रोडा आर्म्स लूट की कहानी
Rodda Arms Loot: 1905 में बंगाल विभाजन के बाद पूरे बंगाल में विद्रोह की लहर फैल गई. क्रांतिकारी गतिविधियां तेज हुईं. अंग्रेजों ने इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए 1911 में राजधानी कोलकाता से दिल्ली शिफ्ट कर दी. 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ. अंग्रेजों का ध्यान यूरोप के मोर्चे पर केंद्रित हो गया. यह भारतीय क्रांतिकारियों के लिए सुनहरा अवसर था. वे सशस्त्र विद्रोह की तैयारी में जुटे थे, लेकिन हथियारों की भारी कमी थी.
बंगाल के दो प्रमुख क्रांतिकारी संगठनों ‘मुक्ति संघ’ (ढाका) और ‘आत्मोन्नति समिति’ (कोलकाता) ने हथियार जुटाने के लिए हाथ मिलाया. आत्मोन्नति समिति के प्रमुख बिपिन बिहारी गांगुली और अनुकुल मुखर्जी तथा मुक्ति संघ के हरिदास दत्त जैसे क्रांतिकारी इस योजना के मुख्य सूत्रधार बने.
क्रांतिकारी श्रीश चंद्र मित्र (उपनाम हबू) ने इस काम में निर्णायक भूमिका निभाई. उन्होंने रोडा एंड कंपनी (Rodda & Co.) में नौकरी कर ली. यह कंपनी भारत में अंग्रेजों को हथियार सप्लाई करती थी. मित्र कंपनी में जेट्टी क्लियरिंग क्लर्क के रूप में काम करते हुए अंग्रेजों का विश्वास जीत चुके थे. उन्हें पता चला कि अगस्त 1914 में जर्मनी से 50 माउजर सी-96 पिस्तौलें और लगभग 46,000 राउंड गोला-बारूद की एक बड़ी खेप आ रही है.
24 अगस्त 1914 को कोलकाता के बोबाजार इलाके में एक गुप्त बैठक हुई. इसमें विभिन्न गुटों के क्रांतिकारियों ने लूट की अंतिम रूपरेखा तैयार की.
26 अगस्त 1914 को सुबह श्रीश चंद्र मित्र कस्टम हाउस (आज का आरबीआई भवन, बीबीडी बाग) पहुंचे. उन्होंने सात बैलगाड़ियाँ लेकर खेप प्राप्त की. कुल 202 बक्सों में से 192 बक्स छह गाड़ियों में लाद दिए गए. बाकी 10 बक्स (जिनमें 50 माउजर पिस्तौलें और 46 हजार राउंड गोलियां थीं) सातवीं गाड़ी में रखे गए.
इस सातवीं गाड़ी का चालक हरिदास दत्त थे, जिन्होंने ग्रामीण बैलगाड़ी चालक का भेष बदला था. श्रीश पाल और खगेन्द्र नाथ दास गाड़ी के साथ पैदल चल रहे थे. जब बाकी गाड़ियां कंपनी के गोदाम की ओर बढ़ गईं, तब यह सातवीं गाड़ी अलग हो गई और मिशन रो होते हुए मलंगा लेन पहुंची. वहां हथियार सुरक्षित स्थान पर उतार लिए गए.
यह इतनी कुशलता से किया गया कि तीन दिन बाद तक अंग्रेज प्रशासन को भी पता नहीं चला. 30 अगस्त 1914 को द स्टेट्समैन अखबार ने इसे “दिन के उजाले में सबसे बड़ी डकैती” (The greatest daylight robbery) कहा.
इन लूटे गए माउजर पिस्तौलों और गोलियों का इस्तेमाल बाद के वर्षों में कई महत्वपूर्ण क्रांतिकारी कार्रवाइयों में हुआ. इनमें 1915 का गदर विद्रोह, बाघा जतिन का अंतिम संघर्ष और 1925 का काकोरी ट्रेन एक्शन शामिल हैं. रोलेट समिति की रिपोर्ट (1918) में भी स्वीकार किया गया कि अगस्त 1914 के बाद बंगाल में हुई अधिकांश क्रांतिकारी घटनाओं में इन्हीं हथियारों का उपयोग हुआ था.
यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी अध्याय की एक अद्वितीय मिसाल है. बिना एक भी गोली चलाए, अंग्रेजों के गढ़ में जाकर हथियार छीन लेना उस दौर के क्रांतिकारियों की बहादुरी, संगठित योजना और दूरदर्शिता का प्रमाण है. आज भी कोलकाता के मलंगा लेन के पास इस घटना से जुड़े क्रांतिकारियों की प्रतिमाएं इस साहसिक इतिहास को जीवित रखे हुए हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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