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बिहार की मिट्टी से जुड़ा पद्मश्री सम्मान, डॉ. गोपालजी त्रिवेदी बने मिसाल

2026 के पद्म पुरस्कारों में बिहार से तीन प्रतिष्ठित हस्तियों को यह सम्मान मिला. इनमें डॉ. गोपालजी त्रिवेदी का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिन्हें विज्ञान एवं इंजीनियरिंग क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्मश्री से नवाजा गया.

यह सम्मान मात्र एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं है, बल्कि बिहार की खेती-किसानी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ग्रामीण नवाचार की एक बड़ी जीत है. मुजफ्फरपुर के बंदरा प्रखंड के मतलुपुर गांव से निकले डॉ. त्रिवेदी ने अपनी जन्मभूमि की मिट्टी से जुड़कर कृषि में क्रांतिकारी बदलाव लाए, जिसने लाखों किसानों के जीवन को समृद्ध किया.

लीची की खेती में क्रांतिकारी योगदान

उत्तर बिहार, खासकर मुजफ्फरपुर क्षेत्र, लीची के लिए विश्व प्रसिद्ध है. लेकिन वर्षों पहले कई पुराने लीची बागान अनुपजाऊ और बेकार हो रहे थे. डॉ. गोपालजी त्रिवेदी ने इन्हें पुनर्जीवित करने के लिए Rejuvenation Canopy Management तकनीक विकसित की और लोकप्रिय बनाई. इस विधि से पुराने पेड़ों की छत्र का प्रबंधन कर उनकी उत्पादकता में भारी वृद्धि हुई.

इस तकनीक के परिणामस्वरूप:

  • हजारों किसानों की आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई.
  • मुजफ्फरपुर की लीची को वैश्विक बाजार में नई पहचान मिली.
  • बिहार की लीची उत्पादन क्षमता मजबूत हुई.

इन्हीं प्रयासों के कारण उन्हें ‘लीची की खेती का क्रांतिकारी वैज्ञानिक’ कहा जाता है.

जलजमाव वाले क्षेत्रों को अवसर में बदलना

उत्तर बिहार के कई इलाके जलजमाव की समस्या से जूझते रहे हैं, जहां पारंपरिक फसलें नहीं उग पातीं. डॉ. त्रिवेदी ने इस चुनौती को अवसर में बदल दिया. उन्होंने मखाना और सिंघाड़ा की वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दिया. आज बिहार दुनिया का सबसे बड़ा मखाना उत्पादक राज्य है, और यह उत्पाद किसानों के लिए स्थिर आय का प्रमुख स्रोत बन चुका है.

उनके प्रयोगों ने न केवल जलजमाव वाले तालाबों-जंगलों को उपयोगी बनाया, बल्कि विविध फसल प्रणाली को भी प्रोत्साहित किया, जिसमें शीतकालीन मक्का जैसे नवाचार शामिल हैं.

आस्था और परंपराओं से गहरा जुड़ाव

उच्च पदों पर पहुंचने के बावजूद डॉ. त्रिवेदी अपनी जड़ों से कभी नहीं उखड़े. वे अपने पैतृक गांव स्थित शिव मंदिर में हर महीने विधिवत रुद्राभिषेक कराते थे. पूजा में वे स्वयं के पेड़ों से प्राप्त बेलपत्र का उपयोग करते थे. ग्रामीणों के अनुसार, कोई भी नया कृषि प्रयोग शुरू करने से पहले वे शिव आराधना को शुभ मानते थे.

आधुनिक विज्ञान और गहरी आस्था का यह संतुलन उनके जीवन की सबसे खास विशेषता है. मिट्टी, किसान और परंपराओं से उनका अटूट नाता आज भी उन्हें प्रेरणा स्रोत बनाए रखता है.

डॉ. गोपालजी त्रिवेदी का सफर एक साधारण किसान परिवार से शुरू होकर राष्ट्र स्तर पर सम्मान तक पहुंचा. पद्मश्री सम्मान उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि से कहीं अधिक है. यह बिहार के उन अनगिनत किसानों और वैज्ञानिकों की जीत है जो मिट्टी से जुड़कर नवाचार करते हैं.

बिहार की कृषि को नई दिशा देने वाले इस व्यक्तित्व की सफलता बताती है कि सच्ची प्रगति जड़ों से कटकर नहीं, बल्कि जड़ों से जुड़कर होती है.

ये भी पढ़ें:भारत-EU FTA: ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ को कैसे प्रभावी बनाए सरकार?

-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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