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हिमालय में खोया CIA का न्यूक्लियर पावर पैक: नंदा देवी की अनकही कहानी

हिमालय की बर्फीली चोटियों में दबी यह कहानी सिर्फ एक जासूसी मिशन की नहीं, बल्कि शीत युद्ध की उस खामोश लड़ाई की है, जिसमें भारत और अमेरिका ने चीन की न्यूक्लियर महत्वाकांक्षाओं पर नजर रखने के लिए मिलकर गुप्त ऑपरेशन चलाया.

हाल ही न्यूयॉर्क टाइम्स में एक लंबी रिपोर्ट छपी, जिसमें सवाल उठाया गया: “हिमालय में CIA ने न्यूक्लियर डिवाइस कैसे खो दिया?” यह सवाल भारत की लोकसभा में कई साल पहले भी गूंज चुका था. तब विपक्ष ने हंगामा मचाया था – गंगा नदी प्रणाली में रेडियोएक्टिव प्रदूषण का खतरा, हिमालय में खोए न्यूक्लियर पावर पैक की वजह से. यह कहानी थी एक गुप्त जासूसी अभियान की, जिसमें राजीव गांधी के करीबी सुमन दुबे भी शामिल थे. लेकिन यह सिर्फ एक स्कैंडल नहीं, बल्कि शीत युद्ध की जटिल राजनीति, भारत-अमेरिका गठबंधन और हिमालय की ऊंचाइयों पर चले गुप्त ऑपरेशनों की दास्तान है.

1962 का युद्ध और बदलते भू-राजनीतिक समीकरण

हिमालय की ऊंची चोटियां न सिर्फ भूगर्भीय टेक्टॉनिक प्लेटों की टक्कर का नतीजा हैं, बल्कि भू-राजनीतिक प्लेटों के टकराव का भी प्रतीक. 1962 में भारत और चीन के बीच भयंकर युद्ध छिड़ा, जो एशिया के नक्शे को बदलने वाला था. चीन की कम्युनिस्ट ताकत बढ़ रही थी, और सोवियत संघ से उसका झगड़ा हो चुका था. माओ त्से-तुंग के न्यूक्लियर हथियारों पर बयान – “चीन आधी आबादी खोने के बाद भी जीत सकता है” – दुनिया के नेताओं को रातों की नींद उड़ा देते थे.

भारत ने पश्चिमी शक्तियों की ओर रुख किया. अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी के ‘कैमलॉट’ युग में भारत-अमेरिका दोस्ती अब राजनीतिक रूप से अस्वीकार्य नहीं रही. 1962 के बाद भारत ‘फ्रंटलाइन स्टेट’ बन गया. CIA और भारत की इंटेलिजेंस ब्यूरो (बाद में RAW) के बीच गठजोड़ हुआ. CIA ने तिब्बती खम्पा लड़ाकों को कोलोराडो में ट्रेनिंग दी, और 1957 से दक्षिणी तिब्बत में पैरा-ड्रॉपिंग शुरू की. ये उड़ानें ढाका के कुर्मिटोला एयरफील्ड से होती थीं. चीन को लगा कि भारत ही पीछे है – दलाई लामा को शरण देने और निर्वासित सरकार बसाने की वजह से. पूर्व CIA अधिकारी ब्रूस रीडेल की किताब JFK’s Forgotten War (2017) में इसकी विस्तृत कहानी है, जिसमें दलाई लामा के बड़े भाई थुप्टेन नोरबू के साथ CIA के करीबी रिश्ते का जिक्र है.

RAW का जन्म और हवाई जासूसी

1962 के बाद भारत-अमेरिका सहयोग से कई फायदे हुए. CIA ने भारत को U-2 स्पाई प्लेन उड़ाने की इजाजत दी – चारबतिया (ओडिशा) से. यह RAW के एविएशन रिसर्च सेंटर (ARC) का आधार बना, जो तिब्बत और शिनजियांग पर निगरानी करता रहा. बिजू पटनायक की भूमिका अहम थी. उन्होंने CIA की मदद से ARC स्थापित किया. रामनाथ काओ, RAW के संस्थापक प्रमुख, ARC के पहले बॉस बने.

स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (SFF) भी बनी – 5000 तिब्बती कमांडो की. यह चकराता (देहरादून) में सिरह था, मेजर जनरल सुजन सिंह उबन के नेतृत्व में. 1960 के दशक में चीन खम्पा हमलों की शिकायत करता रहता. इंडियन आर्मी पोजीशंस पर आज भी पुराने अमेरिकी कोट्स मिल जाते हैं – 1962 के बाद के सहयोग के निशान.

नंदा देवी पर न्यूक्लियर जासूस: SNAP-19C का रहस्य

1964 तक चीन के लोप नोर (शिनजियांग) में न्यूक्लियर टेस्ट की खबरें आ रही थीं. स्पाई सैटेलाइट्स के आने से पहले जासूसी साहसी साहबिकों का खेल था. CIA ने नंदा देवी (25,645 फीट) पर एक इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस (ELINT) डिवाइस लगाने का प्लान बनाया – न्यूक्लियर फ्यूल सेल (SNAP-19C) से चलने वाला, प्लूटोनियम आइसोटोप से भरा, जिसकी हाफ-लाइफ हजारों साल.

किताब Spies in the Himalayas (एमएस कोहली और केनेथ कॉनबॉय, हार्पर कोलिंस) में पूरी दास्तान है. पहली कोशिश 1965 में माउंटेनियरिंग एक्सपीडिशन के कवर में – चोटी के ठीक नीचे डिवाइस पहुंची, लेकिन बुरे मौसम में पीछे हटना पड़ा. अगले साल रिकवरी मिशन – डिवाइस गायब! ग्लेशियर में फिसल गई, या गंगा की ओर सरक रही? कुछ थ्योरी कहती हैं कि भारतीय माउंटेनियर्स ने चुपके से चुरा लिया – आरएन काओ के RAW के लिए.

चीनी ICBM टेस्ट (1967) ने जल्दबाजी बढ़ाई. 1967 में नंदा कोट पर दूसरा मिशन सफल, लेकिन बर्फ ने एंटीना ढक दिया. कोहली ने फिर रिकवर किया. 1969 में लेह के पास गैस-पावर्ड डिवाइस लगाई. लेकिन 1970 तक अमेरिकी TRW स्पाई सैटेलाइट्स आ गए – भारत को जानकारी बांटना बंद.

संसदीय हंगामा और सफाई का रहस्य

कहानी 1969 में खत्म नहीं हुई. 1978 में संसद में ‘न्यूक्लियर टाइम बम’ का शोर – नंदा देवी ग्लेशियर से गंगा में रेडियोएक्टिव रिसाव का डर. 1982 से बॉयोस्फीयर बंद. लेकिन 2001 में एशियन एज में खबर: गढ़वाल राइफल्स की 40 सदस्यीय आर्मी टीम ने सितंबर में नंदा देवी फतह की, 800 किलो हेजर्डस वेस्ट रिकवर किया. राष्ट्रपति केआर नारायणन ने बधाई दी – “पर्यावरण संरक्षण के ऐसे प्रयास सराहनीय.” लेकिन वह ‘हेजर्डस मटेरियल’ क्या था? SNAP-19C का प्लूटोनियम?

आज नंदा देवी में ‘असली’ माउंटेनियर्स को इंट्री की अनुमति. क्या यह सफाई का अंतिम अध्याय था? या हिमालय के रहस्य अभी भी दबे हैं?

शीत युद्ध के अवशेष

यह कहानी सिखाती है कि भू-राजनीति कितनी तेज बदलती है. 1962 का गठजोड़ टूटा, लेकिन निशान बाकी – गुप्त एयरबेस, तिब्बती फाइटर्स, खोए डिवाइस. आज स्पाई सैटेलाइट्स और ड्रोन्स ने पुरानी जासूसी को पुराना बना दिया, लेकिन हिमालय की चोटियां चुपचाप गवाह बनी रहीं. क्या नंदा देवी का पैक अभी भी ग्लेशियर में छिपा है, या गंगा की पवित्र धाराओं में घुल गया? सच्चाई शायद कभी न खुले. लेकिन इतिहास हमें याद दिलाता है जासूसी कभी आसान नहीं होती.

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-भारत एक्सप्रेस



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