देश में बार-बार सामने आने वाले पेपर लीक और परीक्षा से जुड़े विवादों के बीच केंद्र सरकार ने इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में उच्च-स्तरीय टास्क फोर्स का गठन किया है. इस पहल को परीक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल पेपर लीक तक सीमित नहीं है. असली सवाल यह है कि करोड़ों छात्रों के लिए ऐसी परीक्षा प्रणाली कैसे बनाई जाए, जो पूरी तरह सुरक्षित, भरोसेमंद और निष्पक्ष हो.
नीट और सीयूईटी जैसी राष्ट्रीय परीक्षाओं में हर साल लाखों उम्मीदवार शामिल होते हैं. जब इतने बड़े स्तर पर एक ही दिन और कुछ घंटों के भीतर परीक्षा कराई जाती है, तो पूरी व्यवस्था एक बड़े जोखिम में बदल जाती है. किसी एक परीक्षा केंद्र पर तकनीकी गड़बड़ी, किसी प्रश्न पर विवाद या सुरक्षा में छोटी सी चूक भी लाखों छात्रों के भविष्य को प्रभावित कर सकती है. ऐसे में यह मान लेना कि एक ही बैठक में परीक्षा कराना हमेशा सबसे निष्पक्ष तरीका है, अब व्यावहारिक नहीं माना जा सकता.
भारत में कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं की दिशा में तेजी से काम हुआ है, लेकिन देशभर में उपलब्ध कंप्यूटर टर्मिनलों की संख्या अभी भी सीमित है. यही वजह है कि बड़े स्तर की परीक्षाओं को कई सत्रों में आयोजित करना अब लगभग अनिवार्य हो गया है.
विशेषज्ञों के अनुसार, परीक्षा प्रणाली को दो चरणों में बांटना ज्यादा प्रभावी हो सकता है. पहले चरण में कंप्यूटर आधारित राष्ट्रीय स्क्रीनिंग परीक्षा आयोजित की जाए, जिसे अलग-अलग सत्रों में कराया जाए. इसमें बड़ा प्रश्न बैंक, समान कठिनाई स्तर और पारदर्शी स्कोर नॉर्मलाइजेशन प्रक्रिया अपनाई जाए. छात्रों को दो अवसर देने और बेहतर स्कोर को अंतिम मानने का विकल्प भी दिया जा सकता है. इससे एक ही परीक्षा पर निर्भर रहने का दबाव काफी कम होगा.
इसके बाद दूसरे चरण में केवल शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों की विषयगत समझ, विश्लेषण क्षमता और योग्यता का गहराई से मूल्यांकन किया जाए. कम संख्या में अभ्यर्थियों के कारण इस स्तर पर अधिक सटीक और गुणवत्तापूर्ण चयन संभव होगा.
नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) को भी मजबूत संस्थागत ढांचे की जरूरत महसूस की जा रही है. विशेषज्ञों का सुझाव है कि इसे संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की तरह अधिक स्वायत्त बनाया जाए, ताकि यह प्रशासनिक दबाव से मुक्त होकर पेशेवर तरीके से काम कर सके.
एजेंसी में परीक्षा विशेषज्ञ, शिक्षाविद, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ, तकनीकी पेशेवर और प्रशासनिक अधिकारी शामिल हों, जिनका निश्चित कार्यकाल और स्पष्ट जवाबदेही तय हो. केवल बाहरी एजेंसियों पर निर्भर रहने के बजाय एनटीए के भीतर स्थायी विशेषज्ञों की टीम विकसित की जानी चाहिए.
साथ ही, एनटीए का दायरा भी स्पष्ट होना चाहिए. इसका मुख्य काम केवल बड़े पैमाने की स्क्रीनिंग परीक्षाएं आयोजित करना हो, जबकि मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य विशेष क्षेत्रों की विषय-विशेष परीक्षाओं का शैक्षणिक नियंत्रण संबंधित संस्थानों के पास ही रहे.
देशभर में एक समान गुणवत्ता वाले परीक्षा केंद्र विकसित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा इन्फ्रास्ट्रक्चर मिशन शुरू करने की भी आवश्यकता बताई गई है. विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, स्कूलों और अन्य सरकारी भवनों को तय मानकों के अनुसार आधुनिक परीक्षा केंद्रों में बदला जा सकता है.
इन केंद्रों में बेहतर कंप्यूटर, निर्बाध बिजली, तेज इंटरनेट, निगरानी व्यवस्था, दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए सुविधाएं और प्रशिक्षित स्टाफ सुनिश्चित किया जाना चाहिए. इसके अलावा, पूरी व्यवस्था को केवल कुछ निजी कंपनियों के भरोसे छोड़ने के बजाय कई प्रमाणित सेवा प्रदाताओं को शामिल किया जाए और समय-समय पर स्वतंत्र ऑडिट भी कराया जाए.
विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक केवल परीक्षा आयोजित करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. प्रश्न पत्र तैयार करने से लेकर उनके सुरक्षित भंडारण, एन्क्रिप्शन, वितरण और अंतिम समय में पेपर तैयार करने तक हर चरण में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल होना चाहिए. पूरी प्रक्रिया ऐसी हो कि कोई भी व्यक्ति अकेले पूरे प्रश्न पत्र तक पहुंच न बना सके और हर गतिविधि का डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध रहे.
इसके साथ ही साइबर सुरक्षा की नियमित जांच और किसी तकनीकी समस्या की स्थिति में पहले से तय आपातकालीन व्यवस्था भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होनी चाहिए.
परीक्षा प्रणाली में विश्वास केवल नई तकनीक लगाने से नहीं आएगा. छात्रों को यह साफ जानकारी मिलनी चाहिए कि स्कोर नॉर्मलाइजेशन कैसे होता है, प्रश्नों की समीक्षा किस आधार पर की जाती है, आपत्तियों का निपटारा कैसे होगा और किसी परीक्षा केंद्र पर गड़बड़ी होने पर क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी.
प्रोविजनल आंसर-की जारी करना, समयबद्ध आपत्तियां स्वीकार करना और विवादित प्रश्नों पर कारण सहित निर्णय देना अब सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहिए. यदि कोई गलती होती है तो परीक्षा एजेंसी को उसे स्वीकार कर पारदर्शी तरीके से सुधार करना चाहिए.
टास्क फोर्स के सामने सबसे बड़ा सवाल सिर्फ पेपर लीक रोकने का नहीं है, बल्कि यह तय करना भी है कि क्या भारत को इतनी बड़ी संख्या में उच्च-दांव वाली परीक्षाओं की वास्तव में जरूरत है. अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग योग्यता की आवश्यकता होती है, इसलिए सीमित लेकिन बेहतर राष्ट्रीय स्क्रीनिंग परीक्षाओं के बाद संबंधित संस्थानों द्वारा विशेषज्ञ स्तर की परीक्षाएं अधिक प्रभावी मॉडल साबित हो सकती हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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