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Manipur BJP Internal Conflict: बीजेपी के लिए सबसे बड़ा खतरा अक्सर विपक्ष से नहीं, बल्कि अपने ही घर की अंदरूनी टकराव से आता है. मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के हालिया आरोपों ने इसी असहज सच्चाई को फिर उजागर कर दिया है कि, पार्टी के भीतर नेताओं की प्रतिष्ठा, पद और पहुंच को लेकर जो संघर्ष चलता है, वह कभी-कभी चुनावी मैदान में विपक्ष से ज्यादा नुकसानदेह साबित होता है. बीरेन सिंह ने आरोप लगाया है कि राज्य के कुछ बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस के साथ मिलकर उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने की साजिश रची; उन्होंने साफ कहा कि वे दिल्ली नेतृत्व पर नहीं, बल्कि स्थानीय नेताओं पर आरोप लगा रहे हैं.
यह मामला केवल मणिपुर तक सीमित नहीं है. यह उस बड़े सवाल का हिस्सा है जो भाजपा के संगठन, उसकी संस्कृति और उसके राजनीतिक भविष्य से जुड़ा है: क्या पार्टी अपने ही कार्यकर्ताओं को राजनीतिक रूप से कमजोर करके बाहर से आए नेताओं को आगे बढ़ा रही है? क्या ‘नई भाजपा’ ने पुरानी भाजपा के अनुशासन और विचार को तो अपनाया, लेकिन उसकी सबसे बड़ी ताकत मेहनती कार्यकर्ता को पीछे धकेल दिया है?
पुरानी भाजपा की पहचान संगठन, अनुशासन और विचार से बनी थी. उसका नेतृत्व अक्सर नीचे से ऊपर आता था: मंडल, जिला, प्रदेश, राष्ट्रीय स्तर-इस लंबी यात्रा में कार्यकर्ता संगठन की भाषा, त्याग की परंपरा और पार्टी की राजनीतिक समझ सीखता था. आरएसएस के आनुषंगिक संगठनों से जुड़ा कार्यकर्ता तंत्र भाजपा को केवल एक चुनावी मशीन नहीं, बल्कि एक विचारधारात्मक और सामाजिक आंदोलन जैसा ढांचा देता था.
नई भाजपा निश्चित रूप से अधिक चुनावी रूप से सफल, मीडिया-केंद्रित और केंद्रीकृत है. उसने जीत की भाषा, तकनीक, सोशल मीडिया और त्वरित निर्णय की क्षमता हासिल की है. लेकिन इसी सफलता की कीमत यह दिखती है कि पार्टी में ‘नेता’ और ‘कार्यकर्ता’ के बीच की दूरी बढ़ गई है. नेतृत्व अब अक्सर उनके हाथ में है जो चुनावी गणित, सरकारी अनुभव या दूसरी पार्टियों से लाई गई जनाधार वाली पूंजी लेकर आए हैं न कि उनके हाथ में, जिन्होंने बूथ स्तर तक पार्टी खड़ी की है.
भाजपा ने विस्तार के लिए दूसरी पार्टियों से नेताओं को लेना एक रणनीतिक निर्णय के रूप में अपनाया. इसका तर्क समझा जा सकता है: जहां पार्टी का संगठन कमजोर है, वहां किसी स्थानीय नेता का आना जल्दी पैठ बना सकता है. लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब यही ‘आयातित’ नेता पार्टी के प्रमुख पदों, मंत्रालयों, संसदीय टिकटों और संगठनात्मक अधिकारों पर हावी हो जाते हैं.
बीरेन सिंह के बयान में इसी तनाव की झलक है. उन्होंने कहा कि कुछ विधायक यह स्वीकार नहीं कर पाए कि कांग्रेस से आने के बाद भी वे दो बार मुख्यमंत्री बने, और उन पर आरोप लगाया कि वे भाजपा को अपनी ‘प्रॉपर्टी’ समझते हैं. चाहे ये आरोप किसी न्यायिक या संगठनात्मक जांच से साबित हों या नहीं, यह बयान उस मनोवैज्ञानिक असंतोष को व्यक्त करता है जो कई पार्टी कार्यकर्ताओं में महसूस होता है: पार्टी में घर का कार्यकर्ता दरवाजे पर खड़ा रहता है, जबकि बाहर से आया नेता सीधे कमरे के अंदर बैठ जाता है.
यह असंतोष केवल व्यक्तिगत ईर्ष्या नहीं है. यह एक संगठनात्मक नैतिकता का सवाल है. जब एक कार्यकर्ता दशकों तक बूथ समिति चलाता है, चुनाव में रात-दिन मेहनत करता है, और फिर भी टिकट, पद या मान्यता के लिए उसे बाहरी नेता के सामने पीछे हटना पड़ता है, तो उसका भरोसा टूटता है. और जब भरोसा टूटता है, तो संगठन केवल आदेशों पर चलने वाली मशीन बन जाता है , स्वतःस्फूर्त जनशक्ति नहीं रहती.
मणिपुर की स्थिति इस आलोचना के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. बीरेन सिंह फरवरी 2025 में मुख्यमंत्री पद से हटे थे और उनके इस्तीफे के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा था. बाद में फरवरी 2026 में वाई. खेमचंद सिंह के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बनी. रिपोर्ट्स के अनुसार खेमचंद उन वरिष्ठ नेताओं में थे, जिन्होंने बीरेन सिंह को हटाने की मांग की थी.
बीरेन सिंह का सवाल और भी कटु है: अगर उनकी विदाई के बाद भी हिंसा नहीं रुकी, तो उन्हें हटाने का राजनीतिक तर्क क्या था? यह सवाल चाहे राजनीतिक रक्षा की भाषा में कहा गया हो, इसका सार यह है कि पार्टी के भीतर के गुट अपनी सत्ता की रक्षा के लिए नीति, प्रशासन और जनता के सवालों से ऊपर उठ जाते हैं. जब नेता आपस में लड़ते हैं, तो कार्यकर्ता दो धड़ों में बंट जाता है. जब कार्यकर्ता बंटता है, तो बूथ कमजोर होता है. और जब बूथ कमजोर होता है, तो चुनाव जीतना मुश्किल हो जाता है.
मणिपुर में दो उपमुख्यमंत्रियों के बीच सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप की खबरें भी इसी संकट को दर्शाती हैं. एक उपमुख्यमंत्री ने दूसरे के पति पर गंभीर आरोप लगाकर इस्तीफे की मांग की. ऐसे माहौल में सरकार की छवि केवल कमजोर नहीं होती; पार्टी कार्यकर्ता के लिए भी यह बताना कठिन हो जाता है कि वह किस नेता का समर्थन करे और किसके खिलाफ बोले.
फिर भी, एक आलोचनात्मक प्रश्न जरूरी है: क्या पार्टी नेतृत्व इसे ‘नियंत्रण’ समझता है? कई बार एक मजबूत स्थानीय नेता को कमजोर करना केंद्र के लिए सुविधाजनक होता है, क्योंकि वह अपने क्षेत्र में स्वतंत्र आधार बना लेता है. लेकिन इस नियंत्रण की कीमत यह होती है कि पार्टी में नेतृत्व निर्माण की प्रक्रिया रुक जाती है. जो कार्यकर्ता आगे बढ़ने की उम्मीद रखता है, वह यह सीख जाता है कि वफादारी का मतलब चुप रहना है, काम करना नहीं. जो नेता लोकप्रिय हो जाता है, उसे ‘संगठन के हित में’ पीछे धकेल दिया जाता है. इससे पार्टी में डर की राजनीति पनपती है, न कि विचार की राजनीति.
भाजपा की सबसे बड़ी ताकत कभी उसके बड़े चेहरे नहीं रहे; उसकी ताकत बूथ स्तर के कार्यकर्ता रहे हैं. वही व्यक्ति जो गांव में बैठक करता है, चुनाव के दिन वोटरों तक पहुंचता है, सरकारी योजनाओं की जानकारी देता है और पार्टी के प्रति लोगों का भरोसा बनाता है. लेकिन आज कई कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि उन्हें चुनाव के समय याद किया जाता है और बाकी समय भुला दिया जाता है.
टिकट वितरण में अक्सर ‘जीतने योग्य चेहरे’ की बात कही जाती है, लेकिन इसका मतलब अक्सर यह निकलता है कि जिसके पास धन, पद, प्रभाव या दूसरी पार्टी से आने का इतिहास है, उसे वरीयता मिलती है. जो कार्यकर्ता वर्षों से पार्टी के लिए काम कर रहा है, उसे यह कहकर टाल दिया जाता है कि ‘संगठन में रहो, तुम्हारा समय आएगा.’ लेकिन वह समय अक्सर नहीं आता. यही उपेक्षा धीरे-धीरे कार्यकर्ता को निराश करती है.
एक स्वस्थ पार्टी में बाहर से आए नेता को स्थान मिल सकता है, लेकिन उसे पार्टी की संस्कृति सीखनी होती है. उसे यह सिद्ध करना होता है कि वह केवल अपनी व्यक्तिगत राजनीति नहीं, पार्टी के विचार और कार्यकर्ताओं के हित के लिए काम करेगा. जब यह प्रक्रिया उलट जाती है, बाहरी नेता को तुरंत शीर्ष पद और कार्यकर्ता को लंबी प्रतीक्षा के बाद केवल बौद्धिक, तो पार्टी का नैतिक संतुलन बिगड़ जाता है.
भाजपा का संगठन अकेला नहीं चलता; उसके पीछे आरएसएस और अनेक आनुषंगिक संगठनों का जनाधार होता है. छात्र संगठन, मजदूर संगठन, किसान संगठन और सामाजिक संगठन कार्यकर्ता तैयार करते हैं. लेकिन जब सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ता है, तो इन संगठनों की भूमिका भी सिमट सकती है. फिर वे केवल चुनाव के समय जनसंख्या जुटाने वाले सहयोगी बनकर रह जाते हैं, नीति-निर्माण और नेतृत्व निर्माण में भागीदार नहीं रहते.
यह भाजपा के लिए खतरनाक है, क्योंकि इससे पार्टी का विचारधारात्मक आधार कमजोर होता है. जब नेतृत्व केवल चुनावी जीत और सरकारी संकट प्रबंधन तक सीमित हो जाता है, तो पार्टी के भीतर विचार की बहस खत्म हो जाती है. और जब विचार की बहस खत्म होती है, तो बचती है केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा . यह आगे गुटबाजी को जन्म देती है.
भाजपा को यह समझना होगा कि बाहरी नेताओं को लाना गलत नहीं है, लेकिन उन्हें मूल कार्यकर्ता के ऊपर रखना घातक है. पार्टी को तीन बातें करनी होंगी: पहला, टिकट और पद के लिए पारदर्शी मापदंड बनाना; दूसरा, लंबे समय से काम करने वाले कार्यकर्ताओं को संगठनात्मक अवसर देना; और तीसरा, आंतरिक शिकायतों को दबाने के बजाय संस्थागत रूप से सुनना.
मणिपुर के आरोप इस बात की चेतावनी हैं कि जब तक पार्टी के भीतर नेतृत्व निर्माण की नैतिकता मजबूत नहीं होगी, तब तक बाहरी विपक्ष कमजोर होने पर भी भाजपा अपनी जीत को सुरक्षित नहीं मान सकती. असली चुनाव अक्सर मतदान केंद्र के बाहर नहीं, पार्टी कार्यालय के भीतर लड़ा जाता है, और वहीं से तय होता है कि जनता किसे भरोसा देगी.
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-भारत एक्सप्रेस
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