विश्लेषण

स्टूडेंट हॉस्टल से CM हाउस तक: वह रात जब लालू ने बिहार की कमान संभाली

Lalu Prasad Yadav: लालू प्रसाद यादव के उभार की कहानी सिर्फ एक राजनेता की जीवनी नहीं है. यह उस बदलाव की कहानी है, जब बिहार की राजनीति संभ्रांत वर्ग के नियंत्रण वाले सत्ता के कमरों से निकलकर एक ऐसे जन-राजनीतिक मैदान में पहुंची, जहां आम लोगों की भाषा, जाति की चेतना, प्रतिनिधित्व, सम्मान, पहचान, शासन और असंतोष आपस में टकरा रहे थे. लालू प्रसाद यादव की बिहार की राजनीति को समझने के लिए पटना के छात्रावासों और कैंपस नेटवर्क, जेपी आंदोलन के उथल-पुथल भरे दौर और मार्च 1990 के उस निर्णायक पल को फिर से देखना होगा, जब सत्ता की एक नई भाषा CM हाउस में दाखिल हुई.

मार्च 1990 की एक रात ने बिहार की राजनीति क्यों बदल दी?

क्योंकि मार्च 1990 में लालू प्रसाद यादव का मुख्यमंत्री चुना जाना सिर्फ एक नेता की जगह दूसरे नेता को बैठाना नहीं था. इसने बिहार की सत्ता के शीर्ष पर एक नए सामाजिक गठजोड़ का ऐलान किया. 1990 के बिहार विधानसभा चुनावों ने कांग्रेस के पुराने प्रभुत्व को कमजोर कर दिया, जनता दल को विधानसभा में सबसे बड़ी स्थिति दी और पार्टी के भीतर लालू प्रसाद, राम सुंदर दास और रघुनाथ झा के बीच नेतृत्व की लड़ाई शुरू हुई. जब लालू मुख्यमंत्री बने और 10 मार्च 1990 को शपथ ली, तो इसका प्रतीकात्मक संदेश साफ था: छात्र राजनीति, पिछड़ी जातियों के उभार और कांग्रेस विरोधी लामबंदी से तैयार हुआ एक नेता उस राज्य की सत्ता में पहुंच चुका था, जहां लंबे समय से अस्थिर सरकारों और संभ्रांत वर्ग के प्रभुत्व की पहचान रही थी.

वह रात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बिहार बदलाव के लिए तैयार था. 1967 से 1990 के बीच राज्य में सरकारें बार-बार बदलीं, कई मुख्यमंत्री आए और राष्ट्रपति शासन के भी कई दौर देखे गए. इससे ऐसा राजनीतिक माहौल बना, जिसमें स्थिरता खुद एक बड़ा वादा बन गई थी. लालू किसी सधे हुए प्रशासक या नौकरशाही की भाषा बोलने वाले नेता के रूप में नहीं आए थे. वह एक ऐसे नेता के रूप में आए जो राजनीति को प्रदर्शन, जनसंपर्क और लामबंदी के जरिए समझता था और अपने समर्थकों को यह महसूस करा सकता था कि सत्ता के दरवाजे आखिरकार उन लोगों के लिए खुल गए हैं, जिन्हें लंबे समय तक उनसे बाहर रखा गया था.

यही वजह है कि बिहार के राजनीतिक इतिहास में 1990 को सिर्फ एक और चुनावी साल मानकर नहीं देखा जा सकता. यह आवाज के हस्तांतरण का दौर था. CM हाउस, जिसे पहले दूर और औपचारिक सत्ता केंद्र के रूप में देखा जाता था, एक नए राजनीतिक मंच का हिस्सा बन गया, जहां भाषा, जाति, हास्य, अपमान, गर्व और चुनौती सत्ता चलाने के औजार बन गए.

कैंपस राजनीति से जननेता बनने तक का सफर

लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक पहचान सरकारी सत्ता के औपचारिक तौर-तरीकों से बहुत दूर बनी. मौजूदा गोपालगंज जिले के फूलवरिया गांव में जन्मे लालू पटना के कॉलेजों और छात्र नेटवर्क की दुनिया में पहुंचे. यहां समाजवादी विचार, कांग्रेस विरोधी गतिविधियां और युवाओं में बढ़ता असंतोष एक नई पीढ़ी को आकार दे रहे थे. कॉलेज के दिनों में वह समाजवादी राजनीति के संपर्क में आए और आगे चलकर 1970 के दशक की शुरुआत में पटना यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन के महासचिव और फिर अध्यक्ष बने.

हॉस्टल और कैंपस की दुनिया सिर्फ रहने की जगह नहीं थी. यह गैर-संभ्रांत पृष्ठभूमि से आने वाले महत्वाकांक्षी युवाओं के लिए एक राजनीतिक कक्षा भी थी. बिहार में कॉलेज यूनियन, जातीय संगठन, युवा मोर्चे और सड़क पर होने वाले आंदोलन अक्सर एक-दूसरे से जुड़े रहते थे. कोई छात्र नेता भीड़ से बात करना, गुटों के बीच समझौता करना, गिरफ्तारियों का सामना करना और गांवों तक फैले राजनीतिक नेटवर्क तैयार करना सीख सकता था.

जेपी आंदोलन ने लालू के राजनीतिक प्रशिक्षण को और गहरा किया. 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले आंदोलन ने युवाओं को व्यापक कांग्रेस विरोधी संघर्ष में शामिल किया और ऐसे कई नेताओं को तैयार किया, जो आगे चलकर उत्तर भारतीय राजनीति पर हावी हुए. लालू प्रसाद, नीतीश कुमार और राम विलास पासवान इसी व्यापक राजनीतिक उथल-पुथल से निकले, हालांकि बाद में तीनों ने अलग-अलग सामाजिक आधार और नेतृत्व की शैली विकसित की.

जब तक लालू 1977 में युवा जनता पार्टी उम्मीदवार के रूप में संसद पहुंचे, तब तक वह राजनीति को प्रदर्शन और संपर्क के रूप में समझ चुके थे. वह ऐसी भाषा में बोल सकते थे, जिसमें सरकारी फाइलों की औपचारिकता के बजाय ग्रामीण बिहार की महक थी. यही क्षमता बाद में उनकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक बनी, खासकर उन मतदाताओं के बीच जिन्हें लगता था कि राज्य लंबे समय से उनसे बात करने के बजाय उनके ऊपर अपनी बात थोपता रहा है.

उभार की एक छोटी टाइमलाइन

  • 1960 के दशक के आखिर और 1970 के दशक की शुरुआत: लालू पटना में छात्र राजनीति में आए और समाजवादी हलकों से जुड़े.
  • 1973-74: वह पटना यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन में आगे बढ़े, जो भविष्य के कई राजनीतिक नेताओं के लिए महत्वपूर्ण मंच था.
  • 1970 के दशक का मध्य: जेपी आंदोलन और आपातकाल ने उनकी कांग्रेस विरोधी पहचान को मजबूत किया.
  • 1977: उन्होंने युवा जनता पार्टी उम्मीदवार के रूप में लोकसभा सीट जीती.
  • 1990: बिहार विधानसभा चुनावों के बाद उन्होंने जनता दल के भीतर नेतृत्व की लड़ाई जीती और मुख्यमंत्री बने.

यह टाइमलाइन भले ही सरल हो, लेकिन इसके पीछे का सामाजिक अर्थ काफी जटिल है. लालू की यात्रा ने दिखाया कि सत्ता तक पहुंचने का रास्ता सिर्फ पारिवारिक प्रतिष्ठा, जातीय विशेषाधिकार, प्रशासनिक चमक-दमक या पुराने कांग्रेस नेटवर्क से होकर ही नहीं गुजरता. यह छात्र लामबंदी, समाजवादी भाषा और ग्रामीण मतदाताओं के साथ सीधे और सहज जुड़ाव से भी होकर गुजर सकता था.

1990 के बिहार चुनावों ने पुरानी व्यवस्था को तोड़ दिया

1990 के बिहार विधानसभा चुनाव इसलिए निर्णायक थे क्योंकि उन्होंने कांग्रेस के प्रभुत्व में गिरावट और नई जाति आधारित तथा कांग्रेस विरोधी राजनीतिक गोलबंदियों के उभार को सामने ला दिया. जनता दल ने 122 सीटें जीतीं, कांग्रेस 71 सीटों पर सिमट गई और बीजेपी को 39 सीटें मिलीं. इससे एक ऐसी विधानसभा बनी जो बंटी हुई जरूर थी, लेकिन बदल चुकी थी और जिसमें सत्ता चलाने की पुरानी शैली का दबदबा नहीं रह गया था.

बिहार के चुनावों का अध्ययन करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए सबक साफ है: आंकड़े मायने रखते हैं, लेकिन आंकड़ों का मतलब उससे भी ज्यादा मायने रखता है. जनता दल का प्रदर्शन सिर्फ एक पार्टी की जीत नहीं था. यह व्यापक कांग्रेस विरोधी लहर के भीतर पिछड़ी जातियों के नेतृत्व के मजबूत होने का संकेत था. इसमें वीपी सिंह के दौर की राष्ट्रीय राजनीति और प्रतिनिधित्व की मांगों से बने सामाजिक माहौल की भी भूमिका थी.

जनता दल के भीतर नेतृत्व का सवाल अहम हो गया. राम सुंदर दास के पास अनुभव और राजनीतिक कद था. रघुनाथ झा का भी अपना समर्थन आधार था. लेकिन लालू एक नई और ज्यादा चुनौतीपूर्ण ताकत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. जॉर्ज फर्नांडिस और मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं का समर्थन उन्हें मुख्यमंत्री पद की दौड़ में आगे ले गया. लेकिन उनकी असली ताकत व्यापक राजनीतिक माहौल में थी: बिहार ऐसे नेता के लिए तैयार था, जो असंतोष को सत्ता चलाने के जनादेश में बदल सके.

यहीं से लालू प्रसाद यादव की बिहार की राजनीति एक अलग घटना बन गई. उन्होंने सिर्फ जनता दल के जनादेश को आगे नहीं बढ़ाया. उन्होंने उसे एक चेहरा, एक बोली, एक सामाजिक लक्ष्य और एक यादगार भावनात्मक ताकत दी.

लालू प्रसाद यादव का उभार अलग क्यों था?

लालू प्रसाद यादव का उभार इसलिए अलग था क्योंकि उन्होंने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को रोजमर्रा के राजनीतिक प्रदर्शन में बदल दिया. कई नेता गरीबों और पिछड़े समुदायों की बात करते थे, लेकिन लालू ने इस प्रतीकात्मकता को दिखाई देने वाला रूप दिया. उनकी भाषा, हास्य, पहनावा, हावभाव और सीधेपन से समर्थकों को यह संदेश मिलता था कि सत्ता को अब ऊंची जाति, शहरी या नौकरशाही तरीके की दिखने वाली चीज होना जरूरी नहीं है. उनकी राजनीति ने कई पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यक मतदाताओं को सम्मान का एहसास दिया. हालांकि बाद में आलोचकों ने तर्क दिया कि यह प्रतीकात्मक सशक्तीकरण शासन और कानून-व्यवस्था के मानकों की कीमत पर आया.

बिहार में, जहां जातीय पदानुक्रम जमीन, शिक्षा, थानों, सरकारी दफ्तरों और सामाजिक सम्मान तक पहुंच को प्रभावित करता था, वहां सम्मान कोई अमूर्त वादा नहीं था. कई मतदाताओं के लिए सवाल सिर्फ यह नहीं था कि सड़कें बनेंगी या नहीं. सवाल यह भी था कि क्या वे बिना डर थाने में जा सकते हैं, अपनी भाषा में बात कर सकते हैं, बिना दबाव के वोट दे सकते हैं और क्या अपने जैसे किसी व्यक्ति को अधिकारियों पर शासन करते देख सकते हैं. यही वजह है कि लालू के समर्थक अक्सर उनके शासन को आत्मसम्मान की भाषा में याद करते हैं.

वहीं, उनके आलोचकों ने इसे एक खतरनाक गिरावट के रूप में देखा. उनका तर्क था कि प्रशासन कमजोर हुआ, अपराध बढ़ा, विकास प्रभावित हुआ और जातीय दावेदारी सार्वभौमिक होने के बजाय चुनिंदा बन गई. ‘जंगल राज’ का नारा आरजेडी के दौर के खिलाफ एक प्रमुख राजनीतिक हथियार बन गया और आज भी बिहार की राजनीतिक पार्टियों के अभियानों में लालू की विरासत पर हमला करने के दौरान इसका इस्तेमाल होता है.

बिहार के राजनीतिक इतिहास में दोनों नजरिए मौजूद हैं. लालू को सिर्फ मसीहा के रूप में लिखना अधूरा है. उन्हें सिर्फ कुशासन के प्रतीक के रूप में लिखना भी अधूरा है. उनका महत्व इस बात में है कि उन्होंने बिहार को इस सवाल का सामना करने के लिए मजबूर किया कि सत्ता किसके लिए है, कौन सत्ता से खुद को सुरक्षित महसूस करता है और कौन खुद को उससे बाहर महसूस करता है.

मंडल, मंदिर और बिहार की राजनीति की नई भाषा

1990 का शुरुआती दशक शांत दौर नहीं था. मंडल आयोग की सिफारिशों ने आरक्षण और पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधित्व की राजनीति को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया. उसी समय राम जन्मभूमि आंदोलन और एलके आडवाणी की रथ यात्रा ने हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति को ऊर्जा दी. बिहार उन सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक मैदानों में से एक बन गया, जहां ये दोनों धाराएं आमने-सामने आईं.

लालू ने खुद को मंडल राजनीति और धर्मनिरपेक्ष राजनीति के रक्षक के रूप में पेश किया. अक्टूबर 1990 में समस्तीपुर में एलके आडवाणी को गिरफ्तार करने का उनका फैसला उनके पहले कार्यकाल की सबसे चर्चित घटनाओं में शामिल हो गया. सरकारी रिकॉर्ड और बाद के राजनीतिक विवरणों में बिहार में आडवाणी की गिरफ्तारी को रथ यात्रा और अयोध्या आंदोलन को लेकर हुए टकराव में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज किया गया है.

इस गिरफ्तारी ने मुसलमानों और कई पिछड़ी जातियों के मतदाताओं के बीच लालू की छवि को मजबूत करने में मदद की. इससे संदेश गया कि उनकी सरकार बिहार में रथ यात्रा को बिना रोक-टोक आगे नहीं बढ़ने देगी. उस समय की राजनीतिक भाषा में यह सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं था. यह घोषणा थी कि मंडल के दौर की सामाजिक न्याय की राजनीति हिंदुत्व की बढ़ती ताकत के सामने खड़ी होगी.

नारे के पीछे का गठजोड़

लालू के समर्थन आधार को अक्सर ‘मुस्लिम-यादव’ गठजोड़ के रूप में सरल करके देखा जाता है, लेकिन मंडल का शुरुआती दौर इससे कहीं व्यापक आकांक्षाओं वाला था. कई ओबीसी समूहों, दलितों, अल्पसंख्यकों और गरीब मतदाताओं को ऊंची जातियों के प्रभुत्व के कमजोर होने में एक नया अवसर दिखाई दिया. भावनात्मक ऊर्जा इस भावना से आई कि सामाजिक व्यवस्था को आखिरकार चुनौती दी जा रही है.

समय के साथ यह गठजोड़ विवाद का विषय बन गया. गैर-यादव पिछड़े समुदायों के आलोचकों ने तर्क दिया कि एक जाति को असमान रूप से फायदा मिला. दलित राजनीति भी पूरी तरह लालू की परियोजना में शामिल नहीं हुई और राम विलास पासवान जैसे नेताओं ने सामाजिक न्याय की राजनीति की एक अलग धारा का प्रतिनिधित्व किया. बाद में नीतीश कुमार ने अत्यंत पिछड़े वर्गों, महादलितों, महिलाओं और ऐसे मतदाताओं को ध्यान में रखकर अपनी राजनीति विकसित की, जो प्रतिनिधित्व के साथ शासन भी चाहते थे.

यही वजह है कि 1990 के बाद की बिहार की राजनीति को सिर्फ एक पार्टी या एक जाति तक सीमित नहीं किया जा सकता. यह एक ऐसा प्रतिस्पर्धी राजनीतिक मैदान बन गया, जहां हर बड़ी राजनीतिक ताकत को सामाजिक न्याय की भाषा में बात करनी पड़ी, भले ही वह यह तर्क देती रही कि उसका प्रतिनिधित्व दूसरों से बेहतर है.

लालू के दौर के बाद बिहार की राजनीतिक पार्टियां

लालू के उभार ने बिहार की राजनीतिक पार्टियों के काम करने के तरीके को बदल दिया. 1990 से पहले कांग्रेस लंबे समय तक प्रमुख ताकत रही थी, हालांकि उसे समाजवादियों, कम्युनिस्टों, जनता परिवार की पार्टियों और क्षेत्रीय जातीय नेताओं से चुनौती मिलती रही थी. 1990 के बाद कोई भी गंभीर राजनीतिक पार्टी जातीय प्रतिनिधित्व, पिछड़ा वर्ग लामबंदी, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और मंडल की राजनीति की विरासत को नजरअंदाज नहीं कर सकती थी.

जनता दल खुद उन सभी महत्वाकांक्षाओं को अपने भीतर समेट नहीं सका, जिन्हें उसने जन्म दिया था. 1995 के विधानसभा चुनाव में लालू ने सत्ता बरकरार रखी और जनता दल ने 324 में से 167 सीटें जीतीं, लेकिन पूर्व सहयोगियों के साथ तनाव बढ़ता गया. नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस पहले ही अलग होकर समता पार्टी बना चुके थे, जो बाद में उस राजनीतिक धारा का हिस्सा बनी जिसे जनता दल यूनाइटेड से जोड़ा गया.

1997 में चारा घोटाले की जांच तेज होने के बीच लालू जनता दल से अलग हो गए और उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल का गठन किया. बाद में उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और जुलाई 1997 में राबड़ी देवी ने उनकी जगह मुख्यमंत्री पद संभाला. यह एक नए दौर की शुरुआत थी. लालू की राजनीति आरजेडी के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गई और परिवार का नेतृत्व पार्टी की पहचान का अहम हिस्सा बन गया.

इस बीच बीजेपी गठबंधन और आरजेडी विरोधी राजनीति के जरिए बिहार में एक बड़ी ताकत के रूप में उभरी. बाद में नीतीश कुमार के नेतृत्व में जेडीयू ने खुद को शासन-केंद्रित विकल्प के रूप में पेश किया, जिसने सामाजिक न्याय की भाषा को स्वीकार करते हुए बेहतर प्रशासन का वादा किया. कभी प्रमुख ताकत रही कांग्रेस बिहार के कई चुनावों में एक सीमित सहयोगी या दूसरी पंक्ति की पार्टी बन गई.

राजनीतिक मैदान कैसे बदला

RJD: लालू की सामाजिक न्याय की राजनीति, अल्पसंख्यकों तक पहुंच, यादव समर्थन और बाद में पारिवारिक नेतृत्व के इर्द-गिर्द बनी.

JD(U): व्यापक समाजवादी और लालू विरोधी राजनीति से उभरी और बाद में शासन, अत्यंत पिछड़े वर्गों तक पहुंच, महिलाओं से जुड़ी योजनाओं और प्रशासनिक विश्वसनीयता पर जोर देने लगी.

BJP: आरजेडी विरोधी राजनीति, हिंदुत्व, गठबंधन निर्माण और बाद में व्यापक ओबीसी पहुंच के जरिए विस्तार किया.

Congress: प्रमुख सत्तारूढ़ पार्टी से घटकर बिहार के कई चुनावों में एक सीमित सहयोगी या दूसरी पंक्ति की पार्टी बन गई.

वाम दल और छोटी जाति आधारित पार्टियां: कुछ इलाकों में महत्वपूर्ण बनी रहीं, खासकर जहां जमीन, वर्ग, जातीय हिंसा और स्थानीय नेतृत्व ने मतदान को प्रभावित किया.

इसका स्थायी असर यह हुआ कि बिहार के चुनाव गठबंधन आधारित, जाति के प्रति सजग और राजनीतिक स्मृतियों से प्रभावित हो गए. हर चुनाव में लालू के दौर की गूंज सुनाई देती है. कभी प्रतिनिधित्व पर गर्व के रूप में, कभी कथित कुशासन पर गुस्से के रूप में, कभी एक खुरदरी बराबरी वाली राजनीतिक ऊर्जा की याद के रूप में और कभी उसके लौटने के डर के रूप में.

CM हाउस सिर्फ पता नहीं, एक मंच बन गया

‘स्टूडेंट हॉस्टल से CM हाउस तक’ की पंक्ति इसलिए असरदार है क्योंकि लालू की कहानी हमेशा विरोधाभास पर टिकी रही. उन्हें किसी दूर बैठे राजनेता के रूप में पेश नहीं किया गया. वह खुद को ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश करते थे, जो साधारण परिस्थितियों से आया, गरीबों को समझता था, संभ्रांत तौर-तरीकों का मजाक उड़ा सकता था और औपचारिक सत्ता को लोगों के लिए ज्यादा सुलभ रूप दे सकता था.

यह शैली उस राज्य में बेहद महत्वपूर्ण थी, जहां सरकारी दफ्तर अक्सर डराने वाले लगते थे. लालू की सार्वजनिक छवि यह संकेत देती थी कि मुख्यमंत्री को राज्य पर शासन करने के लिए अंग्रेजी बोलना, संभ्रांत अंदाज में कपड़े पहनना या नौकरशाही वाली गंभीरता दिखाना जरूरी नहीं है. उनका देसी हास्य सिर्फ सजावट नहीं था. वह एक राजनीतिक औजार था.

समर्थकों ने इसे लोकतंत्रीकरण के रूप में देखा. उन्हें लगा कि शासक और शासित के बीच की प्रतीकात्मक दूरी कम हो गई है. आलोचकों ने इसे ऐसा नाटकीय लोकलुभावनवाद माना, जो संस्थाओं, निवेश, शिक्षा, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक सुधार से ध्यान भटका रहा था.

दोनों पक्ष एक वास्तविक चीज का वर्णन कर रहे थे. लालू ने उन लोगों के लिए राजनीति को सुलभ जरूर बनाया, जो खुद को सत्ता से बाहर महसूस करते थे. लेकिन सिर्फ सुलभता बिहार की संरचनात्मक समस्याओं को हल नहीं कर सकती थी. सड़कें बननी थीं, स्कूलों को काम करना था, पुलिस को अपना काम करना था और रोजगार बढ़ना था. सम्मान और कामकाज के बीच का तनाव उनके शासन को लेकर सबसे बड़ी बहस बन गया.

शासन, आलोचना और विरासत का बोझ

लालू प्रसाद यादव की बिहार की राजनीति का कोई भी विवरण उनके सत्ता के वर्षों के बाद सामने आई आलोचनाओं से बच नहीं सकता. विरोधियों ने उनकी सरकारों पर अपराध, संरक्षणवाद, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक गिरावट को बढ़ावा देने के आरोप लगाए. ‘जंगल राज’ का लेबल आधुनिक बिहार में सबसे लंबे समय तक इस्तेमाल किए गए राजनीतिक हमलों में से एक बन गया और आज भी विरोधी दल आरजेडी को घेरने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं.

चारा घोटाले ने भी लालू के राजनीतिक सफर की दिशा बदल दी. आरोपों और जांच ने उनकी स्थिति कमजोर की और 1997 में उन्होंने आरजेडी बनाई. इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़ा और राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया. आलोचकों के लिए वह दौर पारिवारिक नियंत्रण और संस्थागत जवाबदेही के बजाय राजनीतिक अस्तित्व को प्राथमिकता देने का प्रतीक था. समर्थकों के लिए इसे एक बड़ी लड़ाई के हिस्से के रूप में देखा गया, जिसमें पिछड़ी जाति के नेता को विरोधी ताकतों द्वारा निशाना बनाया जा रहा था.

सच्चाई यह है कि राजनीतिक विरासत शायद ही कभी सीधी और एकरंगी होती है. लालू के शासन ने बहुत से लोगों को यह महसूस कराया कि राज्य उन्हें देख रहा है, लेकिन इसी दौर ने बिहार में शासन को लेकर तीखी बहस भी छोड़ी. उनकी राजनीति ने सम्मान को भाषा दी, लेकिन उनके विरोधियों ने विकास और कानून-व्यवस्था को इसके खिलाफ प्रमुख मुद्दा बना दिया.

यही विरोधाभास बताता है कि बाद में नीतीश कुमार के उभार की जगह कैसे बनी. नीतीश ने सामाजिक न्याय को पूरी तरह खारिज नहीं किया. उन्होंने इसे शासन, कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच, सड़कों, स्कूली शिक्षा, महिलाओं की भागीदारी और उन समुदायों तक पहुंच के जरिए नए रूप में पेश किया, जो आरजेडी के मुख्य समर्थन आधार से खुद को बाहर महसूस करते थे. इस अर्थ में लालू के बाद का दौर मंडल राजनीति का अंत नहीं था. यह प्रशासन की मांग के साथ मंडल राजनीति का नया रूप था.

लालू आज भी बिहार की खबरों और चुनावी बहसों में क्यों दिखाई देते हैं?

आज की लालू यादव से जुड़ी खबरें अक्सर सिर्फ एक व्यक्ति के बारे में नहीं होतीं. वे आमतौर पर राजनीतिक विरासत, स्मृति, जातीय गठबंधन, कानूनी लड़ाई, पार्टी नियंत्रण, तेजस्वी यादव के नेतृत्व, आरजेडी के भविष्य या इस सवाल से जुड़ी होती हैं कि आज सामाजिक न्याय का मतलब क्या होना चाहिए. जब लालू खुद मुख्य प्रचारक नहीं होते, तब भी उनका नाम बिहार की राजनीति के एक पूरे दौर का संकेत बना रहता है.

इसकी वजह संयोग नहीं है. जेपी आंदोलन और मंडल राजनीति से तैयार हुई पीढ़ी ने दशकों तक बिहार को प्रभावित किया. हाल की राजनीतिक चर्चाओं में राज्य को एक पीढ़ीगत बदलाव से गुजरता हुआ बताया गया है, जहां पुराने समाजवादी नेताओं की सीधी राजनीतिक भूमिका कम हो रही है. लालू प्रसाद की स्वास्थ्य और कानूनी परेशानियों ने उनकी सक्रिय भूमिका को सीमित किया है, लेकिन आरजेडी अब भी उनके दौर की भावनात्मक राजनीतिक पूंजी पर काफी निर्भर है.

युवा मतदाताओं के लिए लालू का दौर अक्सर उनके अपने अनुभव से ज्यादा विरासत में मिली स्मृति है. कुछ लोग अपने माता-पिता और दादा-दादी से सशक्तीकरण की कहानियां सुनते हैं. दूसरे अपहरण, खराब सड़कों और डर की कहानियां सुनते हैं. स्मृतियों का यह अंतर बिहार के चुनावों को असामान्य रूप से ऐतिहासिक बना देता है. मतदाता सिर्फ वर्तमान के घोषणापत्रों के बीच चुनाव नहीं कर रहे होते. वे अतीत की अलग-अलग कहानियों के बीच भी चुनाव कर रहे होते हैं.

सत्ता बदलने वाली उस रात से क्या सीख मिलती है?

मार्च 1990 का वह दौर आज भी बिहार के राजनीतिक इतिहास को समझने के लिए कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने रखता है. लालू का उभार दिखाता है कि लोकतंत्र सिर्फ संस्थाओं के बारे में नहीं है. यह पहचान और सम्मान के बारे में भी है. लोग सिर्फ नीतियों के लिए वोट नहीं करते. वे उस एहसास के लिए भी वोट करते हैं कि कोई उनकी बेइज्जती को समझता है, उनकी भाषा बोलता है और उन्हें अदृश्य नहीं समझेगा.

साथ ही, प्रतीकात्मक राजनीति की सीमाएं भी साफ हैं. पहचान और सम्मान सत्ता के दरवाजे खोल सकते हैं, लेकिन वे अकेले स्कूल नहीं चला सकते, रोजगार पैदा नहीं कर सकते, कानून-व्यवस्था बनाए नहीं रख सकते और मजबूत संस्थाएं खड़ी नहीं कर सकते. सम्मान से शुरू होने वाली राजनीति को आखिरकार कामकाज और नतीजों के सवालों का जवाब देना ही पड़ता है.

पाठकों के लिए मुख्य बातें

1990 एक सामाजिक मोड़ था: लालू का मुख्यमंत्री बनना बिहार की सरकार के केंद्र में पिछड़ी जातियों की राजनीतिक दावेदारी के पहुंचने का प्रतीक था.

छात्र राजनीति की भूमिका अहम थी: कैंपस नेतृत्व, समाजवादी नेटवर्क और जेपी आंदोलन ने भविष्य के नेताओं के लिए राजनीतिक प्रशिक्षण का मैदान तैयार किया.

मंडल ने राजनीतिक भाषा बदल दी: प्रतिनिधित्व, आरक्षण और सम्मान बिहार की सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियों के लिए अनिवार्य मुद्दे बन गए.

रथ यात्रा की गिरफ्तारी ने उनकी छवि को प्रभावित किया: 1990 में आडवाणी के खिलाफ लालू की कार्रवाई ने उनकी धर्मनिरपेक्ष और हिंदुत्व विरोधी राजनीतिक स्थिति को मजबूत किया.

विरासत पर बहस जारी है: समर्थक सशक्तीकरण को याद करते हैं, जबकि आलोचक भ्रष्टाचार, अपराध और प्रशासनिक गिरावट को याद करते हैं.

बिहार के चुनावों में आज भी उस दौर की याद मौजूद है: हर बड़ी पार्टी आज भी उस राजनीति के जरिए, उसके खिलाफ या उससे आगे की राजनीति के जरिए चुनाव लड़ती है, जिसे लालू ने आकार देने में बड़ी भूमिका निभाई.

बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का बड़ा अर्थ

पटना की छात्र राजनीति की दुनिया से CM हाउस तक लालू प्रसाद यादव का सफर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जमीन पर भारतीय लोकतंत्र के नाटक को सामने लाता है. यह जातीय पदानुक्रम को चुनौती दिए जाने, पुरानी पार्टियों के कमजोर होने, नए मतदाताओं के राजनीतिक रूप से जागने और राजनीतिक भाषा के बदलने की कहानी है. यह इस बात की भी कहानी है कि करिश्मा किस तरह सत्ता को लोकतांत्रिक रूप से ज्यादा सुलभ बना सकता है और साथ ही संस्थाओं पर दबाव भी डाल सकता है.

बिहार के लिए लालू कोई गुजर जाने वाला राजनीतिक अध्याय नहीं थे. उन्होंने राजनीति का भावनात्मक नक्शा बदल दिया. उनके बाद कोई भी पार्टी यह दिखावा नहीं कर सकती थी कि जातीय प्रतिनिधित्व कोई दूसरा दर्जे का मुद्दा है, ग्रामीण भाषा पिछड़ेपन की निशानी है या गरीबों से सम्मान के बिना सिर्फ कल्याणकारी योजनाओं के जरिए बात की जा सकती है. उनके सबसे कड़े विरोधियों को भी उस राजनीतिक दुनिया का जवाब देना पड़ा, जिसे बनाने में लालू की भूमिका रही.

ये भी पढ़ें- ठहाका, तेवर और तूफानी राजनीति! जानिए कैसे लालू यादव ने हमेशा के लिए बदल दिए भारतीय लोकतंत्र के नियम

इसलिए लालू के बिहार की कमान संभालने की वह रात सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी की कहानी नहीं थी. यह उस सवाल की कहानी थी कि आखिर कौन उस कुर्सी पर बैठने की कल्पना कर सकता है. यही वजह है कि जब भी लोग लालू प्रसाद यादव, बिहार की राजनीति, बिहार के चुनाव या सामाजिक न्याय और शासन को लेकर भारत के सबसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों में से एक में जारी लंबे और अधूरे विवाद को समझना चाहते हैं, तब यह कहानी आज भी मायने रखती है.

-भारत एक्सप्रेस

Prashant Kumar

CEO – Bharat Express Digital Chief Advisor to the Chairman & Managing Director and Editor-in-Chief Mr. Prashant Kumar is a digital, media and growth transformation leader with 18+ years of experience across strategy, technology, AI, marketing and business transformation, having worked with leading organisations including Amazon, IBM, Adidas and Tata Consumer Products. At Bharat Express, he leads digital transformation, audience growth, technology, partnerships, monetisation and new business initiatives to build a scalable, future-ready media ecosystem.

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बदायूं के चर्चित दोहरे हत्याकांड (ऑनर किलिंग के मामले) में सेशन कोर्ट द्वारा सुनाई गई…

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Ayodhya Leopard Fear: अयोध्या के इस इलाके में तेंदुए ने दहशत फैलाई, पिंजरे का चारा छोड़ बछड़े को बनाया शिकार

LEOPARD PANIC IN AYODHYA CANTT: रामनगरी अयोध्या से सटे कैंट (छावनी) इलाके में पिछले कई…

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बिहार में बाढ़ का खतरा! गंडक समेत कई नदियां उफान पर, सीएम सम्राट चौधरी ने किया हवाई सर्वेक्षण

बिहार में गंडक समेत कई नदियों के बढ़ते जलस्तर के बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने…

1 hour ago