विश्लेषण

रजाकारों के आतंक से ‘ऑपरेशन पोलो’ की जीत तक: जानिए 13 से 17 सितंबर 1948 के बीच क्या-क्या हुआ

भारत जब 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ, तो देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी सैकड़ों रजवाड़ों को एकजुट करना. कुल 562 रजवाड़ों में से 559 ने भारत में विलय के लिए इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर कर दिए. लेकिन तीन रजवाड़ों (कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद) ने अलग राह चुनी और देश की एकता के लिए गंभीर खतरा पैदा कर दिया.

जूनागढ़ फरवरी 1948 में भारत में शामिल हो गया. कश्मीर का मसला लंबा खिंच गया. लेकिन हैदराबाद का मामला सबसे जटिल और खतरनाक साबित हुआ. निजाम मीर उस्मान अली खान ने न तो भारत में विलय स्वीकार किया और न पाकिस्तान में. वे स्वतंत्र रहने की जिद पर अड़े रहे. हैदराबाद भौगोलिक रूप से भारत के ठीक मध्य में स्थित था. सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसे साफ शब्दों में ‘भारत के पेट में कैंसर’ बताया. उनका मानना था कि अगर यह कैंसर नहीं निकाला गया तो पूरा शरीर बीमार हो जाएगा.

निजाम की जिद और रजाकारों का आतंक

निजाम के शासन में मुस्लिम आबादी मात्र 12-13 प्रतिशत थी, जबकि हिंदू बहुसंख्यक थे. फिर भी प्रशासन, सेना और पुलिस पर मुस्लिम अभिजात वर्ग का कब्जा था. कासिम रिजवी के नेतृत्व में रजाकारों ने हिंदू आबादी पर अत्याचार का सिलसिला शुरू कर दिया. लूट, हत्या, बलात्कार और मंदिरों की तोड़फोड़ आम हो गई. निजाम ने स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट तो तोड़ दिया, विदेश से हथियार मंगवाने की कोशिश की और पाकिस्तान से मदद की उम्मीद भी लगाई.

नेहरू इस मामले में संकोच में थे. उन्हें अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया, पाकिस्तान की तरफ से जवाबी कार्रवाई और देश के अंदर सांप्रदायिक तनाव का डर था. लेकिन पटेल का रुख साफ था कि हैदराबाद को और समय नहीं दिया जा सकता.

वह एक सवाल जिसने फैसला बदल दिया

सैन्य कार्रवाई से पहले सरदार पटेल ने तत्कालीन पश्चिमी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल के.एम. करियप्पा को दिल्ली बुलाया. करियप्पा उस समय कश्मीर में थे. पांच मिनट की मुलाकात में पटेल ने सिर्फ एक सवाल पूछा—

‘अगर हैदराबाद में कार्रवाई के दौरान पाकिस्तान कोई हरकत करता है, तो क्या हम दो मोर्चों पर बिना अतिरिक्त मदद के निपट सकते हैं?’

क्या था करियप्पा का जवाब?

इतना सुनते ही पटेल ने नेहरू के संकोच को दरकिनार कर दिया. ब्रिटिश सेना प्रमुख जनरल रॉय बुचर ने भी दो मोर्चों का खतरा बताते हुए कार्रवाई का विरोध किया था. पटेल ने साफ कहा कि वे इस्तीफा दे सकते हैं, लेकिन पुलिस एक्शन कल शुरू होगा.

ऑपरेशन पोलो: पांच दिन में निजामशाही का अंत

13 सितंबर 1948 की सुबह भारतीय सेना ने हैदराबाद की सीमाओं पर धावा बोल दिया. इस अभियान को ‘ऑपरेशन पोलो’ नाम दिया गया (क्योंकि हैदराबाद में पोलो के मैदान प्रसिद्ध थे). इसे आधिकारिक रूप से ‘पुलिस एक्शन’ भी कहा गया, क्योंकि भारत इसे आंतरिक मामला मानता था.

मेजर जनरल जे.एन. चौधरी के नेतृत्व में सेना पश्चिम, पूर्व, उत्तर और दक्षिण से एक साथ आगे बढ़ी. निजाम की सेना और रजाकार संगठित प्रतिरोध नहीं कर सके. मात्र 108 घंटों में खेल खत्म हो गया. 17 सितंबर को निजाम ने आत्मसमर्पण कर दिया. 18 सितंबर को भारतीय सेना हैदराबाद शहर में प्रवेश कर गई.

एकता का प्रतीक

ऑपरेशन पोलो सिर्फ एक सैन्य जीत नहीं थी. यह भारत की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा का प्रतीक बन गई. अगर हैदराबाद स्वतंत्र रहता या पाकिस्तान से जुड़ जाता, तो देश दो हिस्सों में बंट जाता. सरदार पटेल की दूरदर्शिता, दृढ़ इच्छाशक्ति और सेना पर उनके अटूट विश्वास ने इस खतरे को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया.

आज जब हम हैदराबाद विलय दिवस मनाते हैं, तो याद आता है कि देश की एकता किसी एक व्यक्ति या दल की उपलब्धि नहीं, बल्कि उन निर्णायक क्षणों की देन है जब नेताओं ने संकोच छोड़कर राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी. सरदार पटेल ने न सिर्फ रजवाड़ों को जोड़ा, बल्कि भारत को एक अखंड राष्ट्र बनाने का सपना साकार किया.

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-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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