24 अगस्त 1608: जब भारत पहुंचा ईस्ट इंडिया कंपनी का पहला जहाज
आज ही के दिन 1608 को, ईस्ट इंडिया कंपनी का पहला जहाज ‘हेक्टर’ सूरत के तट पर पहुंचा था. इसे ही कंपनी का भारत में औपचारिक आगमन माना जाता है. उस समय शायद ही किसी को अंदाजा था कि व्यापार के उद्देश्य से आई यह कंपनी आने वाले करीब दो सौ सालों तक भारत पर राज करेगी और देश के भूगोल, इतिहास तथा भाग्य को हमेशा के लिए बदलकर रख देगी.
कैसे शुरू हुआ सिलसिला?
दरअसल 16वीं शताब्दी के अंत में ब्रिटिश साम्राज्य यूरोप तक सीमित था. पुर्तगाली और डच पहले से ही एशियाई व्यापार में मजबूत पकड़ बना चुके थे. अंग्रेज व्यापारियों को एक बड़े बाजार की जरूरत महसूस हो रही थी. उन्होंने इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम से भारत और पूर्व के देशों में व्यापार करने की अनुमति मांगी. 31 दिसंबर 1600 को रॉयल चार्टर के साथ ‘गवर्नर एंड कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ लंदन ट्रेडिंग इनटू द ईस्ट इंडीज’ नामक कंपनी का गठन हुआ.
इसे मुख्य रूप से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापार के लिए बनाया गया था, इसलिए इसका नाम ईस्ट इंडिया कंपनी पड़ा. कंपनी की शुरुआती पूंजी लगभग 72 हजार स्टर्लिंग पाउंड थी और इसमें सैकड़ों शेयरधारक शामिल थे. रॉयल चार्टर के कारण इसे ब्रिटिश शाही परिवार का संरक्षण प्राप्त था.
भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की एंट्री (East India Company India Arrival)
पाठकों को बता दें कि 24 अगस्त 1608 को कैप्टन विलियम हॉकिंस के नेतृत्व में जहाज हेक्टर सूरत पहुंचा. उस समय मुगल सम्राट जहांगीर का शासन था. हॉकिंस ने जहांगीर से मुलाकात की और व्यापार की अनुमति मांगी. लेकिन सूरत में पहले से पुर्तगाली व्यापारी सक्रिय थे, इसलिए अनुमति हासिल करना आसान नहीं था. हॉकिंस को काफी संघर्ष का सामना करना पड़ा.
इसके बाद कंपनी ने एक और मजबूत कदम उठाया. संसद के सदस्य और अनुभवी राजनयिक सर थॉमस रो को शाही दूत के रूप में भारत भेजा गया. वे 1615 में भारत पहुंचे और मुगल दरबार में गए. रो अपने साथ कीमती तोहफे लेकर आए थे. लगभग तीन साल के प्रयासों के बाद उन्होंने मुगल सम्राट से भारत में व्यापार के लिए शाही फरमान हासिल कर लिए. इससे कंपनी के लिए रास्ते पूरी तरह खुल गए.
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कंपनी से प्रशासनिक शक्ति बनने की कहानी
अब कंपनी ने तेजी से विस्तार शुरू कर दिया. बड़े-बड़े बंदरगाहों पर फैक्टरियां स्थापित की गईं. 1646-47 तक कंपनी देशभर में 23 फैक्टरियां स्थापित कर चुकी थी. मुगल साम्राज्य की कमजोरियों का फायदा उठाकर कंपनी धीरे-धीरे व्यापार से आगे बढ़कर शासन-प्रशासन में भी दखल देने लगी. एक साधारण व्यापारिक कंपनी से वह प्रशासनिक और सैन्य शक्ति में बदल गई.
इस घटना ने भारत के इतिहास की दिशा तय कर दी. जो कंपनी व्यापार के नाम पर आई थी, वह बाद में ब्रिटिश साम्राज्य का आधार बनी. एक समय कहा जाता था कि ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज कभी नहीं डूबता, लेकिन उसकी शुरुआत भारत की धरती पर 24 अगस्त 1608 को ही हो गई थी.यह दिन हमें याद दिलाता है कि इतिहास कैसे छोटी-सी घटनाओं से बड़े बदलावों की ओर बढ़ता है.
-भारत एक्सप्रेस
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