आज भोजपुरी भाषा (Bhojpuri Language) और संस्कृति के प्रखर सूर्य, बहुआयामी प्रतिभा के धनी भिखारी ठाकुर की जयंती है. 1887 में बिहार के सारण जिले के में एक साधारण नाई परिवार में जन्मे इस महान लोक कलाकार ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि उनके जीवन की सादगी और संघर्ष भोजपुरी को वैश्विक पटल पर चमकाएंगे. भिखारी ठाकुर को ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ (Shakespeare of Bhojpuri) कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने लोकगीतों, भजनों, कीर्तनों और नाटकों के माध्यम से समाज की गहन पीड़ाओं को न केवल उकेरा, बल्कि उन्हें जीवंत कर दिया. उनकी रचनाएं आज भी प्रवासियों की व्यथा, नारी के दर्द और दलितों के संघर्ष को प्रतिबिंबित करती हैं, जो भोजपुरी को मात्र एक बोली से भाषा का गौरव प्रदान करती हैं.
भिखारी ठाकुर का जब जन्म हुआ तब बिहार के ग्रामीण इलाकों में गरीबी और सामाजिक असमानता का बोलबाला था. सीमित औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने वाले भिखारी ठाकुर ने अपनी प्रतिभा को लोक परंपराओं से सींचा. बचपन से ही वे रामलीला और लोक नाटकों के प्रति आकर्षित हुए. युवावस्था में वे कलकत्ता (अब कोलकाता) चले गए, जहां मजदूरी करते हुए भी उन्होंने भोजपुरी लोकगीतों की धुनें गुनगुनाना नहीं छोड़ा. वहां की प्रवासी जीवन की कठिनाइयों ने उनके हृदय को छू लिया, जो बाद में उनकी कालजयी रचना ‘बिदेसिया’ में उभरी.
भिखारी ठाकुर कवि, गायक, गीतकार, नाट्य निर्देशक, संगीतकार और कुशल अभिनेता थे. उन्होंने ‘भिखारी ठाकुर नाट्य दल’ की स्थापना की, जो ग्रामीण मंचों से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक घूम-घूम कर प्रदर्शन करता. उनकी मृत्यु 10 जुलाई 1971 को हुई, लेकिन उनके 84 वर्षों का जीवन एक क्रांति का प्रतीक बन गया.
भिखारी ठाकुर ने कभी किताबी ज्ञान पर निर्भर नहीं रहे; उनकी कला लोक से उपजी और लोक के लिए ही थी. उन्होंने भोजपुरी लोकगीतों और भजन-कीर्तनों को नई ऊंचाई दी. उनके गीतों में समाज की गरीबी, शोषण, दहेज प्रथा, विधवा विवाह और दलितों के अधिकार की सच्चाई झलकती है. ‘गबरघिचोर’ नाटक में उन्होंने नारी विमर्श को इतनी मार्मिकता से उकेरा कि दर्शक रो पड़े.
उनकी रचनाएं सामाजिक सुधार का माध्यम बनीं. ‘बिदेसिया’ में बंगाल जाने वाले मजदूरों की पीड़ा को उन्होंने इतने जीवंत ढंग से चित्रित किया कि यह भोजपुरी साहित्य का मील का पत्थर बन गया. उन्होंने लोक कलाओं को वैश्विक पहचान दिलाई. उनके नाटक इंग्लैंड, अमेरिका तक पहुंचे. भोजपुरी को उन्होंने गौरव प्रदान किया.
भिखारी ठाकुर का योगदान केवल साहित्य तक सीमित न रहा; उन्होंने थिएटर को जन-जन का हथियार बनाया. उनके भजनों में भक्ति की मधुरता है, जो आज भी ग्रामीण मेलों में गूंजती है. वे दलित विमर्श के उद्घोषक थे, जिन्होंने नाई समुदाय की सादगी को शक्ति का प्रतीक बनाया.
आज, 138वीं जयंती पर, उनकी स्मृति हमें याद दिलाती है कि सच्ची कला वही जो समाज को जागृत करे. युवा कलाकार उनके गीत गा रहे हैं, जो साबित करता है कि उनकी लोकप्रियता में इजाफा हो रहा है. उनकी रचनाएं डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जीवित हैं. यूट्यूब पर उनके जीवन परिचय के वीडियो लाखों बार देखे जाते हैं.
भिखारी ठाकुर ने सिद्ध किया कि प्रतिभा किसी जाति या वर्ग की मोहताज नहीं. जरूरत है भोजपुरी के इस अमूल्य धरोहर की विरासत को संरक्षित रखें, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनकी पीड़ा और आनंद से सीख सकें.
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-भारत एक्सप्रेस
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