विश्लेषण

BRICS के 20 साल: भारत की ‘ह्यूमैनिटी फर्स्ट’ थीम कैसे तय कर रही है अगले 20 वर्षों का रोडमैप?

ब्रिक्स (BRICS) अपने तीसरे दशक में ऐसे समय में कदम रख रहा है जब उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं केवल बड़ी हिस्सेदारी या प्रतिनिधित्व ही नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था में ठोस प्रभाव चाहती हैं. भारत में आयोजित नई दिल्ली शिखर सम्मेलन इस महत्वाकांक्षा को एक व्यावहारिक ढांचा प्रदान करता है: जनता को केंद्र में रखने वाला ‘ह्यूमैनिटी फर्स्ट’ (मानवता सर्वोपरि) दृष्टिकोण, जो लचीलेपन (Resilience), नवाचार (Innovation), सहयोग (Cooperation) और स्थिरता (Sustainability) के चार मजबूत स्तंभों पर टिका है.

जो पाठक ‘ब्रिक्स इंडिया समिट 2023’ को लेकर जानकारी खोज रहे हैं, उनके लिए समय-सीमा स्पष्ट करना जरूरी है: 2023 का ब्रिक्स शिखर सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में हुआ था, जबकि नई दिल्ली सितंबर 2026 में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रही है.

20 साल पूरे होने पर ब्रिक्स अब इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

20 साल पूरे होने पर ब्रिक्स का महत्व इसलिए बढ़ गया है क्योंकि यह समूह बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के एक छोटे से मंच से निकलकर पूरे ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) का एक व्यापक और मजबूत मंच बन चुका है. 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के विदेश मंत्रियों की बैठक के साथ ‘ब्रिक’ (BRIC) के रूप में जो शुरुआत हुई थी, वह आगे चलकर दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने से ‘ब्रिक्स’ (BRICS) बनी और नेताओं का पहला औपचारिक शिखर सम्मेलन 2009 में आयोजित हुआ.

यह इतिहास इसलिए मायने रखता है क्योंकि ब्रिक्स कभी भी केवल नामों के संक्षिप्त रूप (Acronym) या शिखर सम्मेलनों के फोटो-सेशन तक सीमित नहीं रहा. यह उन देशों के लिए एक राजनीतिक और आर्थिक समन्वय का मंच बनकर उभरा, जिनका मानना था कि मौजूदा वैश्विक शासन व्यवस्था उनकी आबादी के आकार, विकास की प्राथमिकताओं या उनकी आर्थिक क्षमता को सही रूप में जगह नहीं देती. नई दिल्ली शिखर सम्मेलन एक बड़े विस्तार के बाद आयोजित हो रहा है, जिसने इस समूह को और अधिक प्रभावशाली तो बनाया ही है, साथ ही पहले से कहीं अधिक पेचीदा भी कर दिया है.

भारत का ‘ह्यूमैनिटी फर्स्ट’ दृष्टिकोण इस जटिलता का उत्तर एक सीधे और स्पष्ट पैमाने के साथ देता है: क्या हमारा आपसी सहयोग लोगों के जीवन को बेहतर बना रहा है, सेवाओं तक पहुंच बढ़ा रहा है और विकासशील देशों के लिए वैश्विक प्रणालियों को अधिक निष्पक्ष बना रहा है? यदि ब्रिक्स इस कसौटी को केंद्र में रख पाता है, तो उसके अगले 20 साल केवल प्रतीकात्मक बयानों तक सीमित न रहकर वास्तविक समस्याओं के समाधान की ओर बढ़ सकते हैं.

आपसी समन्वय से लेकर विस्तार तक: ब्रिक्स का सफर

मूल ‘ब्रिक’ विचार को वास्तविक राजनीतिक रूप तब मिला जब 2006 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के इतर ब्राजील, रूस, भारत और चीन के विदेश मंत्री मिले. इसके बाद 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला ब्रिक शिखर सम्मेलन हुआ और दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने से यह ‘ब्रिक्स’ बन गया.

तब से इस मंच ने वार्षिक शिखर सम्मेलनों, मंत्रिस्तरीय बैठकों, कार्यसमूहों, आउटरीच वार्ताओं और संस्थागत पहलों का एक निरंतर सिलसिला तैयार किया है. इसका एजेंडा भी केवल वित्तीय सुधारों और विकास सहयोग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्वास्थ्य, प्रौद्योगिकी, जलवायु, व्यापार, ऊर्जा, संस्कृति और जन-जन के संपर्क तक फैल चुका है.

सदस्यता विस्तार के चरण ने चर्चा के पैमाने को पूरी तरह बदल दिया. मौजूदा आधिकारिक जानकारी के अनुसार ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) इसके सदस्य देशों में शामिल हैं, जो इस समूह के व्यापक भौगोलिक और रणनीतिक प्रभाव को दर्शाते हैं.

सदस्यों की यह बड़ी संख्या अवसर और चुनौतियां दोनों एक साथ लेकर आती है. अधिक देशों का मतलब है एशिया, अफ्रीका, पश्चिम एशिया और लैटिन अमेरिका से अधिक आवाजें. हालांकि, इस विविधता का अर्थ यह भी है कि आम सहमति बनाना अब पहले से कहीं अधिक कठिन होगा, क्योंकि सभी देशों की क्षेत्रीय प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं.

‘ह्यूमैनिटी फर्स्ट’ थीम: रोडमैप को मिला नैतिक आधार

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता की मुख्य थीम ‘बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी’ (लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता का निर्माण) है. आधिकारिक बयानों के अनुसार, यह ‘ह्यूमैनिटी फर्स्ट’ की भावना से प्रेरित और जनता को केंद्र में रखने वाले दृष्टिकोण को दर्शाती है.

यह विचार बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ध्यान को गुटबाजी की राजनीति से हटाकर इंसानी नतीजों पर केंद्रित करता है. व्यावहारिक तौर पर यह ब्रिक्स सदस्यों से आग्रह करता है कि वे खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य प्रणालियों, डिजिटल पहुंच, जलवायु अनुकूलन और विकास वित्तपोषण को केवल औपचारिक बातचीत न मानकर मुख्य रणनीतिक मुद्दों के रूप में देखें.

यह थीम हाल के वर्षों में भारत की कूटनीतिक शैली से भी मेल खाती है: ग्लोबल साउथ को एक ऐसी आवाज के रूप में स्थापित करना जो नियम केवल मानने तक सीमित न रहे, बल्कि नियम तय करने में भी मदद करे. ब्रिक्स के लिए यह काम के आधार पर अगले चरण का रोडमैप तैयार करता है. अगले 20 वर्षों का आकलन केवल साझा घोषणापत्रों से नहीं, बल्कि इस बात से किया जाएगा कि क्या यह सहयोग आम नागरिकों, कारोबारियों, श्रमिकों, छात्रों और कमजोर तबकों के लिए उपयोगी साबित हो पा रहा है या नहीं.

अगले 20 वर्षों को दिशा देने वाले चार प्रमुख स्तंभ

भारत की इस थीम को चार आपस में जुड़े स्तंभों के जरिए समझा जा सकता है. प्रत्येक स्तंभ विकासशील देशों के सामने मौजूद वास्तविक चुनौतियों का समाधान पेश करता है:

1. लचीलापन (Resilience): संकट आने से पहले समाज को मजबूत बनाना

लचीलेपन का सीधा अर्थ है संकट के गंभीर आपदा बनने से पहले से तैयारी रखना. ब्रिक्स सदस्य देशों के लिए इसमें मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियां, सुरक्षित सप्लाई चेन, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, आपदा प्रबंधन की तैयारी और वित्तीय सुरक्षा चक्र शामिल हैं.

हालिया वैश्विक उथल-पुथल से मिला सबक बिल्कुल साफ है: देश केवल दूरस्थ आपूर्ति नेटवर्क या धीमी अंतरराष्ट्रीय प्रणालियों पर निर्भर नहीं रह सकते. लचीलेपन का एजेंडा ब्रिक्स को टीकों, दवाओं, पूर्व-चेतावनी प्रणालियों, कृषि, लॉजिस्टिक्स और स्थानीय विनिर्माण क्षमता पर सहयोग करने का अवसर देता है.

व्यावहारिक प्राथमिकताओं में शामिल हो सकते हैं:

जरूरी सामानों—खासकर दवाओं, खाद्य सामग्री और स्वच्छ ऊर्जा उपकरणों—के लिए भरोसेमंद सप्लाई चेन बनाना.

सार्वजनिक स्वास्थ्य के अनुभवों को साझा करना ताकि बीमारियों के प्रकोप पर तेजी से प्रतिक्रिया दी जा सके.

बाढ़, लू, सूखे और तूफानों से निपटने के लिए आपदा तैयारियों को मजबूत करना.

छोटे व्यवसायों (MSMEs) को सहारा देना, जो व्यापार, कर्ज या ऊर्जा संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं.

2. नवाचार (Innovation): तकनीक को जनहित में बदलना

नवाचार केवल उच्च स्तरीय शोध या निजी क्षेत्र के मुनाफे तक सीमित नहीं है. भारत के नजरिए में इसका अर्थ तकनीक का उपयोग करके सेवाओं तक पहुंच बढ़ाना और विकास की खाई को पाटना भी है. डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI), फिनटेक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), टेलीमेडिसिन और डिजिटल शिक्षा के जरिए देश अपनी बड़ी आबादी तक सेवाएं अधिक कुशलता से पहुंचा सकते हैं.

ब्रिक्स के लिए सबसे बड़ा अवसर नवाचार को समावेशी बनाना है. यदि डिजिटल प्रणालियां सुरक्षित, सस्ती, भरोसेमंद और आपस में जुड़ने योग्य हों, तो वे भुगतान, पहचान सेवाओं, कल्याणकारी योजनाओं के वितरण, स्वास्थ्य रिकॉर्ड, शिक्षण मंचों और सीमा-पार व्यापार को सुगम बना सकती हैं.

सबसे बड़ी चुनौती इसके नियमन (Governance) की है. तकनीकी सहयोग ऐसा होना चाहिए जो निगरानी के खतरों, असमानता या कुछ बड़ी कंपनियों पर निर्भरता को बढ़ावा न दे. जनता को प्राथमिकता देने वाला तकनीकी एजेंडा गोपनीयता की रक्षा करे और खुली प्रणालियों (Open Standards) को बढ़ावा दे.

3. सहयोग (Cooperation): विविधता को उपयोगी बनाना

एक विस्तारित ब्रिक्स तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक सहयोग का मतलब केवल ‘एकरूपता’ न समझा जाए. सभी सदस्यों की राजनीतिक व्यवस्थाएं, सुरक्षा हित, व्यापारिक संबंध और क्षेत्रीय प्राथमिकताएं अलग हैं. इसलिए सहयोग उन क्षेत्रों के इर्द-गिर्द होना चाहिए जहां साझे हित हों, भले ही अन्य मुद्दों पर मतभेद बने रहें.

यहीं पर भारत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है. नई दिल्ली अक्सर खुद को स्थापित शक्तियों और विकासशील देशों के बीच, तकनीकी महत्वाकांक्षा और सामाजिक समावेश के बीच, तथा रणनीतिक स्वायत्तता और बहुपक्षीय जुड़ाव के बीच एक सेतु (पुल) के रूप में प्रस्तुत करती है. यह संतुलनकारी सोच ब्रिक्स को वैचारिक टकराव से बचाकर व्यावहारिक सहयोग पर केंद्रित रखने में मदद कर सकती है.

उपयोगी सहयोग इन माध्यमों से हो सकता है:

वैश्विक शासन सुधारों पर साझा रुख, जहां सभी सदस्यों में सहमति हो.

कर्ज संकट और बुनियादी ढांचे की जरूरतों को पूरा करने वाला विकास वित्तपोषण.

शिक्षा, युवा, व्यापार और नागरिक समाज के बीच आदान-प्रदान, जिससे ब्रिक्स केवल नेताओं की बैठकों तक सीमित न रहे.

क्षेत्र-विशिष्ट कार्यसमूह जो व्यावहारिक मानक, गाइडलाइंस या पायलट प्रोजेक्ट तैयार करें.

4. स्थिरता (Sustainability): आर्थिक विकास को दीर्घकालिक सुरक्षा से जोड़ना

स्थिरता इसलिए केंद्रीय विषय है क्योंकि विकासशील देशों को जलवायु संकट का सामना करते हुए भी विकास, रोजगार, बुनियादी ढांचे और ऊर्जा की उपलब्धता की सख्त जरूरत है. ब्रिक्स देशों की ऊर्जा जरूरतें और विकास के स्तर अलग-अलग हैं, इसलिए एक ही जलवायु एजेंडा सब पर लागू नहीं किया जा सकता.

ब्रिक्स का व्यावहारिक स्थिरता रोडमैप निष्पक्षता और बदलाव की क्षमता पर केंद्रित होना चाहिए. इसका मतलब है जलवायु वित्त, सस्ती स्वच्छ तकनीक, लचीली खेती, शहरी अनुकूलन, हरित कौशल (Green Skills) और ऐसी ऊर्जा प्रणालियां जो गरीब समुदायों को पीछे न छोड़ें.

भारत का ‘ह्यूमैनिटी फर्स्ट’ दृष्टिकोण यहां सबसे ज्यादा मायने रखता है, क्योंकि स्थिरता को केवल कागजी लक्ष्यों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए. असली मानवीय सवाल यह है कि क्या जलवायु से जुड़े कदम लोगों की आजीविका की रक्षा कर रहे हैं और उनके लिए नए अवसर पैदा कर रहे हैं या नहीं.

‘ब्रिक्स इंडिया समिट 2023’ को लेकर भ्रम क्यों?

कई लोग भारत की हालिया शिखर कूटनीति को खोजते समय ‘ब्रिक्स इंडिया समिट 2023’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन सही अंतर समझना जरूरी है. 2023 में भारत ने नई दिल्ली में जी-20 (G20) शिखर सम्मेलन की ऐतिहासिक मेजबानी की थी, जबकि 15वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में हुआ था.

यह भ्रम इसलिए भी स्वाभाविक है क्योंकि 2023 भारत की वैश्विक भूमिका के लिए एक अत्यंत सक्रिय वर्ष था. भारत की जी-20 अध्यक्षता ने मानव-केंद्रित विकास और ग्लोबल साउथ की चिंताओं को प्रमुखता से उठाया था—यही विचार आज ब्रिक्स के ‘ह्यूमैनिटी फर्स्ट’ दृष्टिकोण में भी गूंज रहे हैं. नई दिल्ली में आयोजित हो रहा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 के अध्यक्षता चक्र का हिस्सा है, 2023 का नहीं.

यह स्पष्टीकरण नीतिगत तारतम्य को सही ढंग से समझने में मदद करता है. यह कोई एक अकेली घटना नहीं है, बल्कि एक पूरी श्रृंखला है: भारत द्वारा ग्लोबल साउथ की आवाज उठाना, जोहान्सबर्ग के बाद ब्रिक्स का विस्तार, 2025 में रियो डी जेनेरो (ब्राजील) का शिखर सम्मेलन, और अब भारत का 2026 नई दिल्ली शिखर सम्मेलन, जो इस एजेंडे को अगले चरण में ले जा रहा है.

नई दिल्ली शिखर सम्मेलन: विस्तारित ब्रिक्स की वास्तविक परीक्षा

नई दिल्ली शिखर सम्मेलन केवल 20 साल पूरे होने का उत्सव नहीं है. यह इस बात की कठिन परीक्षा है कि क्या एक बड़ा ब्रिक्स एकजुट होकर ठोस परिणाम दे सकता है. विस्तार ने समूह को अधिक जनसांख्यिकीय ताकत, ऊर्जा क्षेत्र में बड़ा प्रभाव, व्यापक क्षेत्रीय पहुंच और कूटनीतिक दृश्यता दी है. लेकिन इसके साथ ही मतभेदों की संख्या भी बढ़ गई है जिन्हें संभालना होगा.

इसीलिए भारत की थीम रणनीतिक रूप से बहुत उपयोगी है. ‘ह्यूमैनिटी फर्स्ट’ के लिए यह जरूरी नहीं है कि हर सदस्य का विश्व दृष्टिकोण एक जैसा हो. यह विकास की जरूरतों—स्वास्थ्य, लचीलापन, कनेक्टिविटी, जलवायु, वित्त और तकनीक तक पहुंच—के इर्द-गिर्द एक साझा कामकाजी भाषा देता है.

अगले 20 साल के रोडमैप को आकार देने के लिए तीन बातें अहम होंगी:

प्राथमिकताओं का स्पष्ट क्रम: ब्रिक्स को हर चीज एक साथ करने की कोशिश से बचना चाहिए. लचीलेपन, डिजिटल समावेशन, सतत विकास और शासन सुधार पर केंद्रित एजेंडे को लागू करना आसान होगा.

घोषणापत्र के बाद व्यावहारिक तंत्र: शिखर सम्मेलन दिशा तय करते हैं, लेकिन कार्यसमूह, फंडिंग चैनल, शोध नेटवर्क और पायलट प्रोजेक्ट ही शब्दों को परिणामों में बदलते हैं.

गुट के भीतर विविधता का सम्मान: विस्तारित समूह तभी काम करेगा जब सदस्य यह स्वीकार करेंगे कि सहयोग मुद्दों पर आधारित हो सकता है. स्वास्थ्य या जलवायु वित्त पर सहमति के लिए हर भू-राजनीतिक विवाद पर एकमत होना जरूरी नहीं है.

जनता को केंद्र में रखने वाला ब्रिक्स विकास सहयोग को बदल सकता है

एक जन-केंद्रित ब्रिक्स रोडमैप विकास सहयोग को रोजमर्रा की जरूरतों के प्रति अधिक उत्तरदायी बना सकता है. विकास को एक अमूर्त कूटनीतिक विषय मानने के बजाय समूह उन प्रणालियों पर ध्यान केंद्रित कर सकता है जिनका नागरिक सीधे अनुभव करते हैं.

डिजिटल पहुंच को ही लें — यदि ब्रिक्स देश सुरक्षित भुगतान प्रणालियों, डिजिटल पहचान और कम लागत वाले सार्वजनिक मंचों पर सहयोग करते हैं, तो छोटे व्यवसाय आसानी से व्यापार कर सकते हैं और नागरिकों को सेवाएं तेजी से मिल सकती हैं. हालांकि, यदि ये प्रणालियां समावेशी नहीं होंगी, तो वे बिना कनेक्टिविटी या डिजिटल साक्षरता वाले लोगों को पीछे छोड़ सकती हैं.

यही बात स्वास्थ्य पर भी लागू होती है. टीकों, जांच किटों और स्थानीय विनिर्माण पर सहयोग आपात स्थितियों में बाहरी निर्भरता को कम कर सकता है. जलवायु और स्थिरता के मामले में भी, ब्रिक्स यह पक्ष रख सकता है कि विकासशील देशों को गरीबी हटाए बिना स्वच्छ विकास की दिशा में बढ़ने के लिए वित्तीय और तकनीकी मदद की जरूरत है.

बंटी हुई दुनिया में एक सेतु के रूप में भारत की भूमिका

ब्रिक्स में भारत की स्थिति बेहद विशिष्ट है. वह एक संस्थापक सदस्य, एक प्रमुख विकासशील अर्थव्यवस्था, एक जीवंत लोकतंत्र, एक विशाल तकनीकी बाजार और ऐसा देश है जो प्रतिस्पर्धी वैश्विक खेमों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखता है. यह स्थिति उसकी अध्यक्षता को आशाजनक भी बनाती है और चुनौतीपूर्ण भी.

उम्मीद इस बात में है कि भारत ब्रिक्स को टकराव के बजाय सुधारों के मंच के रूप में प्रस्तुत करने की क्षमता रखता है. एक सकारात्मक रोडमैप हर मुद्दे को खेमेबाजी में बदले बिना अधिक निष्पक्ष संस्थाओं, ग्लोबल साउथ के मजबूत प्रतिनिधित्व और अधिक विकास वित्तपोषण की मांग को आगे बढ़ा सकता है. चुनौती यह है कि समूह के भीतर कई सदस्यों के रणनीतिक हित आपस में टकराते हैं. ऐसे में भारत को एजेंडे को विश्वसनीय, संतुलित और उपयोगी बनाए रखने में मदद करनी होगी.

20 वर्षों का रोडमैप: घोषणाओं से ज्यादा अमल की दरकार

ब्रिक्स के अगले चरण का आकलन काम के आधार पर होगा. घोषणापत्रों का अपना महत्व रहेगा, लेकिन उन पर कितना अमल हुआ, यह सबसे ज्यादा मायने रखेगा. नागरिक सफलता को सम्मेलनों की संख्या से नहीं, बल्कि इससे मापेंगे कि क्या इस सहयोग से स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बेहतर हुई, रोजगार के अवसर बने, नवाचार को समर्थन मिला और विकासशील देशों को वैश्विक स्तर पर मजबूत आवाज मिली.

एक व्यावहारिक रोडमैप में ये बिंदु शामिल होने चाहिए:

  • स्वास्थ्य सुरक्षा: दवाओं, टीकों और सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं पर मजबूत तालमेल.
  • डिजिटल समावेशन: डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, साइबर सुरक्षा, फिनटेक और जिम्मेदार AI पर साझा कार्य.
  • टिकाऊ विकास: जलवायु वित्त, ऊर्जा बदलाव, हरित कौशल और मजबूत बुनियादी ढांचे पर सहयोग.
  • व्यापार और निवेश सुगमता: ऐसी सरल प्रक्रियाएं जो छोटे व्यवसायों को नए बाजारों तक पहुंचने में मदद करें.
  • युवा और ज्ञान विनिमय: स्कॉलरशिप, रिसर्च पार्टनरशिप, स्टार्टअप नेटवर्क और सांस्कृतिक आदान-प्रदान.
  • वैश्विक सुधार: ऐसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के लिए एकजुट प्रयास जो विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को सही रूप में दर्शाएं.

यह रोडमैप महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन पूरी तरह व्यावहारिक है. यह इसलिए काम कर सकता है क्योंकि यह पूर्ण राजनीतिक सहमति पर निर्भर नहीं है; यह उन साझे हितों पर निर्भर है जहां सभी का भला जुड़ा है.

‘ह्यूमैनिटी फर्स्ट’ केवल एक नारा नहीं, एक कसौटी है

भारत की ‘ह्यूमैनिटी फर्स्ट’ थीम ब्रिक्स को अपने तीसरे दशक में प्रवेश करने के लिए एक बेहद सार्थक और व्यावहारिक दिशा देती है. यह समूह से आग्रह करती है कि वह अपनी शक्ति को सेवा से, अपने सहयोग को ठोस नतीजों से और सुधारों को इस बात से आंके कि क्या वे उन लोगों और देशों की स्थिति में सुधार ला रहे हैं जिन्हें वैश्विक निर्णयों में लंबे समय से हाशिए पर रखा गया है.

नई दिल्ली शिखर सम्मेलन एक जटिल दौर में आयोजित हो रहा है, जहां सदस्यों की संख्या बड़ी है और वैश्विक चुनौतियां कहीं अधिक गंभीर हैं. यदि ब्रिक्स लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता को जमीन पर उतारने में सफल रहता है, तो उसका यह अगला 20 साल का रोडमैप केवल एक कूटनीतिक दस्तावेज नहीं रहेगा—यह ग्लोबल साउथ के समावेशी विकास का एक व्यावहारिक मॉडल बन सकता है.

Prashant Kumar

CEO – Bharat Express Digital Chief Advisor to the Chairman & Managing Director and Editor-in-Chief Mr. Prashant Kumar is a digital, media and growth transformation leader with 18+ years of experience across strategy, technology, AI, marketing and business transformation, having worked with leading organisations including Amazon, IBM, Adidas and Tata Consumer Products. At Bharat Express, he leads digital transformation, audience growth, technology, partnerships, monetisation and new business initiatives to build a scalable, future-ready media ecosystem.

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