
7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इजरायल की सुरक्षा दीवार को ढहाते हुए भीषण नरसंहार किया. इजरायल ने इसके जवाब में गाजा को श्मशान बना दिया. यह जंग अब गाजा से निकलकर लेबनान और सीधे ईरान तक पहुंच गई है. पहली बार ईरान ने अपनी सरजमीं से इजरायल पर सैकड़ों मिसाइलें दागीं. आज 2026 में यह लड़ाई अब केवल जमीन के टुकड़े की नहीं, बल्कि ‘वर्चस्व’ और ‘अस्तित्व’ की बन चुकी है.
एक वक्त था जब पूरा अरब जगत (22 देश) इजरायल के खिलाफ एक लाइन में खड़ा था. लेकिन आज तस्वीर अलग है. ईरान के बढ़ते रसूख और उसके शिया हिलाल के डर ने सऊदी अरब, यूएई और जॉर्डन जैसे सुन्नी अरब मुल्कों को इजरायल के साथ एक अनकहे गठबंधन में ला खड़ा किया है. अब यह जंग ‘इजरायल बनाम अरब’ नहीं, बल्कि ‘इजरायल+उदारवादी अरब देश बनाम ईरान+उसके उग्रवादी गुट’ बन गई है. ईरान पर केंद्रित इस जंग ने फलस्तीन के मुद्दे को हाशिए पर धकेल दिया है.
वक्त के साथ इस जंग का मिजाज बदल गया है. पहले यह ‘इजरायल बनाम अरब’ था, लेकिन आज यह ‘इजरायल बनाम ईरान’ केंद्रित हो गया है. दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान अरब जगत में बड़ी दरार आई. ‘अब्राहम अकॉर्ड’ जैसे समझौतों ने यूएई (UAE), बहरीन और मोरक्को जैसे देशों को इजरायल के करीब ला खड़ा किया. इन देशों ने समझ लिया कि ‘दुश्मनी से घर नहीं चलते’, इसलिए उन्होंने अपने आर्थिक हितों को तवज्जो दी. अब स्थिति यह है कि एक तरफ ईरान अपने ‘प्रॉक्सिस’ (हमास, हिजबुल्लाह, हूथी) के जरिए इजरायल को चुनौती दे रहा है, तो दूसरी तरफ कई बड़े अरब देश इस सीधे टकराव से कन्नी काट चुके हैं.
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आज का मंजर देखकर लगता है कि ‘लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई’. 1948 की वह चिंगारी आज 2026 में एक ऐसा अलाव बन चुकी है जिसकी तपिश पूरी दुनिया महसूस कर रही है. जब तक बातचीत की मेज पर इंसाफ का तराजू बराबर नहीं होगा, तब तक यह कहना मुश्किल है कि यह ‘बारूद का खेल’ कब थमेगा. दुआ बस इतनी है कि सियासत की इस बिसात पर बेगुनाहों का खून बहना बंद हो.
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