Nepal Protest: नेपाल में एक बार फिर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गया है. लोगों ने काठमांडू की सड़कों पर उतरकर देश में राजशाही बहाल करने की मांग की. मार्च में होने वाले आम चुनाव से पहले यह रैली अंतरिम सरकार के लिए सिरदर्द बन गई है. लोगों का कहना है कि नेपाल में एक बार फिर राजशाही वापस लाने की जरूरत है. बिना राजा के नेपाल का विकास संभव नहीं है.
राजशाही के समर्थन में निकली यह रैली पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह की मूर्ति के पास इकट्ठा हुई और राजशाही वापस लाओ के नारे लगाए. नेपाल में पिछले साल सितंबर में हुए Gen-Z के हिंसक प्रदर्शन के बाद यह पहली बड़ी सभा थी.
बता दें कि, Gen-Z प्रदर्शन के बाद नेपाल में एक अंतरिम सरकार बनी थी, जिसके बाद मार्च में चुनाव कराने की घोषणा की गई.
साल था 1996, नेपाल में तब राजशाही थी. नेपाल की सत्ता पर राजा बीरेंद्र शाह का शासन था. उस समय नेपाल भयंकर बेरोजगारी, गरीबी और असमानता के दौर से गुजर रहा था. तभी एक बाहुन (जिसे भारत में ब्राह्मण कहा जाता है) अपने कुछ लोगों के साथ राजा के खिलाफ आंदोलन खड़ा कर देता है. वो बाहुन माओवादी विचारधारा से प्रेरित था. इसलिए इस विद्रोह को माओवादी आंदोलन कहा जाता है. इस आंदोलन को खड़ा करने वाला कोई और नहीं बल्कि नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहाल प्रचंड थे.
उन्होंने देश में घूम-घूमकर राजशाही के खिलाफ लोगों में गुस्सा भरा. देश के लोगों को बताया कि जनता जहां गरीबी, बेरोजगारी और असमानता से घिरी हुई है. तो वहीं देश का राजा उनका खून चूसकर अपने महल में शानो शौकत की जिंदगी जी रहा है. जनता को जहां दो वक्त की रोटी नहीं मिल पा रही, वहीं राजा अपने महल में हर दिन पकवान खा रहा है. अपने रौबदार आवाज और सम्मोहित कर देने वाले भाषणों से प्रचंड जनता को राजशाही के खिलाफ भड़का रहे थे. प्रचंड चाहते थे कि नेपाल में लोकतंत्र स्थापित हो और जनता का शासन आए. पुष्पकमल दहाल प्रचंड के इस काम में कई और लोग भी मदद कर रहे थे. जिसमें केपी ओली भी शामिल थे. खास बात ये है कि माओवादी आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अधिकतर लोग ब्राह्मण थे.
जनता में राजशाही के खिलाफ आक्रोश बढ़ता जा रहा था. तभी कुछ ऐसा होता है कि जनता आंदोलन के लिये मचल उठती है. दरअसल 2005 में राजा ज्ञानेंद्र ने तख्तापलट कर दिया और सारी सत्ता अपने हाथों में ले ली. बता दें कि, 1990 में नेपाल में हुए जनआंदोलन के बाद राजा ने नेपाल में बहुदलीय लोकतंत्र बहाल कर दी थी, लेकिन राजशाही फिर भी बरकरार थी.
ये भी पढ़ें- पीएम मोदी-मर्ज की मुलाकात का सार: डिफेंस, ग्रीन एनर्जी से UNSC तक..; जानें समझौते के मुद्दे
राजा के इस कदम पर जनता का गुस्सा फूट पड़ा. जनता सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने लगी. माओवादियों और राजनीतिक दलों के दबाव में आकर राजा ज्ञानेंद्र को आखिरकार झुकना पड़ा. 28 मई 2008 में नेपाल के संविधान सभा ने 540-4 के बहुमत से राजशाही को खत्म कर दिया. इसके बाद नेपाल को एक लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया गया. इस तरह से नेपाल में 240 साल पुरानी राजशाही का अंत हो गया. राजा ज्ञानेंद्र को अपने निवास स्थान नारायणहिटी पैलेस छोड़ना पड़ा और वो एक आम नागरिक बनकर रह गए. 1996 से लेकर 2006 तक चले इस गृहयुद्ध में नेपाल में 16 हजार से अधिक लोग मारे गए.
नेपाल के शाही परिवार को अभी भी एक बड़ा वर्ग समर्थन करता है. ग्रामीण इलाकों में उनकी जबरदस्त पकड़ है. जेन जी आंदोलन के बाद सुशीला कार्की को अंतरिम सरकार का नेतृत्व सौंपा गया. उनपर भ्रष्टाचार के मामलों में ढिलाई बरतने का लगातार आरोप लग रहा है. जिसके बाद नेपाल में एक बार फिर राजशाही वापसी की मांग की जा रही है.
-भारत एक्सप्रेस
UP Politics: बुंदेलखंड में स्वतंत्र देव सिंह के पानी अभियान का मुख्य फोकस घर-घर नल…
Amroha Dowry Case: अमरोहा में दहेज उत्पीड़न की शिकायत करने बहन की ससुराल पहुंचे मायके…
Pallavi Patel Social Justice Politics: पल्लवी पटेल की राजनीति उत्तर प्रदेश में पिछड़े वर्गों के…
UP Politics; लगातार 7 जीत, निर्दलीय से अपनी पार्टी का सफर और सीबीआई कोर्ट से…
उत्तर प्रदेश को 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की रणनीति में इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश, MSME,…
UP Budget 2026-27: उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक के स्वास्थ्य सुधारों का ध्यान अस्पतालों के निरीक्षण, बुनियादी…