विश्लेषण

भगवा जागरण: उत्तर प्रदेश मंडल की राजनीति से कमंडल के दबदबे तक कैसे पहुंचा

Saffron Politics In UP: उत्तर प्रदेश की राजनीतिक यात्रा आधुनिक भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण कहानियों में से एक है. राज्य मंडल दौर की उस राजनीति से आगे बढ़ा, जिसमें जातीय न्याय, ओबीसी का उभार और दलितों की राजनीतिक सक्रियता मुख्य मुद्दे थे. इसके बाद राजनीति कमंडल के दौर में पहुंची, जहां हिंदू पहचान, कल्याणकारी योजनाओं का लाभ, नेतृत्व की छवि और बूथ स्तर के संगठन ने भगवा पार्टी को एक बड़ा सामाजिक गठजोड़ बनाने में मदद की. इस बदलाव ने जाति को खत्म नहीं किया, बल्कि हिंदुत्व के बड़े ढांचे के अंदर जाति की राजनीति को नए तरीके से जोड़ दिया.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में क्या बदला?

उत्तर प्रदेश तब बदला, जब जाति आधारित राजनीति सत्ता की एकमात्र भाषा नहीं रही और एक बड़े हिंदू राजनीतिक विचार का हिस्सा बन गई. बीजेपी का उभार अचानक हुई कोई भगवा क्रांति नहीं थी. यह एक लंबे समय तक चलने वाली राजनीतिक कोशिश थी, जिसमें राम मंदिर का मुद्दा, गैर-यादव ओबीसी तक पहुंच, गैर-जाटव दलितों को साथ जोड़ना, कल्याणकारी योजनाओं का संदेश और मजबूत संगठन को जोड़ा गया.

2017 में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में बड़ी जीत हासिल की. 2022 में भी चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार बीजेपी सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी रही.

अगर कोई “उत्तर प्रदेश की भगवा राजनीति” को समझना चाहता है, तो सबसे बड़ी बात यह है कि हिंदुत्व ने मंडल की राजनीति को पूरी तरह खत्म नहीं किया. उसने मंडल की राजनीति के कुछ हिस्सों को अपने साथ जोड़ा, कुछ हिस्सों को चुनौती दी और सम्मान, सुरक्षा, राष्ट्रवाद, धर्म, कल्याण और प्रतिनिधित्व के इर्द-गिर्द एक नई राजनीतिक भाषा तैयार की.

मंडल के दौर ने जाति को सत्ता के केंद्र में ला दिया

मंडल के दौर ने उन समुदायों को राजनीतिक भाषा दी, जो लंबे समय से सामाजिक और चुनावी तौर पर पीछे थे. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसी पार्टियों ने सामाजिक पहचान को राजनीतिक बातचीत का आधार बनाकर अपनी ताकत बढ़ाई. यादव, दूसरे ओबीसी, जाटव और दूसरे दलित समूह अब सिर्फ वोट बैंक नहीं रहे, बल्कि अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने वाले समूह बन गए.

इस दौर ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पुराने व्यापक सामाजिक गठजोड़ को कमजोर किया. सरकार बनाने के लिए जातीय गठबंधन, प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के वादे महत्वपूर्ण हो गए. लेकिन समय के साथ मंडल की राजनीति की अपनी सीमाएं भी सामने आईं. कुछ समुदायों को लगा कि ओबीसी और दलित राजनीति में कुछ प्रभावशाली समूहों को ही ज्यादातर फायदे मिल रहे हैं. वहीं छोटी जातियों के समूह दूसरे राजनीतिक विकल्प तलाशने लगे.

यहीं से भगवा आंदोलन के लिए एक बड़ी जगह बनी. बीजेपी ने समझा कि सिर्फ ऊंची जातियों की पार्टी की छवि के साथ उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक दबदबा बनाना मुश्किल होगा. उसे उन समुदायों से भी बात करनी होगी जिन्हें मंडल की राजनीति ने राजनीतिक ताकत तो दी थी, लेकिन जो हमेशा उससे संतुष्ट नहीं थे.

कमंडल की रणनीति ने हिंदू छतरी को बड़ा किया

कमंडल की राजनीति ने धार्मिक पहचान को लोगों को जोड़ने के एक तरीके के रूप में इस्तेमाल किया. लेकिन उत्तर प्रदेश में इसकी सफलता केवल धार्मिक प्रतीकों से नहीं आई. इसके साथ सामाजिक समीकरण को साधना भी जरूरी था. राम मंदिर आंदोलन ने भगवा राजनीति को भावनात्मक ताकत दी, लेकिन बाद में चुनावी सफलता केवल मंदिर की राजनीति पर निर्भर नहीं रही. इसके लिए उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय गठबंधन, जातीय समीकरण, कल्याणकारी योजनाओं का संदेश और मजबूत पार्टी संगठन भी जरूरी था.

बीजेपी की रणनीति इसलिए काम करती दिखी क्योंकि उसने मतदाताओं से जाति भूलने के लिए नहीं कहा. इसके बजाय कई जातीय समूहों को एक बड़े हिंदू समूह का हिस्सा मानने की कोशिश की गई. उत्तर प्रदेश में दलित और ओबीसी राजनीति पर हुई अकादमिक चर्चाओं में भी बीजेपी की उन समुदायों तक पहुंच बनाने की कोशिश का जिक्र मिलता है, जिन्हें मजबूत राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला था. इनमें गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों के कुछ समूह शामिल थे.

यहीं “हिंदुत्व की भगवा राजनीति और दलित लामबंदी” की बात सिर्फ एक शब्द नहीं रह जाती. यह एक वास्तविक विरोधाभास को दिखाती है. एक तरफ ऐसी राजनीति है जो हिंदुओं को एकजुट करने पर आधारित है, वहीं दूसरी तरफ वह उन समुदायों से भी समर्थन लेने की कोशिश करती है जो हिंदू समाज के भीतर लंबे समय से भेदभाव का सामना करते रहे हैं.

भगवा पार्टी ने सामाजिक दूरी को चुनावी ताकत में कैसे बदला?

भगवा पार्टी ने उन मतदाताओं की पहचान करके सामाजिक दूरी को राजनीतिक ताकत में बदलने की कोशिश की, जिन्हें पुराने जातीय गठबंधनों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला था. उन्हें राजनीतिक पहचान, स्थानीय स्तर पर नेतृत्व की जिम्मेदारियां, कल्याणकारी योजनाओं का लाभ और एक बड़ी वैचारिक पहचान देने की कोशिश की गई. इससे जातीय असमानता खत्म नहीं हुई, लेकिन कई समुदायों को अपनी पुरानी राजनीतिक पसंद पर दोबारा सोचने का कारण जरूर मिला.

कई चीजों ने इसमें भूमिका निभाई:

गैर-यादव ओबीसी तक पहुंच: बीजेपी ने उन समूहों पर ध्यान दिया जो समाजवादी पार्टी से जुड़े यादव वर्चस्व के साथ हमेशा खुद को नहीं जोड़ते थे.

गैर-जाटव दलितों को साथ लाना: बीजेपी ने उन दलित समुदायों तक पहुंच बनाई जिन्हें बहुजन समाज पार्टी के मुख्य जाटव आधार से अलग महसूस होता था.

कल्याणकारी योजनाओं को राजनीतिक संदेश बनाना: सरकारी योजनाओं से मिलने वाले लाभ को सिर्फ योजनाओं के तौर पर नहीं, बल्कि सरकार की मौजूदगी के सबूत के तौर पर भी पेश किया गया.

कानून-व्यवस्था का संदेश: पार्टी ने सुरक्षा और शासन के मुद्दों के जरिए अलग-अलग जातियों के मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश की.

धार्मिक प्रतीक: मंदिर, त्योहार और हिंदू पहचान ने एक साझा भावनात्मक जुड़ाव बनाने में मदद की.

बूथ स्तर का संगठन: स्थानीय कार्यकर्ताओं ने बड़ी राजनीतिक विचारधारा को सीधे मतदाताओं से जोड़ने का काम किया.

इन सभी चीजों ने जमीन पर दिखने वाली भगवा राजनीति को सिर्फ विचारधारा तक सीमित नहीं रहने दिया. जमीनी स्तर पर सवाल यह भी था कि किसकी बात सुनी जा रही है, किसे टिकट मिल रहा है, किसे सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है और किसे सुरक्षा का भरोसा महसूस हो रहा है.

भगवा बदलाव एक संचार क्रांति भी था

उत्तर प्रदेश में बीजेपी के बढ़ने में उसकी यह क्षमता भी महत्वपूर्ण रही कि उसने जटिल राजनीति को आसान और याद रहने वाले संदेशों में बदल दिया. मंडल की पार्टियां सामाजिक न्याय, आरक्षण और जातीय सम्मान की भाषा में बात करती थीं. बीजेपी ने इसके साथ एक दूसरी भाषा जोड़ी. इसमें हिंदू गौरव, राष्ट्रवाद, कल्याणकारी योजनाओं का लाभ और मजबूत नेतृत्व शामिल था.

यह इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि मतदाता आमतौर पर केवल एक पहचान के आधार पर फैसला नहीं करते. कोई मतदाता एक साथ ओबीसी, हिंदू, गरीब, युवा, आगे बढ़ने की इच्छा रखने वाला, स्थानीय मुद्दों से जुड़ा और राष्ट्रवादी हो सकता है. बीजेपी की संचार रणनीति ने इन सभी पहचानों से एक साथ बात करने की कोशिश की.

इसी वजह से भारतीय राजनीति में भगवा ताकत के उभार की चर्चा अक्सर उत्तर प्रदेश से शुरू होती है. राज्य जातीय समीकरणों और सांस्कृतिक संदेश को एक साथ जोड़ने की प्रयोगशाला बन गया.

फिर भी इस “भगवा क्रांति” को पूरी तरह या हमेशा के लिए होने वाला बदलाव नहीं समझना चाहिए. उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब भी मुकाबला बना हुआ है और जातीय मुद्दे आज भी मतदान के व्यवहार को प्रभावित करते हैं. भगवा खेमे में आए समुदाय भी ज्यादा प्रतिनिधित्व, आर्थिक लाभ और सम्मान की मांग कर सकते हैं.

मंडल खत्म क्यों नहीं हुआ?

मंडल की राजनीति इसलिए आज भी मौजूद है क्योंकि उत्तर प्रदेश में जाति अब भी लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है. शादी, जमीन, स्थानीय सत्ता, शिक्षा, पुलिस व्यवस्था और रोजगार पर जाति का असर अब भी दिखाई देता है. कोई भी राजनीतिक विचारधारा इन व्यवस्थाओं को एक झटके में खत्म नहीं कर सकती.

बदलाव सिर्फ इतना हुआ है कि चुनावी राजनीति में जाति को इस्तेमाल करने का तरीका बदल गया है. पहले जातीय पहचान का मतलब अक्सर ऐसी पार्टी को वोट देना होता था जो सीधे जातीय न्याय की राजनीति करती थी. आज जातीय हितों को हिंदुत्व के नेतृत्व वाले बड़े गठजोड़ के अंदर भी उठाया जा सकता है. यह उम्मीदवारों के चयन, सरकारी योजनाओं तक पहुंच या स्थानीय नेतृत्व के जरिए हो सकता है.

इससे एक अस्थिर संतुलन बनता है. बीजेपी के लिए जरूरी है कि उसकी हिंदू छतरी बड़ी बनी रहे और साथ ही अलग-अलग उम्मीदों वाले कई जातीय समूहों को संतुष्ट किया जा सके. वहीं विपक्षी पार्टियां जातीय जनगणना की मांग, सामाजिक न्याय की भाषा और ओबीसी, दलित, मुस्लिम तथा दूसरे मतदाताओं के गठबंधन के जरिए मंडल की राजनीति को फिर से मजबूत करने की कोशिश करती हैं.

भगवा एक प्रतीक है, इसका सिर्फ एक मतलब नहीं

भारतीय राजनीति में भगवा रंग के अलग-अलग मतलब हैं. यह त्याग, आध्यात्मिकता, हिंदू पहचान, राष्ट्रवाद और राजनीतिक ताकत से जुड़ा हो सकता है. आलोचक इसे बहुसंख्यक समुदाय के राजनीतिक एकीकरण के रूप में देखते हैं, जबकि समर्थक इसे सांस्कृतिक पुनर्जागरण मानते हैं.

इसी वजह से “मेरी राजनीति का रंग भगवा नहीं है” जैसे कमल हासन के बयान भी राजनीतिक रूप से चर्चा में रहे. कमल हासन का यह कहना कि उनकी राजनीति भगवा नहीं है, यह दिखाता है कि भगवा रंग खुद एक बड़े वैचारिक रुख के संकेत के तौर पर इस्तेमाल होने लगा था.

हालांकि उत्तर प्रदेश में भगवा केवल एक प्रतीक नहीं है. यह राजनीतिक सोच में आए बदलाव को भी दिखाता है. एक रंग चुनावी पहचान बना, फिर शासन की भाषा का हिस्सा बना और उसके बाद एक सामाजिक गठजोड़ का आधार बन गया.

उत्तर प्रदेश से मिलने वाली बड़ी सीख

उत्तर प्रदेश दिखाता है कि भारतीय राजनीति में लड़ाई अक्सर सिर्फ जाति और धर्म के बीच नहीं होती. मंडल और कमंडल एक-दूसरे से मुकाबला भी करते हैं, एक-दूसरे से जुड़ते भी हैं और एक-दूसरे के तरीकों को अपनाते भी हैं. बीजेपी का दबदबा इस बात से जुड़ा रहा कि एक महत्वपूर्ण दौर में उसने इस मेल को अपने विरोधियों की तुलना में बेहतर तरीके से समझा.

ये भी पढ़ें- यूपी 2027 के लिए भाजपा की रणनीति आकार लेने लगी; बूथ रणनीति और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की जिम्मेदारी संभालेंगे बीएल संतोष

आगे की राजनीति इस बात पर निर्भर करेगी कि भगवा राजनीति जातीय आकांक्षाओं, आर्थिक दबाव, युवाओं की उम्मीदों और सम्मान की मांगों को किस तरह संभालती है. उत्तर प्रदेश का भगवा जागरण इसलिए सिर्फ एक पार्टी के उभार की कहानी नहीं है. यह इस बात की याद दिलाता है कि भारत में राजनीतिक ताकत उन लोगों के पास जाती है जो पहचान को संगठन से, भावनाओं को वोट से और सामाजिक बंटवारे को एक भरोसेमंद गठजोड़ में बदल पाते हैं.

-भारत एक्सप्रेस

Prashant Kumar

CEO – Bharat Express Digital Chief Advisor to the Chairman & Managing Director and Editor-in-Chief Mr. Prashant Kumar is a digital, media and growth transformation leader with 18+ years of experience across strategy, technology, AI, marketing and business transformation, having worked with leading organisations including Amazon, IBM, Adidas and Tata Consumer Products. At Bharat Express, he leads digital transformation, audience growth, technology, partnerships, monetisation and new business initiatives to build a scalable, future-ready media ecosystem.

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