बिहार के बांकीपुर और मध्य प्रदेश के दतिया उपचुनावों ने राजनीतिक दलों, खासकर भाजपा, के सामने कई अहम सवाल खड़ा कर दिया हैं. इन दोनों सीटों पर पार्टी ने जातीय संतुलन बनाए रखने की पूरी कोशिश की. बांकीपुर में कायस्थ और दतिया में ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे गए, लेकिन इसके बावजूद जीत हाथ नहीं लगी. इन नतीजों ने साफ संकेत दिया कि आज के मतदाता केवल जातीय पहचान के आधार पर फैसला नहीं करते, बल्कि उम्मीदवार की पहचान, उसकी स्वीकार्यता और संगठन की एकजुटता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है.
बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है. पार्टी ने यहां युवा नेता नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया. वे संगठन से जुड़े रहे और मंडल अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभा चुके थे, लेकिन आम मतदाताओं के बीच उनकी पहचान सीमित रही.
दूसरी तरफ जन सुराज के प्रशांत किशोर मैदान में थे. चुनावी रणनीतिकार के रूप में पहले से चर्चित किशोर ने इस बार सीधे जनता के बीच जाकर विकास, रोजगार और स्थानीय समस्याओं को अपने अभियान का केंद्र बनाया. इसका असर मतदान में साफ दिखाई दिया और उन्होंने लगभग 19 हजार वोटों के अंतर से जीत दर्ज कर ली.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा के सामने इस बार चुनौती सिर्फ किसी पारंपरिक विपक्षी दल की नहीं थी, बल्कि ऐसे उम्मीदवार की थी जिसकी व्यक्तिगत पहचान और सार्वजनिक छवि पहले से मजबूत थी. ऐसे मुकाबले में केवल जातीय समीकरण पार्टी के लिए पर्याप्त साबित नहीं हुए.
इसके अलावा, यह चर्चा भी रही कि कायस्थ समाज में कई ऐसे चेहरे मौजूद थे जिनकी राजनीतिक पकड़ और जनस्वीकार्यता ज्यादा मजबूत मानी जाती थी. ऐसे में कम चर्चित उम्मीदवार के चयन ने समाज के एक वर्ग में असंतोष पैदा किया. कम मतदान प्रतिशत को भी संगठन की अपेक्षित सक्रियता में कमी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है.
मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर भी भाजपा को अलग तरह की चुनौती का सामना करना पड़ा. पार्टी ने पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर उनकी जगह आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया. दोनों ही ब्राह्मण समुदाय से आते थे, इसलिए जातीय संतुलन तो बना रहा, लेकिन नेतृत्व परिवर्तन ने संगठन के भीतर असहमति को खुलकर सामने ला दिया.
टिकट बदलने के बाद मिश्रा समर्थकों ने खुलकर विरोध किया. राष्ट्रीय राजमार्ग-44 पर प्रदर्शन हुए, कई स्थानीय पदाधिकारियों और पार्षदों ने इस्तीफे दिए और पार्टी के भीतर नाराजगी की खबरें लगातार सामने आती रहीं.
इस राजनीतिक माहौल का फायदा कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह को मिला, जिन्होंने करीब छह हजार वोटों के अंतर से जीत हासिल कर ली.
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा रही कि टिकट बदलने के पीछे पार्टी के अंदरूनी शक्ति संतुलन की राजनीति एक अहम वजह हो सकती है. कई रिपोर्टों और कार्यकर्ताओं के बयानों में यह दावा किया गया कि यदि नरोत्तम मिश्रा चुनाव जीतते, तो वे दोबारा एक मजबूत राजनीतिक केंद्र के रूप में उभर सकते थे. हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन चुनाव परिणाम ने यह जरूर दिखाया कि संगठन के भीतर की नाराजगी चुनावी प्रदर्शन पर असर डाल सकती है.
इन दोनों उपचुनावों ने एक बात स्पष्ट कर दी है कि अब मतदाता केवल उम्मीदवार का उपनाम या जातीय पहचान देखकर वोट नहीं देता. लोगों की नजर इस बात पर भी रहती है कि उम्मीदवार कितना सक्रिय है, जनता के बीच उसकी पहुंच कैसी है और वह स्थानीय मुद्दों को कितनी मजबूती से उठा सकता है.
अगर किसी समुदाय को केवल प्रतिनिधित्व मिले, लेकिन ऐसा चेहरा न मिले जिस पर व्यापक भरोसा हो, तो उसी वर्ग के भीतर असंतोष पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है. कई बार मजबूत और लोकप्रिय उम्मीदवार जातीय समीकरणों से भी अधिक प्रभावी साबित हो सकता है.
दतिया का चुनाव इस बात का उदाहरण माना जा रहा है कि टिकट वितरण के दौरान यदि गुटबाजी या आंतरिक मतभेद हावी हो जाएं, तो उसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है. उपचुनाव वैसे भी स्थानीय परिस्थितियों, उम्मीदवार की छवि और जनता के मूड से अधिक प्रभावित होते हैं. ऐसे चुनावों में केवल सत्ता या संगठन की ताकत जीत की गारंटी नहीं बनती.
वहीं बांकीपुर में प्रशांत किशोर ने अपनी व्यक्तिगत पहचान और मुद्दा-आधारित प्रचार के जरिए यह दिखाया कि मजबूत व्यक्तिगत ब्रांड पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को चुनौती दे सकता है. दूसरी ओर दतिया में कांग्रेस ने स्थानीय नाराजगी और भाजपा के अंदरूनी असंतोष का लाभ उठाने में सफलता हासिल की.
बांकीपुर और दतिया, दोनों उपचुनावों के नतीजे भाजपा के लिए एक अहम राजनीतिक संदेश लेकर आए हैं. केवल जातीय संतुलन साध लेना अब पर्याप्त नहीं माना जा सकता. उम्मीदवार ऐसा होना चाहिए जो जनता के बीच भरोसेमंद, प्रभावशाली और स्वीकार्य हो. साथ ही, संगठन के भीतर एकजुटता बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है.
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-भारत एक्सप्रेस
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