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77 साल, 7 जंग और अधूरा अंजाम…, 1948 से 2026 तक बारूदी मिडिल ईस्ट; अरब की लड़ाई में ईरान क्यों अकेला विलेन? Explained

Israel Iran War History Explainer: इजरायल और ईरान के बीच छिड़ी जंग 77 साल पुरानी है. 1948 के पहले युद्ध से लेकर 2026 के महायुद्ध और अरब देशों के बदलते समीकरणों की पूरी कहानी यहां पढ़ें

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Israel Iran War History Explainer: इजरायल और ईरान इन दिनों जंग के मौदान में हैं. अमेरिका इजरायल का साथ दे रहा है तो अबर देश दो खेमों में बंट गए हैं. मिडिल ईस्ट की सरजमीं पर फैली बारूद कोई चंद दिनों की रंजिश का नतीजा नहीं है. यह उस जलते हुए अंगारे की तरह है जिसे बुझाने की कोशिशें तो बहुत हुईं. लेकिन ज्यों-ज्यों दवा हुई मर्ज बढ़ता गया. आज जब ईरान और इजरायल आमने-सामने हैं तो दुनिया इसे तीसरे विश्व युद्ध की आहट मान रही है. दुनिया भर के देशों में अलर्ट है. आम नागरिक से लेकर बाजार तक इसके अंत के अजाम के बारे में सोच रहे हैं.

यह कोई आज की जंग नहीं है. इस खूनी दास्तान की इब्तिदा आज से 77 साल पहले ही हो चुकी थी. हाल फिलहाल में इसे साल 2023 में हवा मिली और उबाल आपके सामने है. इस जंग में कई जवानों के साथ ही मासूमों की भी जान जा चुकी है पर मुकाम है कि आज तक नहीं मिला. आइये इतिहास के पन्नों से 77 साल पुरानी इस जंग को समझते हैं.

2023 के काले शनिवार को सुलगी आग

7 अक्टूबर 2023 की वह सुबह जब हमास ने इजरायल पर अचानक हमला किया तो उसने सोए हुए जिन्न को जगा दिया. पहले हम उसे ‘गाजा युद्ध’ कह रहे थे लेकिन वह धीरे-धीरे ‘हिजबुल्लाह’ से होता हुआ सीधे ‘ईरान’ की दहलीज तक जा पहुंचा है. आज 2026 में हालात यह हैं कि यह जंग अब केवल फलस्तीन तक सीमित नहीं रही. बल्कि तेहरान और तेल अवीव के बीच सीधी जंग में तब्दील हो चुकी है. यह 2023 के उसी हमले की अगली कड़ी है जिसने मध्य पूर्व के समीकरणों को पलट कर रख दिया.

इतिहास के पन्नों पर बारूद ने लिखी तकदीर

1948 में पहला वजूद का युद्ध

14 मई 1948 को जैसे ही डेविड बेन-गुरियन ने इजरायल की आजादी का ऐलान किया, अगले ही चंद घंटों में मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और इराक की सेनाओं ने चारों तरफ से हमला बोल दिया. अरब देशों का नारा था कि यहूदियों को समंदर में धकेल देंगे.

लगभग 10 महीने चली इस जंग में इजरायल न सिर्फ बचा रहा, बल्कि उसने संयुक्त राष्ट्र के विभाजन प्लान से भी 40% ज्यादा जमीन पर कब्जा कर लिया. करीब 7 लाख फलस्तीनियों को अपना घर छोड़ना पड़ा, जिसे उन्होंने तबाही का नाम दिया. जॉर्डन ने वेस्ट बैंक और मिस्र ने गाजा पट्टी पर अपना हक जमा लिया.

1956 में स्वेज संकट का दौर

मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया. इससे बौखलाए ब्रिटेन और फ्रांस के साथ मिलकर इजरायल ने सिनाई प्रायद्वीप पर धावा बोल दिया. सैन्य रूप से इजरायल जीत गया, लेकिन अमेरिका और सोवियत संघ के दबाव में उसे पीछे हटना पड़ा. हालांकि, इस जंग ने साबित कर दिया कि इजरायल अब इस इलाके की एक बड़ी ‘फौजी ताकत’ बन चुका है.

1967 में छह दिन चली जंग

तनाव चरम पर था. इजरायल ने पहले हमले की रणनीति अपनाई और कुछ ही घंटों में मिस्र की पूरी वायुसेना को जमीन पर ही मटियामेट कर दिया. महज 6 दिनों में इजरायल ने मिस्र से गाजा और सिनाई, जॉर्डन से वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलेम, और सीरिया से गोलान हाइट्स छीन लिए. इजरायल का आकार रातों-रात तीन गुना बढ़ गया. अरब जगत के लिए यह ‘जिल्लत’ की सबसे बड़ी तारीख बन गई.

1973 में इजरायल के पैर उखड़ गए

अपनी खोई हुई जमीन और इज्जत वापस पाने के लिए मिस्र और सीरिया ने यहूदियों के सबसे पवित्र त्योहार ‘योम किप्पुर’ के दिन अचानक हमला किया. शुरुआत में इजरायली सेना संभल नहीं पाई और उसे भारी नुकसान हुआ. अमेरिका की मदद से इजरायल ने पलटवार तो किया, लेकिन इस युद्ध ने इजरायल के ‘अजेय’ होने के भ्रम को तोड़ दिया. इसी के बाद 1979 में कैंप डेविड समझौता हुआ और मिस्र पहला अरब देश बना जिसने इजरायल को मान्यता दी और अपना सिनाई वापस लिया.

1982 और 2006 में खूनी रंजिश

साल 1982 में इजरायल ने लेबनान में सक्रिय फलस्तीनी लड़ाकों (PLO) को खत्म करने के लिए हमला किया. 2006 में इसी कड़ी में हिजबुल्लाह के साथ एक भीषण 34 दिनी युद्ध हुआ. इन युद्धों ने लेबनान को खंडहर बना दिया और इजरायल के सामने एक नया और खतरनाक दुश्मन ‘हिजबुल्लाह’ खड़ा हो गया, जिसे सीधे ईरान की सरपरस्ती हासिल थी.

2023 से 2026 तक ईरान की एंट्री

7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इजरायल की सुरक्षा दीवार को ढहाते हुए भीषण नरसंहार किया. इजरायल ने इसके जवाब में गाजा को श्मशान बना दिया. यह जंग अब गाजा से निकलकर लेबनान और सीधे ईरान तक पहुंच गई है. पहली बार ईरान ने अपनी सरजमीं से इजरायल पर सैकड़ों मिसाइलें दागीं. आज 2026 में यह लड़ाई अब केवल जमीन के टुकड़े की नहीं, बल्कि ‘वर्चस्व’ और ‘अस्तित्व’ की बन चुकी है.

कैसे बदल गया जंग का मरकज?

एक वक्त था जब पूरा अरब जगत (22 देश) इजरायल के खिलाफ एक लाइन में खड़ा था. लेकिन आज तस्वीर अलग है. ईरान के बढ़ते रसूख और उसके शिया हिलाल के डर ने सऊदी अरब, यूएई और जॉर्डन जैसे सुन्नी अरब मुल्कों को इजरायल के साथ एक अनकहे गठबंधन में ला खड़ा किया है. अब यह जंग ‘इजरायल बनाम अरब’ नहीं, बल्कि ‘इजरायल+उदारवादी अरब देश बनाम ईरान+उसके उग्रवादी गुट’ बन गई है. ईरान पर केंद्रित इस जंग ने फलस्तीन के मुद्दे को हाशिए पर धकेल दिया है.

इजरायल-अरब विवाद से ‘इजरायल-ईरान’ जंग तक

वक्त के साथ इस जंग का मिजाज बदल गया है. पहले यह ‘इजरायल बनाम अरब’ था, लेकिन आज यह ‘इजरायल बनाम ईरान’ केंद्रित हो गया है. दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान अरब जगत में बड़ी दरार आई. ‘अब्राहम अकॉर्ड’ जैसे समझौतों ने यूएई (UAE), बहरीन और मोरक्को जैसे देशों को इजरायल के करीब ला खड़ा किया. इन देशों ने समझ लिया कि ‘दुश्मनी से घर नहीं चलते’, इसलिए उन्होंने अपने आर्थिक हितों को तवज्जो दी. अब स्थिति यह है कि एक तरफ ईरान अपने ‘प्रॉक्सिस’ (हमास, हिजबुल्लाह, हूथी) के जरिए इजरायल को चुनौती दे रहा है, तो दूसरी तरफ कई बड़े अरब देश इस सीधे टकराव से कन्नी काट चुके हैं.

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खामोश है आसमां, धधक रही है जमीं

आज का मंजर देखकर लगता है कि ‘लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई’. 1948 की वह चिंगारी आज 2026 में एक ऐसा अलाव बन चुकी है जिसकी तपिश पूरी दुनिया महसूस कर रही है. जब तक बातचीत की मेज पर इंसाफ का तराजू बराबर नहीं होगा, तब तक यह कहना मुश्किल है कि यह ‘बारूद का खेल’ कब थमेगा. दुआ बस इतनी है कि सियासत की इस बिसात पर बेगुनाहों का खून बहना बंद हो.



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